महामानव

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सबसे हैरतअंगेज तथ्य

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वैश्विक चेतना

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बच्चों को चीज़ों को तोड़ने की आज़ादी दो- वे इसी तरह सीखेंगे: खिलौना खोजी अरविन्द गुप्ता

साक्षात्कार

आईआईटी प्रशिक्षित इंजीनियर अरविन्द गुप्ता को शिक्षा में उनके योगदान के लिए इस वर्ष पद्मश्री से सम्मानित किया गया है.

अरविन्द गुप्ता ने माचिस की तीलियों के साथ एक सफ़र शुरू किया. तीलियों और रबरबैंड के सहारे उन्होंने आकारों की रचना की और फिर जटिल मॉडल बनाए. यह 1978 की बात है. चार दशक बाद कबाड़ जैसी मामूली चीज़ों को हजारों शैक्षिक खिलौनों में बदल डालने के हुनर ने उन्हें भारत सरकार द्वारा दिए जाने वाले देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में एक- पद्मश्री सम्मान दिलाया.

अरविन्द गुप्ता ने आईआईटी कानपुर से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और फिर एक ऑटोमोबाइल कंपनी में नौकरी करने लगे. दो साल बाद वह एक साल की छुट्टी लेकर मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के बनखेड़ी ब्लाक में चल रहे एक शैक्षिक कार्यक्रम में हिस्सा लेने पहुंचे. यहां उन्हें स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्री से शैक्षिक सामग्री तैयार करनी थी. गाँव के बाज़ार में उन्हें साइकिल टायर में लगने वाले रबर वाल्व की 10 फीट लम्बी ट्यूब मिल गयी. जब उन्हें पता चला कि यह पतली सी रबर ट्यूब माचिस की तीलियों में बहुत अच्छे से फिट हो जाती है तो एक अनमोल तरकीब उनके हाथ लग गयी. इसकी मदद से वे तीलियों के बीच मनचाहे जोड़ डाल सकते थे. फिर क्या था- ग़रीब से ग़रीब बच्चे भी उनकी इस जादुई तरकीब से विज्ञान सिखाने वाले मॉडल जोड़ और तोड़ सकते थे. इस तरह पैदा हुए उनके “माचिस के मॉडल”.

बीते 40 वर्षों में अरविन्द गुप्ता के माचिस के मॉडलों और “कबाड़ के खिलौनों” ने साबित कर दिया कि बहुत कम संसाधनों में भी सीखने की प्रक्रिया को आनंददाई बनाया जा सकता है. इस विषय पर उन्होंने दर्जनों किताबें लिख डालीं. एक हजार से ज्यादा निर्देशात्मक वीडिओ बनाए और स्कूली बच्चों के बीच 3000 से ज्यादा कार्यशालाएं कीं. अकसर वह बाल विज्ञान मेलों में शरीक होते थे और 2011 में उन्होंने अपनी चर्चित टेड टॉक दी, जो विचारणीय विषयों का प्रसार करने वाला एक गैर-व्यावसायिक प्रयास है. जिस दिन पद्मश्री सम्मान की घोषणा हुई, उससे चंद दिन पहले उन्हें नरेन्द्र दाभोलकर स्मृति सम्मान से नवाज़ा गया था. यह सम्मान उन्हें 2013 में मारे गए चर्चित तर्कवादी विद्वान नरेन्द्र दाभोलकर के नाम से महाराष्ट्र फाउंडेशन की ओर से 13 जनवरी को दिया गया.

होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम, जहां अरविन्द गुप्ता ने अपने हुनर को सान चढ़ाई, देश में विज्ञान शिक्षा का अब तक का सबसे प्रगतिशील प्रयोग माना जाता है. बच्चों में उत्सुकता और रुचि जगाकर सरकारी स्कूलों में विज्ञान शिक्षण में सुधार को लक्षित इस कार्यक्रम ने शिक्षकों को प्रशिक्षण देने के अलावा कई पुस्तकें प्रकाशित कीं और साइंस किट तैयार किये. 2002 में इस कार्यक्रम को मध्य प्रदेश की कांग्रेस-नीत सरकार ने बंद करने का फरमान सुनाया. भारतीय जनता पार्टी तो शुरू से ही इसके खिलाफ थी. लेकिन राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 और शिक्षा का अधिकार कानून 2009 सहित देश के लगभग सभी प्रगतिशील शिक्षा सुधारों में इसके प्रभाव की झलक देखी जा सकती है.

एक साल बाद 1978 में अरविन्द गुप्ता ने होशंगाबाद छोड़ दिया लेकिन वे इस कार्यक्रम के लिए लगातार काम करते रहे. 2003 से दिसंबर 2014 में अपनी सेवानिवृत्ति तक वह पुणे में इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिज़िक्स के बाल विज्ञान केंद्र के प्रभारी रहे. वहां रहकर उन्होंने अपनी तमाम किताबों और वीडिओज का ऑनलाइन संग्रह तैयार किया.

अरविन्द गुप्ता ने स्क्रॉल.इन से इस बातचीत में बताया कि किस प्रकार उन्हें 60 के दशक के छात्र आंदोलनों से प्रेरणा मिली. उनके संस्थान में भाषण देने पहुंचे तेजतर्रार शिक्षा कार्यकर्त्ता अनिल सद्गोपाल की बातों ने कैसे उन्हें प्रभावित किया और कैसे उन्होंने कबाड़ से विज्ञान के खिलौनों की दुनिया रची.

अकसर आप कहते हैं, “किसी खिलौने के साथ सबसे अच्छी बात कोई बच्चा यही कर सकता है कि वह उसे तोड़ डाले.” आपकी इस उक्ति का क्या मतलब है?

जोड़-तोड़ करना सभी बच्चों का जन्मजात स्वभाव है. वे चीज़ें जोड़ना चाहते हैं, तोड़ना चाहते हैं. बच्चे खिलौनों को क्यों तोड़ते हैं? क्योंकि हमारे बीच अकेले उन्हीं में उत्सुकता बची है. वे उन्हें खोलकर देखना चाहते हैं कि इनके भीतर क्या छुपा हुआ है और उन्हें फिर से कैसे जोड़ा जा सकता है. बच्चों को तोड़ने की आज़ादी दीजिये अन्यथा वे सीख नहीं पायेंगे कि चीज़ें कैसे काम करती हैं. उन्हें प्रकृति के नियमों का ज्ञान कैसे होगा?

आपने 1960 और 1970 दशक के राजनीतिक आंदोलनों के आप पर पड़े प्रभाव के बारे में कहा है. आपके जीवन और काम पर उन आंदोलनों का कैसा प्रभाव पड़ा?

मैं 1972 से 1975 तक आईआईटी कानपुर में था. 1968 में पेरिस की सड़कें छात्र आन्दोलन के नारों से गूँज रही थीं. वह बड़ा क्रांतिकारी दौर था. देश के बाहर महिला अधिकार, नागरिक आधिकार और पर्यावरण से जुड़े आन्दोलनों की धमक थी. भारत में नक्सलबाड़ी आन्दोलन चल रहा था और उसके बाद जयप्रकाश नारायण का आन्दोलन शुरू हुआ. समाज में जबरदस्त उथल-पुथल मची हुई थी. यह एक राजनीतिक उथल-पुथल थी, जिससे ढेर सारी ऊर्जा बाहर निकली.

इसके अलावा दूसरे विश्वयुद्ध को 20 वर्ष बीत चुके थे और कई वैज्ञानिक समाज में अपनी भूमिका के बारे में सोच रहे थे. कईयों ने तय किया कि इंसानों की मार-काट से उनका कोई लेना देना नहीं है और वे बम व मिसाइल नहीं बनाएंगे.

ऐसे ही एक वैज्ञानिक थे अनिल सद्गोपाल, जो कैलिफोर्निया इंस्टीटयूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी से पीएच.डी. पूरी कर टाटा इंस्टीटयूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च में आये थे. जल्दी ही उन्होंने यह नौकरी छोड़ दी और 1970 दशक में होशंगाबाद के बनखेड़ी में भारत की शुरूआती स्वयंसेवी संस्थाओं में एक किशोर भारती की स्थापना की. यहां उन्होंने देखा कि स्कूलों में विज्ञान प्रयोगशालाएं नहीं हैं. बच्चे बिना अपने हाथ गंदे किये पुस्तकों से रट्टा मारकर अगली कक्षा में पहुंच जाते थे. यह विज्ञान सीखने का बड़ा नुकसानदेह तरीका था. प्रो. यशपाल 1972 में बतौर एक शिक्षक प्रशिक्षक यहां पहुंचे और उन्होंने 40 शिक्षकों के लिए 15 दिन का एक प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाया. इस तरह होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम की शुरुआत हुई.

आप इस कार्यक्रम से कैसे जुड़े?

आईआईटी कानपुर में अपने दूसरे या तीसरे वर्ष में मुझे अनिल सद्गोपाल को सुनने का मौका मिला. उनके भाषण का मुझ पर गहरा प्रभाव पड़ा. अगर मैंने उन्हें नहीं सुना होता, तो संभव है कि मैं किसी बड़े कॉर्पोरेशन या अमेरिका में नौकरी कर रहा होता.

सद्गोपाल ने बताया कि उनकी संस्था वहां (होशंगाबाद) कई साल से काम कर रही है और वह चुनौती बहुत कठिन है. गांवों में लोग अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजना चाहते क्योंकि वे सस्ते श्रमिक साबित होते हैं. यह इतनी ईमानदार स्वीकारोक्ति थी कि इसने मुझे भीतर तक हिला दिया. उन्होंने कहा कि बहुत प्रयत्न करने के बावजूद वह कोई ख़ास बदलाव नहीं ला पाए हैं.

मैंने अपनी डिग्री पूरी की और टेल्को (आज की टाटा मोटर्स) में नौकरी शुरू की. पहले दो साल शानदार बीते, मगर उसके बाद चीज़ें उबाऊ होने लगीं. 1978 में मैं एक साल की छुट्टी लेकर बनखेड़ी चला आया. राज्य सरकार ने भी विज्ञान को बेहतर ढंग से पढ़ाने की संभावना को खोजने के लिए 16 स्कूलों में पांच साल के लिए इस कार्यक्रम को चलाने की अनुमति दे दी.

मैं जोड़-तोड़ में यकीन करता हूं और तरह-तरह की चीज़ें मुझे अपनी ओर खींचती हैं. पहले महीने में मैंने सिर्फ माचिस के मॉडल बनाए. आप इसे घर के बने मेक्कानो सेट जैसा समझ सकते हैं. आप चाहें तो इससे घर बना सकते हैं या फिर आणविक संरचना तैयार कर सकते हैं. मैंने सोचा, “यह ट्रक बनाने से तो अच्छा ही है.”

क्या आप हमेशा से जोड़-तोड़ पसंद करते थे?

हां, हमेशा से. मेरे माता-पिता पढ़े-लिखे नहीं थे लेकिन मेरी मां बहुत पढ़े-लिखे परिवार से थीं. उनके भाइयों ने ऊंची शिक्षा हासिल की थी और वह शिक्षा का मूल्य समझती थीं. मैं चार भाई-बहिनों में सबसे छोटा था और उन्होंने हम चारों का बरेली के सबसे अच्छे कान्वेंट में दाखिला करवाया था. हम महंगे खिलौने नहीं खरीद सकते थे, इसलिए हम हमेशा जोड़-तोड़ में लगे रहते थे. माचिस व सिगरेट के डब्बे, बटन और जूता पालिश की डिबिया जैसी जाने कितनी चीज़ें हमारे खिलौनों का कच्चा माल बन जाती थीं. एक धनी रिश्तेदार ने एक बार उपहार में मुझे मेक्कानो सेट दिया था और मैं बरसों तक इससे खेलता रहा.

आईआईटी में मैंने अपने एक दोस्त की पहल पर एरो-मॉडलिंग क्लब की स्थापना की. हम छोटे-छोटे इंजनों की मरम्मत किया करते थे. इस कवायद में मैंने अपने दोस्त से बहुत कुछ सीखा क्योंकि वह मेरी तुलना में कहीं ज्यादा हुनरमंद था.

होशंगाबाद में छः महीने बिताने के बाद मैं तिरुअनंतपुरम चला आया. अपनी पढ़ाई के दौरान मैंने लौरी बेकर के बारे में पढ़ा था. मैंने सोचा यह एक ऐसा इंसान है जिसने गरीबों की ज़िन्दगी को छुआ है. मैंने उन्हें अपने बनाए माचिस के मॉडल दिए और उनके साथ कुछ महीने काम करने की इजाज़त मांगी. इसके बाद मैं टेल्को में वापस लौट आया और कुछ और वर्षों तक नौकरी करता रहा. लेकिन इस एक साल के सफ़र ने मेरे समाने कई सवाल खड़े कर दिए और आखिरकार मैंने नौकरी छोड़ दी.

ये किस तरह के सवाल थे?

हम लोग गांधी और मार्क्स के विचारों के संपर्क में आये. हमने वे सारे बुनियादी सवाल पूछे जो किसी भी संवेदनशील आदमी को परेशान करते हैं. हमारे चारों ओर इतनी गरीबी क्यों है? जो लोग शारीरिक श्रम करते हैं उन्हें भरपेट भोजन क्यों नहीं मिल पाता? समाज में इतनी असमानता क्यों है?

मैंने कुछ अन्य संगठनों के साथ काम किया लेकिन 1984 में बेटी के जन्म के बाद हम पुणे वापस लौट आये. मैंने प्रो. यशपाल को पत्र लिखा. वह तब विज्ञान एवं तकनीकी विभाग में सचिव थे. उन्होंने मुझे मेरी पहली किताब ‘माचिस के मॉडल और विज्ञान के अन्य प्रयोग’ लिखने के लिए फैलोशिप दिलवाई. यह किताब 1987 में छपी. मात्र दो-तीन साल के भीतर यह भारत की 12 भाषाओं में छप गयी.

मैंने जब टेल्को की नौकरी छोड़ी तो मेरे मामा, जो ऊंचे पद पर थे, बहुत नाराज हुए. लेकिन मेरी मां ने कहा, “अच्छा किया नौकरी छोड़ दी, अब कुछ नेक काम करेगा.” उनका यह कथन आने वाले सालों में मुझे प्रेरणा देता रहा.

एकलव्य के साथ आपने क्या काम किया? यही वह संस्था थी, जिसने आखिरकार होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम का संचालन किया.

एकलव्य की स्थापना 1983-84 में हुई और इसने मेरी कई किताबें प्रकाशित कीं. मैं लगातार लिख रहा था. 1990 में हम दिल्ली आ गए. मैं स्वतंत्र रूप से किताबें लिखता था, दूरदर्शन के लिए फ़िल्में बनाता था और वर्कशॉप आयोजित करता था. बेटी की 12वीं कक्षा की पढ़ाई पूरी होने तक हम पूरे 14 साल दिल्ली में रहे. जब वह मेडिकल की पढ़ाई करने वेल्लौर गयी तो 2003 में हम पुणे वापस लौट आये.

क्या इसी दौर में आपने अपनी वेबसाइट बनाकर वीडिओ पोस्ट करने शुरू कर दिए थे?

जैसे ही मैं पुणे पहुंचा, जाने-माने खगोलविद प्रो. जयंत नारलिकर ने मुझे इंटर-यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रो-फिजिक्स के बाल विज्ञान केंद्र में काम करने का न्योता दिया. उन्होंने बच्चों के लिए मराठी में ढेर सारी पुस्तकें लिखी हैं और उनका सपना था कि इंस्टीटयूट में बच्चों के लिए एक छोटा सा केंद्र हो ताकि बचपन से ही उनके भीतर विज्ञान के प्रति प्रेम जागृत किया जा सके. मैंने पूरे 11 साल यहां काम किया और एक शानदार टीम तैयार हुई. इन 11 सालों में मेरे साथ विदुला म्हैसकर रहीं, जिन्होंने स्टेनफोर्ड विश्विद्यालय में मॉलिक्यूलर बायोलॉजिस्ट के तौर पर चार साल पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च करने के बाद इस केंद्र को चुना. इसके बाद अन्ना हजारे के गांव रालेगांव सिद्धि के पास के अशोक रूपनेर भी हमारे साथ जुटे. हमने मिलकर कबाड़ की मदद से 1500 से ज्यादा खिलौने बनाए- हम इन्हें विज्ञान के प्रयोग नहीं कहते. इनमें 110 खिलौने प्लास्टिक की बोतलों की मदद से बने हैं, 60 पेय के डब्बों से. आप तमाम किस्म के आधुनिक कबाड़ को हैरतअंगेज खिलौनों में बदल सकते हैं, जो चलते, उड़ते या फिर आवाज पैदा कर सकते हैं. हमारी वेबसाइट में इन्हें बनाने के सचित्र निर्देश उपलब्ध हैं.

हम अब तक 8,600 से ज्यादा वीडिओ यूट्यूब में डाल चुके हैं. ये अंग्रेजी, मराठी व हिंदी सहित 18-20 अन्य भाषाओं में हैं. इन्हें चाहने वालों ने 100 से ज्यादा वीडिओ को चीनी और 300 से ज्यादा को स्पेनिश भाषा में डब किया है.

हिंदी में ये वीडिओ मेरी और मराठी में म्हैसकर की आवाज में हैं. पीके नानावती, जिन्होंने नरेन्द्र दाभोलकर के साथ भी काम किया था, 1000 वीडियो को कन्नड़ में तैयार कर चुके हैं.

इनके अलावा वेबसाइट में हिंदी, मराठी व अंग्रेजी में 5000 से ज्याद महत्वपूर्ण किताबें उपलब्ध हैं, जो शिक्षा, पर्यावरण, युद्ध विरोधी साहित्य, विज्ञान, गणित आदि विषयों पर लिखी गयी हैं.

कक्षाओं में डिजिटल बोर्ड और ई-कंटेंट आदि टेक्नोलॉजी के माध्यम से किए जा रहे नवाचार को आप कैसे देखते हैं? ख़ास तौर पर सरकार की ओर से की जा रही इस तरह की पहल को?

डिजिटाइजेशन के नाम पर अब तक ज्यादातर पाठ्यपुस्तकों को स्कैन करके ही पेश किया जा रहा है. यह कतई रचनात्मक नहीं, बल्कि एक तरह से बकवास है. लोग दिमाग़ का ज़रा भी इस्तेमाल नहीं करते. इसके विपरीत हमने विज्ञान की परम्परागत श्रेणियों में हर विषय पर खिलौने बनाए हैं. उदाहरण के लिए ध्वनि पर हमने 50 खिलौने बनाए हैं. शिक्षक और बच्चे इनमें से अपने स्तर और ज़रूरत के अनुसार खिलौने चुन सकते हैं. हमें अपने कचरे के डिब्बे में भी झांकना चाहिए. इसमें पड़ी सामग्री का बच्चों के लिए बड़ा महत्त्व हो सकता है और इन्हें गरीब से गरीब बच्चों तक पहुंचाया जा सकता है. यह नवाचार का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है.

लेकिन मौजूदा सरकार की एक पहल बड़े महत्त्व की है- अटल जोड़-तोड़ प्रयोगशाला. ये प्रयोगशालाएं पाठ्यक्रम आधारित नहीं है और उनका उद्देश्य बच्चों को अपने हाथों से तमाम तरह की चीज़ें बनाने का मौका देना है. अगर बच्चे असफल होते हैं तो वे अपने गलतियां सुधारकर सफलता हासिल कर सकते हैं.

होशंगाबाद के बाद आपने कई शिक्षाविदों के साथ काम किया, जिन्होंने शिक्षा नीतियों के निर्माण में योगदान दिया और सरकार के सलाहकार रहे.

मैंने आज ही अनिल सद्गोपाल को लिखा. प्रो. यशपाल ने मुझे अपनी पहली किताब तैयार करने के लिए फ़ेलोशिप दिलवाई. बाद में 2005 में वह राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष बने. एकलव्य के सह-संस्थापक विनोद रैना मेरे प्रकाशक थे. बाद में हमने भारत ज्ञान विज्ञान समिति में मिलकर काम किया. रैना इस संस्था के भी सह-संस्थापक थे और इसके लिए मैंने 100 पुस्तकों की एक शृंखला तैयार की. बाद में उन्होंने शिक्षा के अधिकार के लिए भी काम किया. विनोद के साथ मेरी लंबी साझेदारी रही.

क्या आप इस बात से निराश हैं कि उनके ऐसे कई महत्वपूर्ण प्रयासों को अब उलटा जा रहा है?

मेरे ख़याल से यह बहुत चिंताजनक बात है. लेकिन अच्छी बात यह है कि तमाम सामग्री इन्टरनेट पर उपलब्ध कराई जा रही है.

होशंगाबाद प्रयोग को भी बंद कर दिया गया. और भाजपा को तो यह शुरू से ही नापसंद था.

लेकिन कांग्रेस सरकार ने दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में इसे बंद किया था. कई लोग कहते हैं कि ऐसा करके कांग्रेस ने अपने ही पांव में कुल्हाड़ी मार ली थी.

होशंगाबाद प्रोजेक्ट ने ओपन बुक टेस्ट जैसी चीज़ें शुरू की थीं, जिसमें हम बच्चों की रटने की क्षमता की परीक्षा नहीं लेते थे बल्कि अवधारणा की समझ की परख करते थे. लोगों को यह पसंद नहीं था. उन्होंने एकलव्य पर नक़ल को बढ़ावा देने का आरोप लगाया. एकलव्य भी इस तरह के बड़े प्रयोग के लिए परिपक्व नहीं था. ऐसे कामों के लिए अच्छे जन संपर्क तंत्र की ज़रूरत पड़ती है, जो उसके पास नहीं था. आपको तमाम तरह के राजनीतिक खेमों और विचारों को साथ लेकर चलना होता है.

इस सरकार के हिसाब से सम्मान के लिए आप अप्रत्याशित उम्मीदार प्रतीत होते हैं. खास तौर पर अगर विज्ञान शिक्षा के आपके नज़रिए को या उन लोगों को देखें जिनके साथ आपने काम किया या जिनसे आप प्रभावित हुए?

मैंने पद्म सम्मानों का कभी हिसाब नहीं रखा. लेकिन प्रधानमंत्री ने अपने ‘मन की बात’ में कहा कि सूची में कई लोग ऐसे हैं जिनके बारे में कभी सुना नहीं गया और सरकार ने काम को तवज्जो दी है, नाम को नहीं. शायद मैं इस छोटी सी सूची में भी आ गया. लेकिन इस सम्मान ने मुझे ख़ुशी दी.

2014 में सेवानिवृत्त होने के बाद आप क्या कर रहे हैं?

मैं बच्चों की किताबों का अनुवाद करता हूं. मैं इन किताबों से चमत्कृत रहता हूँ. पिछले साल मैंने असामान्य बच्चों के लिए 35 किताबों का अनुवाद किया. 40 पृष्ठों वाली ये सुन्दर सचित्र किताबें हैं जिनके 70% हिस्से  में चित्र बने हुए हैं. मैं दो दिन में एक किताब का अनुवाद कर लेता हूं. पिछले साल मैंने 170 किताबों का हिंदी में अनुवाद किया और अपनी वेबसाइट के आर्काइव में डाल दिया. एक दिन हम सब जीवित नहीं रहेंगे, लेकिन आने वाली पीढ़ियों के लिए हमें थोड़ी बेहतर दुनिया ज़रूर छोड़नी चाहिए.

 

अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय

साभार: https://scroll.in/article/867374/allow-children-the-freedom-to-break-things-that-is-how-they-are-going-to-learn-says-arvind-gupta

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स्पेस X ने किया ‘फैल्कन हेवी’ रॉकेट का सफल परीक्षण!

कल अमरीकी उद्यमी एलोन मस्क की कंपनी Space X ने दुनिया के अब तक के सबसे शक्तिशाली रॉकेट Falcon Heavy का सफल परीक्षण किया। मस्क को दुनिया का सबसे असाधारण उद्यमी माना जाता है जो बेहद विशाल स्तर की और नई तकनीकों को ईजाद कर रहे हैं।

यह परीक्षण उड़ान थी जिसका मुख्य उद्देश्य भविष्य की उड़ानों के लिए आंकड़े इकट्ठा करना था। मस्क की योजना है कि आने वाले दशकों में मनुष्यों को मंगल ग्रह पर पहुंचाया जाए, और उसके बाद सौर मंडल के अन्य ग्रहों की भी यात्रा संभव बनाई जाए। यह उड़ान कई मामलों में ऐतिहासिक है।

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सबसे शक्तिशाली इंजन होने के अलावा इसमें रॉकेट बूस्टर (booster) को दोबारा इस्तेमाल करने की तकनीक भी इस्तेमाल की गई। अभी तक रॉकेट उड़ान भरने के बाद बेकार हो जाते थे और पृथ्वी पर वापस गिर जाते थे जिससे वे दोबारा इस्तेमाल नहीं किए जा सकते थे। इससे उड़ान की लागत बहुत बढ़ जाती थी। अपने पिछले परीक्षणों में Space X ने रॉकेट को दोबारा लैंड करने की यह तकनीक सफलता से इस्तेमाल की थी, और रॉकेट को जमीन और पानी के जहाज पर लैंड किया था।

Space X के पिछले कई परीक्षण असफल भी रहे थे।

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इस तकनीक को अब की बार Falcon Heavy में इस्तेमाल किया गया। रॉकेट में तीन बूस्टर थे- किनारे के दो और बीच का मुख्य बूस्टर। कुल मिलाकर Falcon Heavy में 27 इंजन थे। मगर फर्क यह था कि इस बार ये रॉकेट बहुत ज्यादा ऊंचाई और गति पर वापस पृथ्वी की ओर लौटने वाले थे।

27 जनवरी 2015 को जारी किए गए अपने एनीमेशन वीडियो में Space X ने इस उड़ान की योजना बताई थी। कल की असली उड़ान की वीडियो से पहले यह वीडियो देखना अच्छा रहेगा:

इसके अनुसार तीनों बूस्टर वापस लौट आएंगे और payload (सैटेलाइट) अंतरिक्ष में छोड़ दिया जाएगा। भले ही यह केवल परीक्षण उड़ान होनी थी, फिर भी Space X अंतरिक्ष में सैटेलाइट छोड़ना चाहता था।

कुछ दिन पहले मस्क ने बताया कि वे सैटेलाइट के बजाय अपनी लाल टेस्ला कार को अंतरिक्ष में भेज रहे हैं! मस्क की एक और कंपनी है Tesla, जो सौर ऊर्जा से चलने वाली गाड़ियां बनाती है। यह उनकी खुद की कार थी। यानी इस वक्त एक कार पृथ्वी का चक्कर लगा रही है! उसमें एक एस्ट्रोनॉट का पुतला बैठा है। कार की ऑर्बिट की परिधि धीरे-धीरे बढ़ती जाएगी और आने वाले कुछ महीनों में वह मंगल ग्रह तक पहुंच जाएगी!

कल की उड़ान का वीडियो यहां देखें और एनीमेशन से तुलना करें:

इस परीक्षण में बीच के मुख्य बूस्टर को समुद्र में एक जहाज पर लैंड करना था पर वह सफलतापूर्वक वापस लैंड नहीं कर पाया। वापस आते वक्त उसके तीन इंजन में से सिर्फ 1 ही चालू हो पाया। वह जहाज से 300 फ़ीट दूर पानी में गिरा और क्षतिग्रस्त हो गया। जहाज को भी कुछ नुकसान पहुंचा। लेकिन Space X के लिए यह उतनी बुरी बात नहीं है क्योंकि परीक्षण में कोई खामी होने का मतलब है कि उन्हें भविष्य की वास्तविक उड़ानों में हो सकने वाली गलतियों की जानकारी/ आंकड़े अभी मिल जाएंगे।

अंतरिक्ष में यात्रा कर रही मस्क की कार में कैमरा लगा है जो पृथ्वी पर वीडियो भेज रहा है। आप उस कार से आ रही वीडियो को Live देख सकते हैं!

 

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डार्विन और जीव-विकास #3

“अरे, पर डार्विन ने थ्योरी ही तो दी है न! थ्योरी बोले तो सिद्धान्त! सिद्धान्त तो मैं भी दे सकता हूँ और आप भी!”
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विज्ञान में सबसे बड़ी कुछ समस्याएँ तब शुरू होती हैं जब उसमें इस्तेमाल होने वाले शब्दों का लोग ग़लत अर्थ समझते हैं। ये अर्थ विज्ञान में आम जीवन से आये हैं, लेकिन विज्ञान में इनका कुछ ख़ास अर्थ होता है। और जब तक यह ख़ास अर्थ न पता हो, तब तक विज्ञान पढ़ने वाला सामान्य व्यक्ति उस शब्द को आम जीवन की तरह ही समझता है।

‘थ्योरी’ शब्द की हिन्दी ‘सिद्धान्त’ मानी गयी है। आम आदमी से पूछकर देखिए कि थ्योरी क्या है। वह कहेगा ‘जो केवल सैद्धान्तिक हो’। और कुरेदिए, तो कहेगा ‘जिसका अभी प्रायोगिक रूप न हुआ हो या न हो पाया हो’। यानी प्रयोग (प्रैक्टिकल) जहाँ शुरू होता है, वहाँ थ्योरी का अन्त होता है। थ्योरी एक इलाक़ा है — जहाँ वह समाप्त होती है, वहीं प्रैक्टिकल यानी प्रयोग आरम्भ होता है।

इसी सोच को लेकर वह कह देता है कि ‘डार्विन ने तो मात्र थ्योरी ही दी थी न इवॉल्यूशन (evolution) की! प्रैक्टिकल कहाँ से किया और कैसे करेंगे? विकास तो लाखों सालों में होता है, तो किसी लैब में बैठकर घण्टे-भर में बता न सकेंगे। इसीलिए जो फट्टे मारने थे, मार दिये होंगे!’

मुझे इस तरह की अज्ञानता-अनभिज्ञता पर न आश्चर्य होता है और न हँसी आती है। यह स्वाभाविक है। आप जब विज्ञान में प्रवेश करते हैं तो उससे पहले आपके दिमाग़ में हज़ारों ऐसे शब्द होते हैं जिनके आपको साधारण अर्थ पता होते हैं। लेकिन इनका विज्ञान में अर्थ कुछ और होता है। पर आप नये प्रयोग के साथ पुराना अर्थ चिपका रहे होते हैं। नतीजन आप विज्ञान के उस शब्द को ग़लत पढ़ रहे होते हैं।

लगे हाथ मैं दो और शब्द संग ले लेता हूँ: हायपोथीसिस (hypothesis) और लॉ (law)। हायपोथीसिस को हिन्दी में ‘परिकल्पना’ कहा जाता है और लॉ को ‘नियम’।

आम आदमी से आप पूछिए कि परिकल्पना, सिद्धान्त और नियम में क्या सम्बन्ध हैं, तो वह यह कहेगा कि ‘पहले परिकल्पना करो, फिर सिद्धान्त गढ़ो और अन्त में प्रयोग से सिद्ध हो जाए तो उसे नियम बना दो’। सत्य यह है कि ऐसा कहने वाला विज्ञान को तनिक भी ढंग से नहीं समझता।

परिकल्पना, सिद्धान्त और नियम, तीनों एकदम जुदा चीज़ें हैं। परिकल्पना परियों की कवि-कल्पना नहीं है कि जो चाहा कल्पित कर लिया। उसका एक तार्किक तरीका होता है। परिकल्पना करने वाला व्यक्ति कुछ घटना घटते देखता है और तब एक शिक्षित अनुमान लगाता है। ध्यान रहे यह अन्दाज़ा अन्धा नहीं होता, उसमें कुछ दिशा होती है। जो होता दिखे और जिसे आप वर्तमान सिद्धान्त से समझा न पाएँ, उसे समझाने की कोशिश करें। यही कोशिश परिकल्पना यानी हाइपोथीसिस है। अब यह समझ प्रयोग की बलिवेदी पर चढ़ेगी: वह सच साबित हो सकती है और झूठ भी। परिकल्पना करने के बाद उसका परीक्षण होता है| यह ज़रूरी है। बिना परीक्षण के कोई भी परिकल्पना वैज्ञानिक कसौटी पर कसी नहीं जा सकती। परीक्षण के बाद वह सत्य भी हो सकती है और असत्य भी।

अभी परिकल्पना को यहीं छोड़िए और सिद्धान्त व नियम की ओर बढ़िए, क्योंकि हमें डार्विन तक पहुँचना है। नियम किसी भी व्यक्ति या व्यक्तियों द्वार ध्यानपूर्वक देखे गये दृश्यों का निरूपण होता है। यह एक ऑब्ज़र्वेशन (observation) है। कई बार इसे गणित की भाषा में निरूपित किया जाता है। गुरुत्व का नियम बताता है कि हर बार धरती पर सेब गिराओगे, नीचे गिरेगा। कोई भी गिरा ले। पृथ्वी पर कहीं भी। यह नियम न्यूटन गणित की भाषा में फॉर्मूले या सूत्र के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

लेकिन नियम अगर एक दृष्टिगत सत्य है तो सिद्धान्त उनकी व्याख्या (explanation) है। व्याख्या यानी कपोलकल्पित जो-मन-में-आया-सो नहीं। सैद्धान्तिक व्याख्या विज्ञान के क्षेत्र में सबसे ऊँची और सम्मानजनक बात है। नियम बताता है कि ‘ऐसा होता है’। वह ‘क्यों’ और ‘कैसे’ के बारे में कुछ नहीं कहता।

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सिद्धान्त यह बताता है कि ‘ऐसा कैसे होता है’। अगर आप वैज्ञानिकों से कहेंगे कि मैं डार्विन के विकासवाद को नहीं मानता, तो वे कहेंगे कि ‘न मानिए’। डार्विन का विकासवाद अब वहाँ से परिष्कृत होकर बहुत आगे आ गया है। कई चीज़ें जोड़ी गयी हैं। आप न मानिए, लेकिन कुछ जोड़िए या फिर घटाइए। लेकिन तर्कपूर्ण ,और हो सके तो प्रायोगिक ढंग से। ऐसे ही नहीं। ‘डार्विन-का-विकासवाद’ में आप डार्विन पर अटक गये हैं। आपको डार्विन को ग़लत सिद्ध करना है, क्योंकि आप अपने धर्म से अभिभूत हैं। विज्ञान डार्विन के पीछे नहीं चलता, वह किसी भी डार्विन-आइंस्टाइन से बहुत-बहुत-बहुत बड़ा है।

बात दरअसल विकासवाद पर होनी चाहिए। उसकी कमियों पर तर्कसंगत ढंग से चर्चा होनी चाहिए। लेकिन आप डार्विन पर अटके पड़े हैं, जबकि विकासवाद डार्विन की बाँह छोड़कर बहुत आगे आ गया है।

फिर बात उठती है कि डार्विन ने विकासवाद के प्रयोग कैसे किये। तो इसके लिए यह जानिए कि डार्विन का समय वह था जब हमें न जीन का पता था, न डीएनए का। कोशिका के भीतर के हज़ारों-लाखों रहस्य हमें न ज्ञात थे। ऐसे में वह आदमी पूरे विश्व के जीवों-पौधों को जीवित अथवा जीवाश्म-रूप में पढ़-समझकर उनके वर्गीकरण के माध्यम से विकासवाद को सामने रखता है। और ऐसा करने वाला वह अकेला नहीं था, कई अन्य वैज्ञानिक भी थे जिनके नाम मैं अभी यहाँ छोड़ रहा हूँ।

विज्ञान में प्रत्यक्ष देखने का महत्त्व है लेकिन कई बार परोक्ष प्रमाण भी उसमें बहुत बड़ा काम कर जाते हैं। आइंस्टाइन ने जब अपना फ़ोटोएलेक्ट्रिक इफ़ेक्ट (photoelectric effect) दिया, तो प्रत्यक्ष न फ़ोटॉन देखे और न एलेक्ट्रॉन। उन्होंने वे घटनाएँ देखीं और जानीं जो हो रही थीं और उन्हें गणितीय रूप में प्रस्तुत किया। वे सत्य थीं।

डार्विन ने पृथ्वी-रूपी-प्रयोगशाला का भरपूर और शानदार इस्तेमाल किया। तरह-तरह के जीव देखे और तब प्रजातियों के विकास का अपना सिद्धान्त सामने रखा। उन्होंने चलते-फिरते मुँह उठाकर थ्योरी नहीं बाँच दी।

विज्ञान में आपकी काट के लिए पूरी अन्य वैज्ञानिकों की पूरी जमात बैठी है। यह उन लोगों की बिरादरी है जो आपसे कबुलवाती है कि आप अपनी ही बात की काट के बारे में क्या सोचते हो। इसलिए यहाँ आत्म-निस्तारण सबसे पहले सिखाया जाता है। संसार का श्रेष्ठतम वैज्ञानिक वह है, जो अपने ही सिद्धान्त की काट नित्य सोचा करता है।

आपको लगता है डार्विन ने यह सब न सोचा होगा? और क्या आपने डार्विन को ख़ारिज करते समय अपनी ही काट सोची है?

विकासवाद पर चलते रहेंगे — डार्विन के साथ भी, डार्विन से आगे भी।

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साभार: डॉ. स्कन्द शुक्ला

चित्र: इन्टरनेट से

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डार्विन और जीव-विकास #2

आप अपने भाई-बहन से पैदा नहीं होते; आप और आपके भाई-बहन किन्हीं और से पैदा होते हैं। वे कोई और आपके माँ-बाप हैं, जिनसे आपको अपनी देह प्राप्त हुई है। इसलिए यह मत कहिए कि आदमी बन्दर से निकला है’। यह कहिए कि ‘आदमी और बन्दर एक ही जीव से निकले हैं। वह जीव कोई ‘और’ था।’

‘अगर ऐसा है तो फिर ऐसा कोई मनुष्य दिखाइए जो पूरी तरह विकसित न हुआ हो। मेरा मतलब है कि ऐसा प्राणी जो मनुष्य हो रहा हो, लेकिन हुआ न हो। मुझे रास्ते का राही दिखाइए, तब मैं रास्ते को मानूँगा। आपने कह दिया कि ‘जीटी रोड पेशावर से कोलकाता जाती है’ पर मैं क्यों मान लूँ। मुझे तो एक ट्रक देखना है जो पेशावर से चला हो लेकिन कोलकाता न पहुँचा हो… रास्ते में हो। और वह रास्ता आपकी बतायी जीटी रोड हो। तब विश्वास करूँगा।’

यह कथन कहने वाले की जीव-विज्ञान की समझ की दयनीयता बताता है। मान लीजिए कोई श्वेत अमेरिकी है जिसके पुरखे उत्तर यूरोपीय थे। उत्तरी यूरोप से कई साल पहले लोग चले और सम्पूर्ण यूरोप में फैल गये। उनमें से किसी का वंशज यह अमेरिकी भी है। अब कोई यह पूछे कि ‘वह उत्तर यूरोपीय पूर्वज कहाँ है जिससे तुम निकले हो, हमें दिखाओ।’

वह पुरखा तो कब का मर चुका। वर्तमान व्यक्ति उससे निकला है। उसके कई अन्य कज़िन हैं, जो यूरोप में अलग-अलग जगहों बाशिन्दे हैं। लेकिन अब आप उस पुराने व्यक्ति को कहाँ से पाएँगे जो विगत हो चुका है?

लेकिन फिर बात मनुष्य के उन विगत पुरखों के जीवाश्मों की होती है। ‘ऐसा कोई सबूत पेश कीजिए जो आदमी-जैसे न हों बल्कि उनके पुरखों जैसे हों।’

दरअसल समस्या ‘मनुष्य’ शब्द से जुड़ी सोच के साथ है। ‘मनुष्य’ का अर्थ हममें से बहुत से लोग ‘आज का मानव’ मानते हैं। हम नहीं सोच पाते कि कभी इस धरती पर निएंडरथल (neanderthal) भी थे। हम जावा-पीकिंग (java peking) मानवों के अवशेषों से उनके जीवन को समझने की कोशिश तो करते हैं, लेकिन उन्हें कोई आदिवासी मानकर बात ख़त्म कर लेते हैं। मानव-विकास की कड़ियाँ इतनी पुरानी हैं कि कोई भी आदिवासी कालक्रम में इन प्राक्-मानवों के आसपास भी नहीं फटकता।

गोरिल्ला मनुष्य नहीं बनेगा, वह आपका भाई है। न चिम्पैंज़ी बनेगा, वह भी आपकी तरह उस मुख्य शाखा से निकला एक जानवर है। न ही मैकाक बन्दर बनेगा; वह भी एक अन्य जीव है जो आपकी तरह निकला है। ये सभी टहनियाँ जिस बड़े तने की हैं, वह लाखों-लाख साल पहले बँटनी शुरू हो गयी थी। वह जीव गोरिल्ला-चिम्पैंज़ी-मानव-मैकाक सभी प्राइमेटों का साझा पुरखा था।

फिर आपके पास अन्य जीवों के विकास की कड़ियाँ हैं। आपके पास आर्कियोप्टैरिक्स (archaeopteryx) है जो पक्षी-पूर्वज है लेकिन आधुनिक पक्षियों-सा नहीं है। आपके पास डक-बिल्ड-प्लेटिपस (duck billed platypus) जैसा आधुनिक जीव है, जो आधुनिक है और जिसमें पक्षी, सरीसृप व स्तनपायी तीनों के लक्षण हैं। आपके पास क्रमशः विकसित होता अंग-ज्ञान है, जो एक विकास-क्रम दर्शाता है। आपके पास आनुवंशिकी है जो विभिन्न जीवों में जीनों में विकास-शृंखला स्थापित करती है। आपका विकास-क्रम स्वतन्त्र नहीं है, आप कोई विशिष्ट नहीं हैं। आप किसी बड़े क्रम का हिस्सा हैं, जिसके अन्य जीव भी हिस्से हैं।

अतीत जब बहुत पुराना होता है तो खोयी कड़ियाँ ढूँढ़नी मुश्किल होती हैं। अगर कोई कड़ी मिल भी जाए, तो हम उसके पूरे-पूरे सत्यापन के लिए उसका कड़े-से-कड़ा इम्तेहान लेते हैं: ‘तुम विकासवाद बताने आये हो.. यह बताओ, वह बताओ… यहाँ कमी है, वहाँ कमी है… यह अधूरा है, वह अधूरा है’| लेकिन ये ही लोग अपने-अपने धर्मग्रन्थों के आगे नतमस्तक-करबद्ध होकर ‘दयानिधे! महाप्रभो!’ का भक्तिनाद करते नज़र आते हैं। वहाँ कोई प्रश्न नहीं, वहाँ कोई सन्देह नहीं।

इनका तर्क केवल उसपर चलता है, जो उनको झकझोरता है। और जो पुराना है, वह चाहे असत्य क्यों न हो, उसके लिए उनके मुँह में केवल आस्था की ‘अहा’ है।

डार्विन पर अभी और-और अलग-अलग बातें, विस्तार से किन्तु धीरे-धीरे …

साभार: डॉ. स्कन्द शुक्ला

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