आश्चर्य और उत्साह- रेचल कार्सन

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साभार: https://zenpencils.com/comic/carson/

हाई रेसोलुशन में यहां डाउनलोड करें (दो भाग)

 

 

 

 

 

 

 

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प्रकृति, वैज्ञानिकों के उद्गार, सीखना और सिखाना में प्रकाशित किया गया | Tagged , , , , , , , | टिप्पणी करे

समाचार देखना छोड़ने के बाद आप जिन चीजों पर गौर करने लगते हैं

डेविड केन

मैं इस सोच के साथ बड़ा हुआ कि समाचारों से लगातार वाकिफ रहने से आप बेहतर नागरिक बनते हैं. आज, समाचार देखना छोड़ने के 8 साल बाद, मुझे यह विचार बचकाना लगता है- कि हर दिन सूचना के एक नीरस उत्पाद का उपभोग करके आप किसी तरह से एक चिंतनशील और जागरूक नागरिक बनते हैं जिससे समाज का कोई भला होता है.

मगर मैं आज भी ऐसे कई लोगों से मिलता हूं जो एक बुद्धिमान, सक्रिय वयस्क द्वारा दैनिक समाचार देखना छोड़ देने की बात को सिरे से खारिज कर देते हैं.

मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मैं मुख्यतः टी.वी. और इन्टरनेट न्यूज़कास्ट देखने की बात कर रहा हूं. यह लेख पत्रकारिता को ही खारिज करने के बारे में नहीं है. CNN पर आधा घंटा किसी शरणार्थी संकट को देखना (ऐसा नहीं है कि अब भी वे इसे कवर करते हैं) और उसी विषय पर 5000 शब्दों का कोई विश्लेषात्मक निबंध पढ़ने के बीच बहुत बड़ा अंतर है.

अगर आप समाचार देखना छोड़ दें, सिर्फ एक महीने के लिए ही, तो आपको अपनी समाचार देखने की आदत बहुत भद्दी और गैर-जरूरी लगेगी, शायद तम्बाकू के उस लती की तरह जिसे सिगरेट छोड़ने के बाद तम्बाकू की गंध बहुत बुरी लगती है.

कुछ चीजें जिनपर आप गौर करने लगते हैं:

#1: आप बेहतर महसूस करते हैं

समाचार देखना छोड़ने का एक आम लक्षण है मनोदशा (mood) में सुधार होना. समाचारों के लती आपसे कहेंगे कि ऐसा इसलिए है क्योंकि आपने वास्तविकता से मुंह चुराकर अपना सिर रेत में गाड़ लिया है.

मगर यह तर्क इस मान्यता पर आधारित है कि समाचार देखना खुली-ताजी हवा में सांस लेने जैसा है. उन्हें यह एहसास नहीं होता है कि समाचारों के आधार पर दुनिया का जो चित्र आप अपने मन में बनाते हैं, असली दुनिया उससे बहुत अलग होती है.

समाचार दुनिया की सटीक छवि बनाने में रूचि नहीं रखते हैं. वे ऐसी चीजें चुनते हैं जो 1) असामान्य हों 2) विध्लित करने वाली हों, और 3) जो लोकप्रिय/ चर्चित बन सकें. इसलिए यह सोचना कि समाचार देखने से आप इस “दुनिया की स्थिति” का कोई सही अंदाजा लगा पाएंगे, बहुत बचकाना विचार है.

उनकी खबरों का चुनाव हमारे मनोवैज्ञानिक नकारात्मकता पूर्वाग्रह/ negativity bias का फायदा उठाने के लिए होता है (नकारात्मकता पूर्वाग्रह: अगर समान प्रबलता की दो खबरें दी जाएं, तो सकारात्मक या न्यूट्रल खबर की अपेक्षा नकारात्मक खबर का हम पर ज्यादा प्रभाव पड़ता है). हमारा जैविक विकास भय और गुस्से की चीजों पर ज्यादा ध्यान देने के लिए हुआ है, मगर इसका यह अर्थ नहीं है कि भय या गुस्से की हर घटना हमारे लिए फायदेमंद ही होती है. जब आप समाचार देखना छोड़ देते हैं, तो आपको समझ आने लगता है कि दर्शक को परेशान या क्रोधित करना संयोग नहीं, बल्कि समाचारों का मुख्य उद्देश्य होता है.

एक न्याय परायण व्यक्ति के चिंतन-चिंता की लिस्ट में जो चीजें होती हैं, वे समाचारों में शामिल नहीं होती हैं. वही दिखाया जाता है जो बिकता है, और जो चीज़ बिकती है वह है डर, और दूसरे समुदायों के प्रति नफ़रत.

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इसलिए अपनी लिस्ट खुद बनाइए. आप ज्यादा गहरे और प्रमाणिक स्रोतों से दुनिया के बारे में सूचना पा सकते हैं, बजाय कि उन स्रोतों से जहां सिर्फ आधा दिन लगाकर सूचना का पैकेज पेश कर दिया जाता है.

#2: आप समाचार देखकर वास्तव में कुछ हासिल नहीं कर रहे थे

अगर आप किसी से पूछें कि समाचार देखकर वे क्या हासिल कर लेते हैं, तो आप अस्पष्ट धारणाएं सुनेंगे, जैसे “जागरुक रहना हमारा नागरिक कर्तव्य है!” या “यह जानना जरूरी है कि दुनिया में क्या हो रहा है” या “हम इन मुद्दों पर आंखें बंद तो नहीं कर सकते हैं”, और इनमें से कोई भी हमारे सवाल का जवाब नहीं देता है.

“जागरुक रहना” एक उपलब्धि लग सकती है, मगर इससे लगता है कि कोई भी सूचना चलेगी. आप बसों की समय सारणी पढ़कर भी तो सूचना पा सकते हैं.

समाचार देखना छोड़ने के एक महीने बाद ही यह बता पाना मुश्किल हो जाता है कि ऐसा करने से आपने कौनसी फायदेमंद चीज़ों से खुद को महरूम कर दिया है. तब यह स्पष्ट हो जाता है कि इतने सालों तक समाचार देखने से आपको अपना जीवन बेहतर करने, स्थायी ज्ञान पाने, या दूसरों की मदद करने लायक कुछ भी हासिल नहीं हुआ. और यह समय आपने दूसरी फायदेमंद चीजों को न करके निकाला. कल्पना कीजिए कि अगर इतना सारा समय आपने कोई नई भाषा सीखने, किताबें पढ़ने या समाचारों में दिखाए जाने वाले मुद्दों पर गहरे लेख पढ़ने में लगाया होता.

आप पाएंगे कि आपके समाचार देखना छोड़ने से कैबिनेट की नियुक्तियां अभी भी वैसे ही हो रही हैं जैसे पहले होती थीं, और आपके बिना भी आपदा राहत के कार्य हमेशा की तरह किए जा रहे हैं. यानी, “दुनिया पर नजर रखने” की आपकी आदत से दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ा.

हमें कहीं से यह धारणा विरासत में मिली है- शायद उस ज़माने से जब दिन में केवल एक घंटे समाचार आते थे- कि उस दिन के सबसे चर्चित मुद्दे की सतही जानकारी होने से किसी तरह उन लोगों के जीवन में फर्क पड़ता है जो इन मुद्दों से प्रभावित होते हैं.

#3: वर्तमान मुद्दों पर हो रही ज्यादातर चर्चाएं सिर्फ लोगों की उटपटांग बातें भर होती हैं

“क्योंकि इससे आपको दैनिक चर्चाओं में भाग लेने में मदद मिलती है!” इस सवाल का एक कमजोर लेकिन कम-से-कम अर्थपूर्ण उत्तर है कि “तुम्हें क्या हासिल हुआ”. मगर जब आप इन चर्चाओं में भाग लेना बंद कर देते हैं, और दूसरों को बात करता हुआ देखते हैं, तो आप पाते हैं कि लगभग किसी को भी नहीं पता होता है कि वह क्या बोल रहा है.

‘किसी मुद्दे की न्यूनतम प्रामाणिक समझ होना’ और ‘उसके बारे में समाचारों से जानना’ के बीच में बहुत बड़ा अंतर होता है. अगर आप अपने आस-पास किसी मुद्दे पर हो रही ‘चाय पर चर्चा’ के पास हों और आप उस मुद्दे के बारे में वाकई समझ रखते हों, तो आप उनकी छिछली बातें साफ़-साफ़ पहचान जाते हैं. यह देखना बहुत ही मजेदार होता है कि केवल कुछ घंटे समाचार देखने के बाद लोग कितने आत्मविश्वास और जोश से मुद्दों पर पक्ष लेकर बहस करने लगते हैं.

भले ही हम गलत हों, चतुराई भरी बातें करने और पक्ष लेने से हमें बहुत अच्छा महसूस होता है, और ऐसा करने के लिए समाचार हमें बहुत अच्छा अवसर देते हैं. जितना आप किसी चीज़ के बारे में कम जानते हैं, उतना उसके बारे में बड़े दावे करना आसान हो जाता है, क्योंकि समाचारों के चश्मों से वह चीज सरल और ब्लैक-एंड-वाइट दिखती है और आप आश्वस्त होकर मत बना लेते हैं कि उसके बारे में अगला कदम क्या होना चाहिए.

अगर हम अलग-अलग लोगों और समूहों के आपसी सम्बन्ध सुधारने की मंशा रखते हैं, तो शायद दुनिया को जो आखिरी चीज़ चाहिए वह है किसी विषय पर सिर भिड़ाते दो लोग जिन्होंने उसके बारे में समझ समाचार देखकर बनाई है.

#4: “जागरुक” रहने के अन्य कहीं बेहतर विकल्प हैं

हम सब एक जागरुक समाज में रहना चाहते हैं. समाचार लोगों को सूचना देते हैं, मगर मुझे नहीं लगता है कि वे अच्छी तरह से लोगों को जागरुक करते हैं.

“सूचना” के स्रोतों की हर तरफ भरमार है. शैम्पू की बोतल के पीछे लिखी चीजें भी सूचना होती हैं. आज हमारी सोखने की क्षमता से कहीं ज्यादा सूचना उपलब्ध है, इसलिए हमें ध्यान देना होगा कि हम किन चीज़ों को अपना समय देते हैं. समाचार सूचना का अनंत विस्तार देते हैं, मगर बहुत सीमित गहराई के साथ, और उनका उद्देश्य साफ़-तौर से हमें विचिलित करना होता है, शिक्षित करना नहीं.

जितने मिनट आप समाचार देखने में लगाते हैं, उतने ही मिनट आप दुनिया को जानने के अन्य तरीकों से खुद को दूर रखते हैं. सारे अमरीकी मिलकर शायद हर दिन करोड़ों घंटे समाचार देखते हैं. इतने समय कितनी किताबें पढ़ीं जा सकती थीं.

किसी विषय पर तीन किताबें पढ़ लीजिए और आप उस विषय पर दुनिया की 99% आबादी से ज्यादा जान जाएंगे. सालों तक हर दिन कई घंटे समाचार देखते रहिए और आपके पास सिर्फ हजारों कहानियों की ‘चाय पर चर्चा’ स्तर की सतही जानकारी मात्र होगी.

अगर हम केवल जानकारी के विस्तार पर ध्यान दें, बजाय की समझ की गहराई के, तो ‘जानने’ और ‘गलत समझ होने’ में ज्यादा अंतर नहीं है.

#5: मुद्दों के बारे में “चिंता करना” हमें सांत्वना देता है कि हम उनके बारे में कुछ कर रहे हैं जबकि वास्तव में हम कुछ नहीं कर रहे होते हैं

समाचार अन्याय और त्रासदी के बारे में होते हैं, और जब लोगों को कष्ट हो रहा होता है तो यह स्वाभाविक है कि इनपर ध्यान न देने से हम असहज महसूस करते हैं. भले ही समाचार सतही हों, उनमें दिखाए गए मुद्दे (अक्सर) असली होते हैं…टीवी जितना दिखा सकता है उससे कहीं ज्यादा असली. लोग हर समय कष्ट में हैं और मर रहे हैं, और भले ही उसे तोड़-मरोड़कर दिखाया जाए, इस पीड़ा को दिखाने पर उससे मुंह मोड़ने पर हमें ग्लानि महसूस होती है.

हम सोचते हैं कि अगर हम और कुछ नहीं कर सकते हैं तो कम-से-कम उसे नजरअंदाज करने से तो बच सकते हैं. इसलिए रुंधे हुए गलों और भीगी आंखों से हम टीवी पर समाचार देखते हैं. मगर इस तरह “चिंतित” होने से किसी की कोई मदद नहीं होती है, सिवाय आपको अपना ग्लानिभाव को थोड़ा कम करने में.

और मुझे शक है कि कहीं इससे और अधिक निष्क्रियता तो नहीं पसरती है. “कम-से-कम मैं परवाह तो करता/ करती हूं” का भाव असल में हमें कुछ ठोस कदम उठाने से विमुक्त कर सकता है, क्योंकि दूसरा को पीड़ा झेलते हुए देखकर आहें भरने से हमें इस सच्चाई से मुंह मोड़ने की छूट मिल जाती है कि हम खुद कुछ नहीं कर रहे हैं.

त्रासदी को टीवी में देखना, भले ही हम कुछ नहीं कर रहे हों, कम-से-कम टीवी बंद करने से तो ज्यादा दयालु महसूस होता है. सच यह है कि हममें से अधिकतर लोग इस दुनिया में हो रहे शोषण से पीड़ित लोगों की कोई भी सहायता नहीं कर पाएंगे, चाहे उन्हें टीवी पर दिखाया जा रहा हो या नहीं. और यह स्वीकार करना बेहद कठिन है. इसीलिए हमें लगता है कि अगर हम अपनी चिंता जाहिर कर दें, कम-से-कम खुद को, तो हमें यह कटु सत्य स्वीकार नहीं करना पड़ेगा. इसलिए हम बिना कुछ करे भी उसमें लिप्त रहते हैं.

समाचार बंद न करने का शायद हमारा सबसे बड़ा डर यही है. और इसीलिए समाचार बंद करने का शायद सबसे बड़ा कारण  भी यही होना चाहिए.

 

क्या आपने भी समाचार देखना छोड़ दिया है? आपने क्या गौर करना शुरू किया?

 

साभार: http://www.raptitude.com/2016/12/five-things-you-notice-when-you-quit-the-news/

चित्र: MIKE LICHT और BBC हिंदी

टेक्नोलॉजी और समाज में प्रकाशित किया गया | Tagged , , , , , | 1 टिप्पणी

कैसे टेक्नोलॉजी आपके दिमाग पर कब्ज़ा कर रही है

गूगल के भूतपूर्व डिज़ाइन नीतिकार ट्रिस्टन हैरिस का बेहद महत्वपूर्ण लेख, जो बताता है कि कैसे कॉर्पोरेट जगत की टेक्नोलॉजी कम्पनियां हर संभव तरीके से हमारे दिमाग पर कब्ज़ा करने की कोशिश करते रहती हैं, हमें पता चले बिना. लेख टेक्नोलॉजी कंपनियों के हथकंडों के बारे में हैं, लेकिन व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए ये हथियार एडवरटाइजिंग/ मार्केटिंग से लेकर राजनीति और अन्य कई क्षेत्रों में भी इस्तेमाल किए जाते हैं. टेक्नोलॉजी के मामले में गलती काफी हद तक हमारी भी है क्योंकि इसके दुष्प्रभावों से बचने के रास्ते/ निर्णय व्यक्तिगत स्तर पर भी मौजूद हैं; लेकिन अधिकांश लोग इससे अनभिज्ञ भी हैं और इसकी लत लगना बेहद आसान है.

एक जादूगर और गूगल के डिजाइन नीतिकार के विचार

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ट्रिस्टन हैरिस

(लेख को पढ़ने में लगने वाला अनुमानित समय : 12 मिनट)

 

“लोगों को बेवक़ूफ़ बनाना आसान है, बजाय कि उन्हें समझाना कि उन्हें बेवकूफ बनाया जा रहा है.” – अज्ञात

मैं एक विशेषज्ञ हूं जो जानता है कि टेक्नोलॉजी कैसे हमारी मनोवैज्ञानिक कमजोरियों का फायदा उठाती है. इसीलिए मैंने पिछले 3 साल गूगल के डिजाइन नीतिकार (design ethicist) बतौर काम किया, इस बात का ध्यान रखने के लिए कि चीजों को कैसे डिजाइन किया जाए ताकि 1 अरब लोगों के दिमागों को गुलाम बनने से बचाया जा सके.

हम जब भी टेक्नोलॉजी की बात करते हैं, तो हम बहुत सकारात्मक नजरिये से उन सारी चीजों पर ध्यान देते हैं जो यह हमारे लिए संभव बनाती है. मगर मैं आपको दिखाना चाहता हूं कि कैसे यह इसका ठीक उल्टा भी कर सकती है.

टेक्नोलॉजी कहां-कहां हमारे दिमाग की कमजोरियों का फायदा उठाती है?

मैंने इस तरह सोचना तब शुरू किया जब मैं एक जादूगर बना. जादूगर लोगों की अनुभव-क्षमता की सीमाओं और कमजोरियों को तलाशते हैं, ताकि वे लोगों के जाने बगैर उनसे अपनी मर्जी से काम करवा सकें. अगर एक बार आप जान जाएं कि लोगों को कैसे नियंत्रित करना है, फिर आप उन्हें एक वाद्य यंत्र की तरह मनमर्जी से बजा सकते हैं.

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यह मैं हूं, अपनी मां की जन्मदिन पार्टी में जादू दिखाते हुए

उत्पादों के डिज़ाइनर भी आपके दिमाग के साथ बिलकुल यही करते हैं. वे (जाने-अनजाने में) आपकी मनोवैज्ञानिक कमजोरियों को आपके खिलाफ इस्तेमाल करते हैं ताकि आपका ध्यान आकर्षित किया जा सके.

मैं आपको दिखाना चाहता हूं कि वे यह कैसे करते हैं.

दिमाग पर कब्ज़ा #1: अगर आप मेनू (menu) पर नियंत्रण करते हैं, तो आप विकल्पों पर भी नियंत्रण कर लेंगे

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पाश्चात्य संस्कृति व्यक्तिगत चुनाव और स्वंतत्रता के आदर्शों पर खड़ी है. लाखों लोग अपने “स्वतंत्र” चुनाव के अधिकार की रक्षा करने के लिए जोर-शोर से लड़ते हैं, जबकि हम इस बात पर ध्यान ही नहीं देते हैं कि हमारे विकल्पों को ऊपर से पहले ही उन मेनू द्वारा नियंत्रित किया जा रहा है जिन्हें हमने चुना ही नहीं था.

जादूगर बिलकुल यही करते हैं. वे लोगों को ‘विकल्प चुनने की स्वतंत्रता’ के भ्रम में रखते हैं, जबकि वे मेनू को इस तरह नियंत्रित कर रहे होते हैं जिससे उन्हीं की जीत होती है, भले ही आप कोई भी विकल्प चुनें. मैं चाह कर भी आपको अच्छे से नहीं बता पा रहा हूं कि यह बात कितनी गहरी है!

जब लोगों को कोई मेनू दी जाती है, तो वे कभी नहीं पूछते हैं कि:

  • “इस मेनू में क्या-क्या नहीं  है?”
  • “मुझे यही विकल्प क्यों दिए जा रहे हैं, कोई और क्यों नहीं?”
  • “क्या मैं मेनू बनाने वाले/वाली का मकसद जानता/जानती हूं?”

“क्या यह मेनू मेरी असली जरूरत को सशक्त करती है, या यह उससे मेरा ध्यान भटका रही है?” (उदाहरण: सुपरमार्केट में टूथपेस्टों से पटी हुई शेल्फ)

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यह मेनू मेरी असली जरूरत “मेरा टूथपेस्ट ख़त्म हो गया” को सशक्त करती है या कमजोर?

उदाहरण के लिए, कल्पना कीजिए कि आप मंगलवार रात को अपने दोस्तों के साथ बाहर गए हैं और आप अपनी बातचीत जारी रखना चाहते हैं. आप फोन में Yelp खोलते हैं ताकि आप नजदीक के बारों की सूची देख सकें. आपका समूह फोन के इर्द-गिर्द जमा हो जाता है और फिर बारों की तुलना करने लगता है. आप हर बार की फोटो देखते हैं और उसकी कॉकटेल ड्रिंक की तुलना करते हैं. क्या यह मेनू अब भी समूह की असली जरूरत पूरी कर रही है?

बात यह नहीं है कि बार में नहीं जाना चाहिए, मगर Yelp ने समूह की वास्तविक जरूरत (“हम बातचीत जारी रखने के लिए कहां जा सकते हैं?”) को दूसरे सवाल में बदल दिया (“किस बार की कॉकटेल की फोटो सबसे अच्छी हैं?”), सिर्फ मेनू का नियंत्रण करके.

और समूह यह भ्रम में है कि Yelp में वे सारे विकल्प मौजूद हैं कि उन्हें कहां जाना चाहिए. अपने फोन में सिर गड़ाने की वजह से वे लोग गली के छोर में उस पार्क नहीं देख पाते हैं जहां कुछ संगीतकार संगीत पेश कर रहे हैं. वे गली के दूसरी और नाश्ते और कॉफ़ी की दुकान नहीं देख पाते हैं. इनमें से कोई भी Yelp की मेनू पर नहीं दिखता है.

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Yelp समूह की असली जरूरत “हम बातचीत जारी रखने के लिए कहां जा सकते हैं?” को चुपके से ‘कॉकटेल की फोटो देखना’ में बदल देता है.

हमारे जीवन के सभी पहलुओं में (सूचना, कार्यक्रम, घूमने की जगहें, दोस्त, रुमानी सम्बन्ध, नौकरी) टेक्नोलॉजी हमें जितने ज्यादा विकल्प देती है, उतना ही हम इस भ्रम में फंसते जाते हैं कि हमारा फ़ोन हमेशा हमें सबसे सशक्त करने वाले विकल्प और मेनू देता है. क्या सच में ऐसा है?

‘सबसे सशक्त करने वाली मेनू’ और ‘सबसे ज्यादा विकल्प देने वाली मेनू’ में बहुत अंतर होता है. मगर जब हम आंख बंद करके सौंपी गई मेनू पर भरोसा कर लेते हैं, तो अंतर कर पाना मुश्किल हो जाता है:

  • “आज रात साथ समय बिताने के लिए कौन व्यस्त नहीं है?” बदल जाता है उस मेनू में कि “किन लोगों ने हाल ही में हमें मेसेज भेजा, जिन्हें हम मेसेज भेज सकते हैं?”
  • “दुनिया में क्या चल रहा है?” बदल जाता है खबरों की मेनू में.
  • “डेट पर जाने के लिए कौन सिंगल है?” बदल जाता है Tinder पर चेहरों की मेनू में (बजाय कि दोस्तों के साथ स्थानीय कार्यक्रम, या कोई नजदीकी एडवेंचर)
  • “मुझे इस ईमेल का उत्तर देना है” बदल जाता है कीबोर्ड के बटनों की मेनू में जिनसे मैं मेसेज टाइप कर सकता/सकती हूं (बजाय कि उस व्यक्ति से बेहतर संवाद करने के सशक्त माध्यमों में)

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सारे यूजर इंटरफ़ेस मेनू होते हैं. क्या होता अगर आपका ईमेल आपको उत्तर देने के ज्यादा सशक्त करने वाले विकल्प देता, बजाय कि “आप क्या उत्तर टाइप करना चाहते हैं?” (डिज़ाइन: ट्रिस्टन हैरिस)

जब हम सुबह उठते हैं और नोटिफिकेशन देखने के लिए अपना फोन उठाते हैं- तो वह “सुबह उठना” के अनुभव को बदलकर “कल से मुझसे क्या-क्या चीजें छूट गईं?” की मेनू में बदल देता है. (अधिक उदाहरणों के लिए जो एडलमैन की Empowering Design Talk देखें).

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सुबह उठते ही नोटिफिकेशन की सूची- उठने के बाद यह मेनू आपको कितना सशक्त करती है? क्या यह उन चीजों के बारे में है जो आपकी जिंदगी में अहमियत रखती हैं? (साभार: जो एडलमैन की Empowering Design Talk)

उन मेनू को नियंत्रित करके, जिनसे हम विकल्प चुनते हैं, टेक्नोलॉजी हमारी असली जरूरतों पर कब्ज़ा कर लेती है और उन्हें नए विकल्पों से बदल देती है. मगर हम जितना ज्यादा सौंपे गए विकल्पों पर ध्यान देंगे, उतना हमें एहसास होगा कि ये विकल्प हमारी असली जरूरतों से मेल नहीं खाते हैं.

 

दिमाग पर कब्ज़ा #2: अरबों लोगों की जेबों में कैसिनो की लॉटरी मशीन डाल दो

अगर आप एक ऐप होते, तो लोगों को खुद में कैसे उलझाए रखते? खुद को स्लॉट मशीन में बदलकर.

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एक औसत व्यक्ति दिन में अपना फोन 150 बार देखता है. हम ऐसा क्यों करते हैं? क्या हम 150 सोचे-समझे निर्णय लेते हैं?

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आप हर दिन अपना ईमेल कितनी बार खोलते हैं? अगर आपका ईमेल ऐसा मेसेज दिखाता तो?

इसका बहुत बड़ा कारण वह है जो लॉटरी मशीनों का नंबर एक मनोवैज्ञानिक हथियार है: अनिरंतर परिवर्ती ईनाम (intermittent variable reward).

अगर आपको किसी को सबसे कारगर तरीके से नशेड़ी बनाना है, तो टेक्नोलॉजी के डिज़ाइनरों को केवल इतना करना है कि इस्तेमाल करने वाले के कार्य को बदलते रहने वाले ईनाम से जोड़ दो. आप कुछ करते हैं और आपको तुरंत या तो कोई ईनाम मिलता है या कुछ भी नहीं. लत सबसे ज्यादा तब लगती है जब ईनाम मिलने की दर बदलते रहती है.

क्या यह सच में लोगों पर काम करता है? हां. अमरीका में स्लॉट मशीनें अकेले उतना पैसा कमाती हैं जितना बेसबॉल, सिनेमा और थीम पार्क के टिकट एक साथ मिलकर भी नहीं कमा पाते हैं. Addiction By Design की लेखक, न्यू यॉर्क विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नताशा डाउ शुल के अनुसार अन्य तरह के जुओं के मुकाबले लोग स्लॉट मशीनों के चिंताजनक स्तर के लती 3 से 4 गुना ज्यादा तेजी से होते हैं.

मगर दुखद सत्य यह है- अरबों लोगों की जेबों में स्लॉट मशीनें हैं:

  • जब हम अपना फोन बाहर निकालते हैं, तो हम स्लॉट मशीन से खेल रहे होते हैं, यह देखने के लिए कौनसा नोटिफिकेशन आया है.
  • जब हम ईमेल देखने के लिए रिफ्रेश करते हैं, तो हम स्लॉट मशीन से खेल रहे होते हैं, यह देखने के लिए कौनसी नई ईमेल आई.
  • जब हम इन्स्टाग्राम फीड देखने के लिए स्वाइप करते हैं, तो हम स्लॉट मशीन से खेल रहे होते हैं, यह देखने के लिए कि अगली फोटो कौनसी है.
  • जब हम Tinder जैसी डेटिंग ऐप में चेहरों को बाएं/ दाएं स्वाइप करते हैं, तो हम स्लॉट मशीन से खेल रहे होते हैं, यह देखने के लिए कि क्या हमें किसी ने पसंद किया.
  • जब हम फेसबुक के लाल गोले के नंबर पर क्लिक करते हैं, तो हम स्लॉट मशीन से खेल रहे होते हैं, यह देखने के लिए कि नंबर के नीचे कौनसे नोटिफिकेशन छुपे हैं.

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ऐप और वेबसाइट इस तरह के बदलने वाले ईनामों को अपने उत्पादों के बीच में डाले रहते हैं क्योंकि यह मुनाफे के लिए अच्छा है.

मगर अन्य परिस्थितियों में स्लॉट मशीनें संयोग से पैदा हो जाती हैं. जैसे सारी ईमेल के पीछे किसी का शैतानी दिमाग नहीं होता है जो जानबूझकर ईमेल को स्लॉट मशीन बनाता है. जब करोड़ों लोग अपनी ईमेल चेक करते हैं और वहां कुछ नया नहीं होता है, इससे किसी को कोई भी आर्थिक मुनाफा नहीं होता है. एप्पल या गूगल के डिज़ाइनरों ने यह नहीं चाहा  था कि फोन नशा बन जाएं. यह संयोग से हो गया.

मगर अब एप्पल और गूगल जैसी कंपनियों की जिम्मेदारी है कि वे लत लगाने वाले इन अनिश्चित ईनामों को बेहतर डिजाइन वाले सुनिश्चित ईनामों में बदलकर इन दुष्प्रभावों को कम करें. उदहारण के लिए, वे लोगों को यह चुनाव करने में मदद करके सशक्त कर सकते हैं कि वे ‘स्लॉट मशीन ऐप’ को दिन में या हफ्ते में कौनसे पूर्व-निर्धारित समय पर देखेंगे. और लोग यह भी निर्धारित कर सकें कि इस तय किए गए समय के अनुसार ही नए मेसेज और नोटिफिकेशन डिलीवर हों.

 

दिमाग पर कब्ज़ा #3: कोई जरूरी चीज छूट जाने का डर (Fear Of Missing Something Important- FOMSI)

एक और तरीका जिससे ऐप और वेबसाइट लोगों के दिमाग पर कब्ज़ा करते हैं यह है: दिमाग में यह शंका भर देना कि “अगर आप ऐप या वेबसाइट से दूर रहे, तो 1% संभावना है कि आपसे कोई जरूरी चीज छूट जाएगी!”

अगर मैं आपको यकीन दिला दूं कि मैं एक जरूरी माध्यम हूं- सूचना, मेसेज, दोस्त, या यौन संबंधों के अवसर बनाने का- तो आपके लिए मुझे बंद करना, मुझसे अनसबस्क्राइब करना, या अपना अकाउंट हटाना बहुत मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि अगर आपने ऐसा किया तो (आहा!) आपसे कोई जरूरी चीज छूट जाएगी:

  • इसी वजह से हम उत्पादों के न्यूज़लेटर से सबस्क्राइब्ड रहते हैं, भले ही इससे कोई फायदा न हो रहा हो (“अगर मुझसे भविष्य में कोई खबर छूट गई तो?”).
  • इसी वजह से हम उन लोगों के ‘दोस्त’ बने रहते हैं जिनसे हमने सालों से बात नहीं की है (“अगर मुझसे उनकी कोई जरूरी पोस्ट छूट गई तो?”).
  • इसी वजह से हम डेटिंग ऐप में चेहरे स्वाइप करते रहते हैं, भले ही उससे हमें कोई भी साथी न मिला हो (“अगर किसी बहुत सुन्दर आदमी/औरत ने मुझे पसंद कर लिया और मुझसे वह छूट गया/गई तो?”).
  • इसी वजह से हम सोशल मीडिया पर बने रहते हैं (“अगर मुझसे कोई जरूरी खबर छूट गई तो”, या “अगर मैं वह चीजें नहीं देख पाया/पाई जो मेरे दोस्त देख रहे हैं तो?”).

मगर जब हम इस डर को नजदीक से देखते हैं, तो हमें समझ में आता है कि इसका तो कोई अंत ही नहीं है: अगर हम किसी भी चीज का उपयोग बंद करते हैं तो हम हमेशा ही कोई-न-कोई जरूरी चीज को छोड़ेंगे ही.

  • अगर हम छठे घंटे भी फेसबुक का इस्तेमाल न करें, तो हमसे कोई जादुई लम्हा छूट जाएगा (जैसे, कोई पुराना दोस्त जो ठीक इसी वक्त मेरे शहर पहुंचा है).
  • हमसे Tinder पर कोई जादुई लम्हा छूट जाएगा (जैसे हमारे सपनों का साथी) अगर हम 700वीं बार भी चेहरा स्वाइप नहीं करेंगे.
  • अगर हम 24/7 नेटवर्क पर नहीं हैं तो हमसे कोई इमरजेंसी कॉल छूट जाएगी.

मगर एक लम्हे से दूसरे लम्हे में जीते जाना, इस भय में कि कुछ जरूरी न छूट जाए, हम इस तरह जीने के लिए नहीं बने हैं.

और एक बार हम इस डर को छोड़ दें, तो यह अद्भुत है कि हम कितनी जल्दी अपने भ्रम से बाहर आ जाते हैं! जब हम गैजेटों से एक दिन के लिए दूर रहते हैं, नोटिफिकेशन बंद या अनसबस्क्राइब कर देते हैं, या नेटवर्क से दूर किसी कैंप पर चले जाते हैं- जो संभावनाएं हमें चिंता से भर रही थीं, वे नहीं होती हैं.

हम जो देखते ही नहीं हैं, वह छूटता भी नहीं है.

यह चिंता कि “मुझसे कोई जरूरी चीज छूट गई तो?” अनप्लग, अनसबस्क्राइब या स्विच ऑफ करने से पहले ही होती है, बाद में नहीं. कल्पना कीजिए अगर टेक्नोलॉजी कम्पनियां यह समझतीं, और हमें अपने दोस्तों से और कार्यक्षेत्र में सम्बन्ध बेहतर करने में मदद कर रही होतीं, इस पैमाने पर कि “मेरा समय कितना अच्छा बीता”, बजाय कि ‘मुझसे कुछ छूट जाएगा’.

 

दिमाग पर कब्ज़ा #4: लोगों द्वारा पसंद किया जाना

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किसी व्यक्ति को फेसबुक पर मिलने वाला सबसे शक्तिशाली प्रोत्साहन शायद यही है.

दूसरों द्वारा पसंद किया जाना हम सब की कमजोरी होती है. किसी समूह का हिस्सा होना या दोस्तों द्वारा पसंद किए जाने की हमारी बहुत प्रबल इच्छा होती है. मगर अब हमारा पसंद किया जाना टेक्नोलॉजी कंपनियों के हाथों में है.

जब मेरा दोस्त मार्क मुझे टैग करता है, तो मैं सोचता हूं कि उसने मेरे बारे में खासतौर से सोचकर मुझे टैग किया होगा. मगर मुझे यह नहीं दिखता कि फेसबुक जैसी कंपनी ने उससे यह कैसे करवाया.

फेसबुक, इन्स्टाग्राम या स्नैपचैट निर्धारित करते हैं कि कोई व्यक्ति कितनी बार किसी फोटो में टैग होगा, क्योंकि उनका अल्गोरिदम फोटो के चेहरे देखकर खुद-ब-खुद सुझाव देता है कि किन लोगों को टैग किया जाना चाहिए (जैसे एक बॉक्स आता है “Tag Tristan in this photo?” और केवल एक क्लिक करके मैं टैग हो जाता हूं).

इसलिए जब मार्क मुझे टैग करता है, वह दरअसल फेसबुक के सुझाव पर अमल कर रहा होता है, नाकि कोई स्वतंत्र निर्णय ले रहा होता है. मगर इस भ्रम के जरिए फेसबुक लाखों लोगों के लिए झूठे अनुभूति का निर्माण करता है और उनके अनुभवों को नियंत्रित करता है.

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फेसबुक इस तरह के ऑटोमैटिक मेसेज दिखाकर कई लोगों को टैग करवाता है

ठीक ऐसा तब भी होता है जब हम अपनी प्रोफाइल फोटो बदलते हैं- फेसबुक को पता है कि यह ऐसा क्षण है जब हम दूसरों द्वारा पसंद किए जाने के लिए बेचैन हैं: “मेरे दोस्त मेरी नई फोटो के बारे में क्या सोचते हैं?” फेसबुक इसको दूसरों की न्यूज़ फीड में ज्यादा प्राथमिकता देता है, ताकि आपकी फोटो सबसे ऊपर और काफी देर तक आपके दोस्तों को दिखते रहे और वे उसे लाइक कर सकें या उसपर कमेंट कर सकें. जितनी बार वे लाइक या कमेंट करते हैं, उतनी बार हम खींचे चले जाते हैं.

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दिमाग पर कब्ज़ा #5: सामाजिक लेन-देन

  • तुम मेरा कोई काम करते हो- अगली बार मुझे तुम्हारा एहसान चुकाना चाहिए.
  • तुम “Thank you” कहते हो- मुझे “You’re welcome” कहना चाहिए.
  • तुम मुझे ईमेल भेजते हो- अगर मैं उत्तर न दूं तो यह बद्तमीजी होगी.
  • तुम मेरी बात मानते हो- अगर मैं तुम्हारी बात न मानूं तो यह बद्तमीजी होगी (खासतौर से किशोरों में व्याप्त धारणा).

हमारी कमजोरी होती है कि हम दूसरों की क्रिया की प्रतिक्रिया देने के लिए बाध्य महसूस करते हैं. मगर दूसरों द्वारा पसंद किए जाने की मनोवैज्ञानिक जरूरत की तरह ही, टेक्नोलॉजी कम्पनियां यह नियंत्रित करती हैं कि हम कितनी बार इसका अनुभव करेंगे.

कभी-कभी ऐसा संयोग से होता है. ईमेल, टेक्स्ट और मेसेज ऐप सामाजिक लेन-देन की फैक्ट्रियां होते हैं. मगर बाकी समय कम्पनियां इस कमजोरी का जानबूझ कर फायदा उठाती हैं.

सबसे जाहिर तौर पर यह अपराध LinkedIn करता है. LinkedIn चाहता है कि ज्यादा से ज्यादा लोग एक-दूसरे को प्रतिक्रिया देने के लिए बाध्य हों, क्योंकि जब भी वे प्रतिक्रिया देते हैं (रिक्वेस्ट स्वीकार करना, मेसेज का उत्तर देना, किसी के कार्यकौशल को एंडोर्स करना) उन्हें LinkedIn पर वापस आना होगा और तब वे लोगों से अपनी वेबसाइट पर और समय बिता सकते हैं.

फेसबुक की ही तरह, LinkedIn लोगों की अपूर्ण समझ का फायदा उठाता है. जब आपको किसी की रिक्वेस्ट मिलती है, तो आपको लगता है कि वह आपके बारे में सचेत रूप से सोचकर आपको रिक्वेस्ट भेज रहा/रही है, जबकि वास्तविकता में शायद वह अचेत रूप से LinkedIn के सुझाव के अनुसार रिक्वेस्ट भेज रहा/रही है. यानी, LinkedIn आपकी अचेत इच्छा (किसी व्यक्ति से “जुड़ना”) को एक सामाजिक बाध्यता में बदलकर लाखों लोगों को सचेत रूप से प्रतिक्रिया करने को मजबूर करता है. और ऐसा करने में लोग जो समय लगाते हैं, उससे LinkedIn को फायदा होता है.

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सोचिए, लाखों लोगों की दिनचर्या में हर दिन इस तरह का व्यवधान पड़ना, और वे सिर कटे मुर्गों की तरह अफरा-तफरा में दौड़ रहे हैं, दूसरों को प्रतिक्रियाएं देते हुए- और यह सब उन कंपनियों का करा है जिन्हें इससे फायदा होता है.

सोशल मीडिया में आपका स्वागत है.

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LinkedIn पर अगर एक व्यक्ति आपके कार्यकौशल को एंडोर्स करता/करती है, तो LinkedIn आपकी प्रतिक्रिया देने की कमजोरी का फायदा उठाकर आपको बदले में चार अन्य लोगों को एंडोर्स करने को कहता है.

कल्पना कीजिए अगर टेक्नोलॉजी कम्पनियों की यह जिम्मेदारी होती कि वे सामाजिक लेन-देन की बाध्यता को कम-से-कम करें. या अगर जनहित में कोई स्वतंत्र संस्था होती जो नजर रखती कि किस तरह टेक्नोलॉजी कंपनियां लोगों की इन कमजोरियों का फायदा उठा रही हैं.

 

दिमाग पर कब्ज़ा #6: अंतहीन कटोरा, अंतहीन फीड (feed) और ऑटोप्ले

लोगों के दिमाग पर कब्ज़ा करने का एक और तरीका है उन्हें लगातार उपभोग कराते रहना, तब भी जब उनकी भूख ख़त्म हो गई हो.

कैसे? बहुत आसान है. एक ऐसा अनुभव लीजिए जो सीमित था और उसे एक अंतहीन प्रवाह में बदल दीजिए जो ख़त्म ही नहीं होता है.

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एक काउंटडाउन के बाद यूट्यूब अपने आप अगली वीडियो प्ले कर देता है.

कॉर्नेल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ब्रायन वैन्सिंक ने अपने शोध में दिखाया है कि आप लोगों को लगातार सूप पीने में लगाए रख सकते हैं अगर आप एक अंतहीन कटोरा लें जो ख़त्म होते ही खुद-ब-खुद फिर से भर जाता है. इस अंतहीन कटोरे की वजह से लोग सामान्य से 73% ज्यादा कैलोरी खा जाते हैं और पूछने पर, कि उन्होंने कितनी कैलोरी खाई, वे 140 कैलोरी कम का अनुमान लगाते हैं.

टेक्नोलॉजी कम्पनियां भी इसी सिद्धांत का फायदा उठाती हैं. न्यूज़ फीड के अंत तक स्क्रोल करने के बाद व फिर से पूरा भर जाता है ताकि आप स्क्रोल करते रहें और ऐसी कोई गुंजाइश ही न रहे कि आप रुक जाएं और बंद करने की सोचें.

इसी वजह से Netflix, यूट्यूब और फेसबुक अगली वीडियो को एक काउंटडाउन के बाद ऑटोप्ले कर देते हैं बजाय कि आपके सचेत निर्णय के लिए रुकें. इन वेबसाइटों में बिताया गया बहुत सारा समय इस ऑटोप्ले के कारण ही है.

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टेक्नोलॉजी कम्पनियां कहती हैं कि “हम तो केवल लोगों के लिए उनकी पसंद की वीडियो देखना आसान बना रहे हैं” जबकि असल में वे अपने मुनाफे के दांव-पेंच चल रही होती हैं. और आप उन्हें दोष नहीं दे सकते हैं, क्योंकि उनकी होड़ है ही इस बात की कैसे आप “समय बिताएं”.

कल्पना कीजिए कि इसके बजाय अगर टेक्नोलॉजी कम्पनियां आपको अपना अनुभव सचेत रूप से सीमित करने में मदद कर रही होतीं, उन पैमानों पर जिनके अनुसार आप कहें कि “समय अच्छा बीता”. और केवल आपको सीमित समय बिताने में ही नहीं, बल्कि यह निर्धारित करने में भी मदद करती कि आपके लिए क्या पैमाने होने चाहिए जिससे आप निर्धारित करेंगे कि “समय अच्छा बीता”.

 

दिमाग पर कब्ज़ा #7: तत्काल व्यवधान बनाम “आदरपूर्ण” डिलीवरी

कंपनियों को पता है कि वे मेसेज या नोटिफिकेशन जो तुरंत व्यवधान डालते हैं, लोगों को प्रतिक्रिया देने के लिए ज्यादा बाध्य करते हैं, बजाय कि वे मेसेज जो देर से डिलीवर होते हैं (जैसे ईमेल या डिफर्ड इनबॉक्स).

अगर छूट हो, तो फेसबुक मैसेंजर (या व्हट्सऐप, वीचैट या स्नैपचैट) अपने मेसेजिंग सिस्टम को तुरंत व्यवधान डालने के लिए डिज़ाइन करेंगे (और चैट बॉक्स दिखाएंगे) बजाय कि लोगों को एक-दूसरे की एकाग्रता और निजता का सम्मान करने में मदद करने के.

दूसरे शब्दों में, बिज़नस के लिए व्यवधान अच्छे हैं.

और उनके फायदे में यह भी है कि लोगों में सामाजिक लेन-देन की बाध्यता और व्याकुलता बढ़े. उदहारण के लिए, फेसबुक मेसेज भेजने वाले को बता देता है कि आपने कब उनका मेसेज “देखा”, बजाय कि आपको यह बात सार्वजनिक न होने देने में मदद करने के (“क्योंकि तुम्हें पता चल गया है कि मैंने तुम्हारा मेसेज देख लिया है, अब मैं तुम्हें उत्तर देने के लिए और बाध्य महसूस करुंगा/ करुंगी”).

इसके विपरीत, एप्पल आदरपूर्वक यूजर को छूट देता है कि वह “Read Receipts” ऑन या ऑफ करे.

दिक्कत यह है कि, बिज़नस के नाम पर ज्यादा-से-ज्यादा व्यवधान उत्पन्न करने की वजह से वैश्विक स्तर पर लोगों की एकाग्रता भंग की जाती है और हर दिन बेवजह के अरबों व्यवधान पैदा किए जाते हैं. यह एक बहुत बड़ी समस्या है जिसे हमें साझा डिज़ाइन मानकों के जरिए सुलझाना होगा.

 

दिमाग पर कब्ज़ा #8: आपके मकसद को उनके मकसद से जोड़ देना

एक और तरीका जिससे ऐप आपके दिमाग पर कब्ज़ा करती हैं यह है कि वे ऐप इस्तेमाल करने के आपके मकसद (कोई काम करना) को लेती हैं और बिज़नस के लिए उसे अविभाज्य रूप से अपने मकसद से जोड़ देती हैं (ऐप खोलने के बाद आप ऐप का ज्यादा-से-ज्यादा इस्तेमाल करें).

उदहारण के लिए, (अमरीकी सन्दर्भ में) ग्रोसरी स्टोर में लोगों के जाने का #1 और #2 कारण हैं दवाई और दूध लेना. मगर वे चाहते हैं कि लोग ज्यादा-से-ज्यादा खरीददारी करें, इसलिए वे इन दोनों चीजों को दुकान के सबसे पिछले हिस्से में रखते हैं.

दूसरे शब्दों में, वे ग्राहकों के मकसद (दूध और दवाई लेना) को अपने बिज़नस के मकसद से अविभाज्य तरीके से जोड़ देते हैं. अगर वे वास्तव में लोगों की जरूरतों का समर्थन करने के लिए व्यवस्थित किए गए होते, तो वे सबसे लोकप्रिय वस्तुएं सबसे आगे रखते.

टेक्नोलॉजी कम्पनियां भी अपनी वेबसाइट इसी तरह बनाती हैं. उदहारण के लिए, अगर आप फेसबुक पर आज रात होने वाली इवेंट देखना चाहते हैं (आपका मकसद), तो फेसबुक आपको सीधे-सीधे ऐसा नहीं करने देता है और आपको न्यूज़ फीड के पेज से ही शुरु करवाता है (उसका मकसद), और ऐसा जानबूझकर किया जाता है. फेसबुक खोलने का आपका मकसद कुछ भी हो, फेसबुक उसे हर तरह से अपने मकसद में बदल देता है जो यह है कि आप फेसबुक पर ज्यादा-से-ज्यादा समय बिताएं.

कल्पना कीजिए कि इसके बजाय अगर:

  • ट्विटर आपको ट्वीट पोस्ट करने का अलग रास्ता देता, जिसमें जबरन उसकी न्यूज़ फीड न देखनी पड़ती.
  • फेसबुक आपको आज रात होने वाली फेसबुक इवेंट्स देखने का अलग रास्ता देता, जिसमें जबरन उसकी न्यूज़ फीड न देखनी पड़ती.
  • थर्ड पार्टी ऐप और वेबसाइट में अकाउंट बनाने के लिए फेसबुक आपको ‘फेसबुक कनेक्ट’ इस्तेमाल करने का अलग रास्ता देता, जिसमें जबरन फेसबुक का पूरा ऐप, न्यूज़ फीड और नोटिफिकेशन इनस्टॉल नहीं करने पड़ते.

एक ऐसी दुनिया में, जहां “समय अच्छा बीतता” है, आपका मकसद पूरा करने का एक सीधा रास्ता हमेशा होता है जो बिज़नस के मकसद से अलग होता है. कल्पना कीजिए, एक डिजिटल “अधिकारों का विधेयक”, जिसमें डिज़ाइन के मानक दिए गए होते जिन्हें इन कंपनियों को मानना ही पड़ता, ताकि अरबों लोग सीधे-सीधे अपना काम कर सकें और जबरदस्ती डाले गए भटकावों में न उलझें.

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कल्पना कीजिए, अगर आपका वेब ब्राउज़र आपको सीधे-सीधे वह करने देता जो आप करना चाह रहे हैं- ख़ास तौर से उन वेबसाइटों के लिए जो जानबूझकर आपको भटकाती हैं.

 

दिमाग पर कब्ज़ा #9: कठिनाई भरे विकल्प

हमें बताया जाता है कि यह काफी है कि बिज़नस “विकल्प उपलब्ध कराएं”.

  • “अगर आपको पसंद नहीं आता है तो आप कभी भी दूसरा उत्पाद चुन सकते हैं.”
  • “अगर आपको पसंद नहीं आता है तो आप कभी भी अनसबस्क्राइब कर सकते हैं.”
  • “अगर आपको हमारी ऐप की लत लग गई है तो आप इसे कभी भी अनइनस्टॉल कर सकते हैं.”

स्वाभाविक तौर से, वे विकल्प जो बिज़नस चाहते हैं कि आप चुनें, उन्हें वे आसान बना देते हैं, और जो विकल्प वे चाहते हैं कि आप न चुनें, उन्हें वे कठिन बना देते हैं. जादूगर भी यही करते हैं. आप दर्शक के लिए वह विकल्प चुनना आसान कर देते हैं जो आप चाहते हैं कि वह चुने, और बाकी विकल्पों को चुनना आप कठिन बना देते हैं.

उदहारण के लिए, NYTimes.com आपको “स्वंतत्र चुनाव करने देता है” कि आप अपना डिजिटल सब्सक्रिप्शन निरस्त कर दें. लेकिन “Cancel Subscription” पर क्लिक करके सीधे-सीधे सब्सक्रिप्शन निरस्त करने के बजाय, वे आपको एक ईमेल भेजते हैं जिसमें सब्सक्रिप्शन निरस्त करने के लिए एक फ़ोन नंबर पर कॉल करने के निर्देश दिए गए होते हैं और आप कॉल केवल कुछ ख़ास समय के बीच ही कर सकते हैं.

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NYTimes दावा करता है कि वह आपको स्वतंत्र चुनाव करने की आज़ादी देता है.

दुनिया को विकल्पों की उपलब्धता के चश्मे से देखने के बजाय, हमें विकल्पों को चुनने और अमल में लाने की कठिनाई के हिसाब से देखना चाहिए. कल्पना कीजिए ऐसी दुनिया की, जहां विकल्पों के साथ यह लेबल लगा हो कि उसे चुनने और कार्यान्वित करने में कितनी कठिनाई होगी, और एक स्वतंत्र संस्था होती जो ये लेबल लगाती और मानक तय करती कि विकल्पों को चुनना कितना आसान होना चाहिए.

 

दिमाग पर कब्ज़ा #10: अनुमान लगाने में गलती करना, ‘दरवाजे पर पैर अड़ाकर अन्दर घुस जाना’

आखिर में, ऐप लोगों कि एक और कमजोरी का फायदा उठाती हैं: लोग सही अनुमान नहीं लगा पाते हैं कि एक क्लिक करने के बाद वे उस जगह कितना समय बिताएंगे.

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फेसबुक एक क्लिक से फोटो देखने का आसान रास्ता मुहैया करता है (“See Photo”). अगर क्लिक की सही समय-लागत बताई जाती, तो क्या आप तब भी क्लिक करते?

लोग स्वाभाविक रूप से यह अनुमान नहीं लगा पाते हैं कि एक क्लिक की कितनी कीमत है, यानी क्लिक करने की बाद उनका कितना समय लगने वाला है. सेल्स करने वाले लोग “दरवाजे में पैर अड़ाना” वाली तरकीब इस्तेमाल करते हैं जहां वे शुरुआत में एक मामूली सी अनुमति मांगते हैं (“केवल एक क्लिक करके देखिए कि कौनसा ट्वीट रीट्वीट किया गया”) और फिर वहां से चीजों को आगे ले जाते हैं (“अब आ ही गए हैं तो थोड़ी देर रुक क्यों नहीं जाते हैं?”). लगभग सभी वेबसाइट यह तरकीब इस्तेमाल करती हैं.

कल्पना कीजिए अगर वेब ब्राउज़र और स्मार्टफोन, जिनके जरिए लोग ये विकल्प चुनते हैं, लोगों की सच में देखभाल कर रहे होते और उन्हें हर क्लिक की कीमत अनुमान लगाने में मदद कर रहे होते (वेबसाइटों के उपयोग सम्बंधित आंकड़ों के आधार पर; जैसे क्रोम ब्राउज़र का Hindsight एक्सटेंशन जो आपका फेसबुक जैसी वेबसाइटों का इस्तेमाल करने का तरीका दर्ज करके आपको जानने में मदद करता है कि उस वेबसाइट से आपको कितना फायदा या नुकसान हुआ.

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इसीलए मैं अपने लेखों की शुरुआत में “लेख को पढ़ने में लगने वाला अनुमानित समय” लिखता हूं. जब आप लोगों को किसी विकल्प को चुनने की “सच्ची कीमत” बताते हैं, तो आप उनका आदर कर रहे होते हैं. “समय अच्छा बीता” के पैमाने पर काम वाली इन्टरनेट की दुनिया में विकल्पों को उनकी कीमत और फायदे के साथ पेश किया जाएगा, ताकि लोग स्वाभाविक रूप से सोच-समझ कर चुनाव करें, नाकि उन्हें ज्यादा काम करके और समय बर्बाद करने इसका एहसास हो.

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TripAdvisor “दरवाजे में पैर अड़ाना” तरकीब का इस्तेमाल करके लोगों को केवल एक क्लिक करके उन्हें रेटिंग देने के लिए कहता है, जबकि उस एक क्लिक के पीछे सर्वे के 3 पेज छिपे होते हैं.

क्या आप चिंतित हैं कि टेक्नोलॉजी आपके दिमाग पर कब्ज़ा कर रही है? मैं भी हूं. मैंने केवल कुछ ही तरीके बताए हैं, पर वास्तव में ऐसे हजारों तरीके हैं. उन ढेरों किताबों, सेमीनारों, कार्यशालाओं और प्रशिक्षणों के बारे में सोचिए जो ये हथकंडे टेक उद्यमियों को सिखाते हैं! उन हजारों इंजीनियरों के बारे में सोचिए जिनका हर दिन यही काम है कि आपको उलझाए रखने के नए-नए तरीके ईजाद करें!

सबसे बड़ी आज़ादी है एक स्वतंत्र सोच होना, और हमें ऐसी टेक्नोलॉजी चाहिए जो हमारी टीम में हो, और हमें आज़ाद तरीके से जीने, अनुभव करने, सोचने और चुनने में मदद करे.

हमें ऐसे स्मार्टफोन, नोटिफिकेशन स्क्रीन और ब्राउज़र चाहिए जो हमारे मन को प्रतिबिंबित करते हों और जिनके साथ हमारे ऐसे सम्बन्ध हों जो हमारे मूल्यों को प्राथमिकता दें, नाकि हमारे भावनात्मक आवेगों को. लोगों का समय बेहद कीमती होता है. और हमें उनके समय की उतनी ही निष्ठा और गंभीरता से रक्षा करनी चाहिए जितना हम उनके मानवाधिकारों की करते हैं.

ट्रिस्टन हैरिस गूगल में 2016 तक उत्पाद दार्शनिक (Product Philosopher) थे जहां उन्होंने अध्ययन किया कि कैसे टेक्नोलॉजी अरबों लोगों का जीवन, व्यवहार और  बेहतरी प्रभावित करती है. “समय अच्छा बीता” (Time Well Spent) के बारे में और जानने के लिए http://timewellspent.io देखें.

 

मुझे अपनी सोच विकसित करने में जो एडलमैन, एज़ा रैस्किन, रैफ डी’अमिको, जोनाथन हैरिस और डेमन होरोविज़ ने काफी प्रभावित किया है.

मेनू और विकल्प चुनने सम्बंधित मेरा काम जो एडलमैन के Human Values and Choicemaking क्षेत्र में किए गए काम से बेहद प्रभावित है.

साभार: https://journal.thriveglobal.com/how-technology-hijacks-peoples-minds-from-a-magician-and-google-s-design-ethicist-56d62ef5edf3

चित्र: मूल लेख से (सम्पादित) और इन्टरनेट से

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शिक्षा किसलिए है?

आधुनिक शिक्षा की नींव के छह भ्रम, और उन्हें बदलने के लिए छह नए सिद्धांत

डेविड ओर

हम सीखने को अपने-आप में अच्छा मानने के आदी हैं. मगर जैसा पर्यावरण शिक्षक डेविड ओर बताते हैं, हमारी अब तक की शिक्षा ने एक तरह से एक दानव को पैदा किया है. यह निबंध उनके 1990 में अरकांसस कॉलेज के अंतिम वर्ष के विद्यार्थियों को दिए गए वक्तव्य में से लिया गया है. इइसे पढ़कर हमारे ऑफिस में कई लोगों को लगा कि ऐसे भाषण कॉलेज जीवन की शुरूआत के बजाय आखिर में क्यों कराए जाते हैं.

डेविड ओर ‘मीडोक्रीक प्रोजेक्ट’ के संस्थापक हैं, जो फॉक्स, एरिज़ोना, में एक पर्यावरण शिक्षा केंद्र है, और वे ओहायो के ओबर्लिन कॉलेज में शिक्षक भी हैं. आर्क इंटरनेशनल के त्रैमासिक पत्र ऐनल्स ऑफ़ अर्थ, वॉल्यूम VIII, नं. 2 से पुनर्प्रकाशित.

 

अगर आज पृथ्वी का कोई औसत दिन है, तो आज हम 116 वर्ग मील वर्षावन खो देंगे, यानी लगभग एक एकड़ प्रति सेकंड. इंसानों के कुप्रबंधन और अत्यधिक जनसंख्या के कारण बढ़ते हुए रेगिस्तानों के सामने हम 72 वर्ग मील वन और खो देंगे. आज हम 40 से 100 प्रजातियां खो देंगे, और कोई नहीं जानता है कि यह संख्या 40 है या 100. आज इंसानों की आबादी में 2,50,000 लोग और जुड़ जाएंगे. और आज हम 2,700 टन क्लोरोफ्लोरोकार्बन और डेढ़ करोड़ टन कार्बन वायुमंडल में डाल देंगे. आज रात पृथ्वी थोड़ी और गर्म हो जाएगी, इसका पानी थोड़ा और अम्लीय हो जाएगा, और जीवन का ताना-बाना थोड़ा और उधड़ जाएगा.

सच तो यह है कि ऐसी अधिकांश चीजें गंभीर खतरे में हैं जिनपर आपके भविष्य का स्वास्थ्य और सम्पन्नता टिके हैं: पर्यावरणीय स्थिरता, प्राकृतिक तंत्रों की सहनशीलता और उत्पादकता, प्राकृतिक जगत की सुन्दरता, और जैव विविधता.

ध्यान देने लायक बात यह है कि यह सब कुछ अनपढ़ अज्ञानी लोगों का करा-धरा नहीं है. यह अधिकांशतः BA, BS, LLB, MBA जैसी ऊंची डिग्रियों वाले लोगों की करतूतों का परिणाम है. पिछले साल मोस्को के ग्लोबल फोरम में एली वीसल ने ऐसा ही कुछ कहा था जब उन्होंने कहा कि नाज़ी होलोकॉस्ट की क्रूरता के योजनाकार और कर्ता, इमैनुएल कांट और योहान गेटे जैसे लोगों की धरोहर के उत्तराधिकारी थे. कई मामलों में जर्मन लोग दुनिया के सबसे बेहतरीन शिक्षित लोगों में से थे, मगर उनकी शिक्षा उनकी बर्बरता को रोकने में नाकाम रही. उनकी शिक्षा के साथ क्या गड़बड़ हुई? वीसल के शब्दों में, उनकी शिक्षा में “मूल्यों के बजाय थ्योरी की ज्यादा अहमियत थी, मनुष्यों के बजाय अवधारणाओं की, प्रश्नों के बजाय उत्तरों की, और विवेक के बजाय विचारधारा और कार्यक्षमता की.”

हम कह सकते हैं कि प्राकृतिक जगत के बारे में हमारी शिक्षा ने हमें भी ऐसा ही सोचने का आदी बनाया है. यह कोई मामूली बात नहीं है कि इस ग्रह पर लम्बे समय तक सामंजस्य और स्थिरता से रहने वाले लोग पढ़ नहीं सकते थे, या कम-से-कम पढ़ने की हवस नहीं रखते थे. मेरा कहने का तात्पर्य इतना है कि शिक्षा अपने आप में सभ्यता, बुद्धिमता या विवेक नहीं देती है. इसी तरह की शिक्षा जारी रखने से हमारी समस्याएं बढ़ने वाली ही हैं. मैं अज्ञानता की वकालत नहीं कर रहा हूं, बल्कि यह कह रहा हूं कि अब हमें शिक्षा का मोल सभ्य समाज के निर्माण और मनुष्यों के बचे रहने के पैमानों पर नापना होगा- 1990 और इसके बाद के दशकों में हमारे सामने मौजूद ये दो सबसे बड़े मुद्दे हैं.

सही साधन, वहशी उद्देश्य

आधुनिक संस्कृति और शिक्षा के साथ क्या गड़बड़ हुई? साहित्य में कुछ उत्तर मिलता है: क्रिस्टफर मार्लो का फॉस्ट, जो ज्ञान और शक्ति पाने के लिए अपनी आत्मा बेच देता है; मैरी शेली का डॉक्टर फ्रेंकेंस्टाइन, जो अपने सृजन की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर देता है; हर्मन मेलविल का कैप्टेन अहाब जो कहता है “मेरे सारे साधन सही हैं, मेरी मंशा और उद्देश्य वहशी हैं”. इन पात्रों में हम आधुनिक समाज की प्रकृति को जीत लेने की उन्मादी हवस दिखती है.

ऐतिहासिक रूप से, फ्रांसिस बेकन ने ज्ञान और शक्ति का जो समागम सुझाया था वह आज की सरकारों, उद्योगों और ज्ञान की मिलीभगत का पूर्व-सूचक था जिसकी वजह से इतना विनाश हुआ है. गैलिलीयो का बुद्धिमता को ऊंचा स्थान दिलाना विश्लेषक दिमाग का रचनात्मकता, हास्य और आतंरिक पूर्णता पर हावी होने का पूर्व-सूचक था. और देकार्ते की ज्ञानमीमांसा में स्वयं और वस्तु के जबरदस्त अलगाव की जड़ें दिखती हैं. इन तीनों ने मिलकर आधुनिक शिक्षा की नींव रखी, ऐसी नींव जो उन भ्रमों का हिस्सा बन चुकी है जिन्हें हम बिना सवाल किए स्वीकार कर चुके हैं. मैं ऐसे छह भ्रम बताऊंगा.

पहला भ्रम यह है कि अज्ञानता की समस्या सुलझाई जा सकती है. अज्ञानता की समस्या सुलझाई नहीं जा सकती है, बल्कि यह मानवीय अस्तित्व का अभिन्न अंग है. ज्ञान की बढ़ोतरी अपने साथ हमेशा किसी दूसरे तरह की अज्ञानता भी बढ़ाती है. 1930 में जब टॉमस मिज्ले जूनियर ने CFC खोजे, तो अभी तक जो सिर्फ एक मामूली अज्ञानता थी अब वह मनुष्य की जीवमंडल (biosphere) के बारे में समझ की एक बेहद गंभीर और घातक कमी के रूप में उभरी. 1970 की शुरूआत तक किसी ने भी यह नहीं सोचा था कि “यह पदार्थ किस चीज को कैसे प्रभावित करता है?” और 1990 तक CFC से वैश्विक स्तर पर ओजोन परत पतली हो चुकी थी. CFC की खोज की वजह से हमारा ज्ञान बढ़ा; मगर एक फैलते हुए वृत्त की परिधि की तरह हमारी अज्ञानता भी बढ़ी.

दूसरा भ्रम यह है कि पर्याप्त ज्ञान और टेक्नोलॉजी के साथ हम पृथ्वी का प्रबंधन कर सकते हैं. “पृथ्वी का प्रबंधन करना” सुनने में बहुत अच्छा लगता है. यह हमारे कंप्यूटर, बटनों और गैजेटों के प्रति आकर्षण को बढ़ाता है. मगर पृथ्वी और इसके जैविक तंत्रों की जटिलता का कभी भी सुरक्षित प्रबंधन नहीं किया जा सकता है. हमें तो अभी ऊपरी मिट्टी के सबसे ऊपरी इंच की पारिस्थिकी (ecology) के बारे में ही ज्यादा कुछ नहीं पता है, और ना ही इसका जीवमंडल के विशाल तंत्रों के साथ सम्बन्ध के बारे में.

अगर किसी चीज का प्रबंधन किया जा सकता है तो वह हम हैं: मानवीय इच्छाएं, आर्थिकी, राजनीति, और समुदाय. मगर राजनीति, नैतिकता, और व्यावहारिक बुद्धि जो कठिन विकल्प सुझाते हैं, हम उनसे आंखें चुराते रहते हैं. यह कहीं ज्यादा बुद्धिमता भरा है कि हम खुद को एक सीमित ग्रह के अनुरूप ढाल लें, बजाय कि इस ग्रह को अपनी असीमित इच्छाओं के अनुरूप बदलें.

तीसरा भ्रम यह है कि ज्ञान बढ़ रहा है और इसके साथ मानवीय अच्छाई भी बढ़ रही है. अभी एक सूचना क्रान्ति हो रही है, जिससे मेरा तात्पर्य है डाटा, शब्द, कागज़ से. मगर इस सूचना क्रान्ति को ज्ञान या विवेक की क्रान्ति मानना बेवकूफी होगा जिसे इतनी आसानी से नापा नहीं जा सकता है. सच तो यह है कि कुछ प्रकार का ज्ञान बढ़ रहा है और दूसरे प्रकार का ज्ञान खो रहा है. डेविड एहरन्फील्ड ने बताया है कि जीव विज्ञान विभाग अब वर्गीकरण-विज्ञान (taxonomy) और पक्षी-विज्ञान में नए लोगों को नहीं ले रहा है. यानी मॉलिक्यूलर बायोलॉजी और जेनेटिक इंजीनियरिंग, जो आकर्षक हैं मगर ज्यादा जरूरी नहीं, उनपर अत्यधिक जोर के कारण दूसरे तरह का महत्वपूर्ण ज्ञान खो रहा है. हमारे पास अभी भी भूमि स्वास्थ्य सम्बन्धी जरूरी विज्ञान नहीं है, जिसका आह्वाहन अल्डो लियोपोल्ड ने आधी सदी पहले किया था.

हम केवल कुछ ही क्षेत्रों में ज्ञान नहीं खो रहे हैं, बल्कि समुदायों का पारंपरिक ज्ञान भी खो रहे हैं. बैरी लोपेज़ के शब्दों में:

“मैं यह निष्कर्ष निकालने के लिए बाध्य हो रहा हूं कि अगर खतरनाक नहीं तो कुछ अजीब जरूर हो रहा है. साल-दर-साल जमीनी अनुभव रखने वाले लोगों की संख्या घट रही है. ग्रामीण लोग शहर पलायन कर रहे हैं… यह व्यक्त कर पाना मुश्किल है, पर व्यक्तिगत और स्थानीय ज्ञान के पतन के इस दौर में, वह ज्ञान जिसपर वास्तविक समुदाय टिका होता है और जिसपर आखिरकार एक देश को खड़ा होना होता है, बहुत खतरनाक और असहज होता जा रहा है.”

सूचना और ज्ञान की इस भ्रान्ति में एक गहरी भूल छुपी हुई है, जो यह है कि ज्यादा सीखने से हम बेहतर इंसान बन जाएंगे. मगर सीखना, जैसा लोरेन ईज़्ली ने एक बार कहा था, अंतहीन है और “यह अपने-आप हमें ज्यादा नैतिक इंसान नहीं बना पाएगा.” आखिर में, बाकी सभी क्षेत्रों में हमारे विकास के कारण सबसे ज्यादा खतरा अच्छाई की हमारी समझ को है. सभी चीजों को मद्देनजर रखते हुए यह संभव है कि हम लोग ऐसी चीजों के बारे में अज्ञानी होते जा रहे हैं जो पृथ्वी पर सामंजस्य और स्थिरता से जीने के लिए जरूरी हैं.

उच्च शिक्षा का चौथा भ्रम है कि हम जो कुछ भी बिगाड़ चुके हैं उसे फिर से पर्याप्त रूप से बहाल किया जा सकता है. आधुनिक पाठ्यक्रम में हमने प्रकृति को अलग-अलग अकादमिक विशेषज्ञताओं के टुकड़ों में बांट दिया है. इसलिए 12, 16 या 20 साल की शिक्षा के बाद अधिकतर छात्र सभी चीजों की परस्पर एकता की मोटी-मोटी समझ बनाए बिना ही स्नातक हो जाते हैं. उनके व्यक्तित्व और इस ग्रह के लिए इसके बहुत भीषण परिणाम होते हैं. उदहारण के लिए, हम लगातार ऐसे अर्थशास्त्री पैदा करते हैं जिन्हें पारिस्थिकी की बुनियादी जानकारी भी नहीं होती है. इससे पता चलता है कि क्यों हमारे राष्ट्रीय आर्थिक लेखा-जोखा तंत्र में सकल राष्ट्रीय उत्पाद (gross national product- GNP) से जैविक क्षति, भू-क्षरण, वायु-जल प्रदूषण, और संसाधनों का दोहन घटाया नहीं जाता है. हम 25 किलोग्राम गेहूं की कीमत तो GNP में जोड़ते हैं, लेकिन उसको उगाने में जो 75 -किलोग्राम मिट्टी की ऊपरी परत नष्ट हुई है उसे घटाना भूल जाते हैं. ऐसी अपूर्ण शिक्षा के कारण हमें लगता है कि हम दिन-ब-दिन संपन्न होते जा रहे हैं.

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पांचवा भ्रम यह है कि शिक्षा का उद्देश्य आपको समाज में अपनी हैसियत ऊपर उठाना और सफल होने के औजार देना है. टॉमस मर्टन ने कहा था कि यह “ऐसे लोगों का व्यापक उत्पादन है जो कुछ भी करने लायक नहीं है, सिवाय एक विस्तृत और पूर्ण रूप से कृत्रिम ढोंग में भाग लेने के”. जब मर्टन से उनकी सफलता के बारे में लिखने को कहा गया, तो उन्होंने उत्तर दिया “अगर मैंने कभी कोई सुप्रसिद्ध पुस्तक लिखी तो यह एक दुर्घटना मात्र थी, मेरी लापरवाही और अबोधता के कारण, और मैं बहुत ध्यान रखूंगा कि ऐसी गलती दोबारा न हो.” छात्रों को उनकी सलाह थी “तुम जो बनना चाहते हो बनो, पागल, शराबी, हर किस्म का लफंगा, मगर एक चीज से हर कीमत पर दूर रहना: सफलता”.

सीधी सी बात यह है कि इस ग्रह को ज्यादा ‘सफल’ लोग नहीं चाहिए. मगर इसे शांतिदूतों, जख्म भरने वालों, पुनर्वास करने वालों, कहानियां सुनाने वालों, और हर किस्म के आशिकों की जरूरत है. इसे जरूरत है ऐसे लोगों कि जो जहां भी रहते हैं अच्छे से रहना जानते हैं. इसे नैतिक साहस वाले ऐसे लोगों की जरूरत है जो इस दुनिया को मानवीय और रहने लायक बनाने की लड़ाई में हिस्सा लेने को राजी हैं. और ये सारी चीजें उस सब से कोसों दूर हैं जिसे हमारी संस्कृति ‘सफलता’ मानती है.

आखिर में, हमें भ्रम है कि हमारी संस्कृति मानवीय उपलब्धि का चरम बिंदु है: केवल हम ही आधुनिक, तकनीक-विज्ञ, और विकसित हैं. जाहिर है कि यह सांस्कृतिक घमंड का सबसे घटिया स्वरूप है, और साथ ही इतिहास और मानव-शास्त्र की गलत समझ भी. हाल ही में इस घमंड ने नया रूप ले लिया है- ‘हमने शीत युद्ध जीत लिया है और पूंजीवाद ने साम्यवाद को पूर्ण रूप से हरा दिया है’. साम्यवाद इसलिए असफल हुआ क्योंकि वह बहुत अधिक कीमत पर बहुत कम उत्पादन करता था. मगर पूंजीवाद भी असफल ही है, क्योंकि यह यह बहुत ज्यादा उत्पादन करता है, बहुत कम बांटता है, और हमारे बच्चों और पोते-पोतियों की पीढ़ियों से बहुत बड़ी कीमत वसूलता है. साम्यवाद इसलिए असफल हुआ क्योंकि इसमें अभाव की नैतिकता थी. पूंजीवाद इसलिए असफल हुआ क्योंकि यह नैतिकता को ही समाप्त कर देता है. यह वह हसीन दुनिया नहीं है जो गैर-जिम्मेदार विज्ञापन निर्माता या राजनेता हमें दिखाते हैं. हमने एक ऐसी दुनिया बनाई है जहां मुट्ठी भर लोगों के पास अकूत संपत्ति है और बढ़ती हुई गरीब आबादी के पास भीषण विपन्नता है. अपने सबसे वीभत्स रूप में यह दुनिया गलियों में पसरे नशे, अतृप्त हिंसा, अनैतिकता और सबसे विकराल तरह की गरीबी से भरी हुई है. सच तो यह है कि हम एक बिखरती हुई संस्कृति में जी रहे हैं. ‘होलिस्टिक रिव्यु’ के संपादक रॉन मिलर के शब्दों में:

“हमारी संस्कृति मनुष्यों की अच्छाई और उत्कृष्टता का पोषण नहीं करती है. यह दूरदर्शिता, कल्पनाशीलता, सौन्दर्यबोध या आध्यात्मिक संवेदना विकसित नहीं करती है. यह कोमलता, उदारता, दूसरों का ख्याल रखना और करुणा प्रोत्साहित नहीं करती है. बीसवीं सदी का अंत आते-आते आर्थिक-तकनीकी-सांख्यिकीवादी नजरिया बड़ी क्रूरता से इंसानों में वह सब कुछ नष्ट कर रहा है जो प्रेमपूर्ण और जीवनदायी है.”

शिक्षा किसलिए होनी चाहिए

इंसानी जीवन संजोए रखने के उद्देश्य से, हम शिक्षा पर पुनर्विचार कैसे कर सकते हैं? मैं छह सिद्धांत सुझा रहा हूं.

पहला, सारी शिक्षा पार्यावरण शिक्षा है. हम शिक्षा में क्या शामिल करते हैं और क्या नहीं, इससे हम छात्रों को यह सिखाते हैं कि वे प्राकृतिक जगत हिस्सा हैं या उससे अलग. उदहारण के लिए, ऊष्मागतिकी (thermodynamics) या पारिस्थिकी के नियमों को सिखाए बिना अर्थशास्त्र पढ़ाने से छात्रों को एक महत्वपूर्ण बुनियादी सीख मिलती है: कि भौतिकी और पारिस्थिकी का अर्थव्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं है. यह साफ़ तौर पर गलत है. यही बात पाठ्यक्रम के अन्य विषयों पर भी लागू होती है.

दूसरा सिद्धांत ग्रीक अवधारणा पाइडेआ (paideia) से आता है. शिक्षा का उद्देश्य विषय-वस्तु पर नहीं बल्कि स्वयं पर महारथ पाना है. विषय-सामग्री तो साधन मात्र है. जिस तरह हथौड़ी और छेनी से कोई व्यक्ति पत्थर या लकड़ी को आकार देता है, उसी तरह विचारों और ज्ञान को हम अपना चरित्र ढालने के लिए इस्तेमाल करते हैं. ज्यादातर समय हम साधन और साध्य में भ्रमित रहते हैं, और यह सोचते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ छात्र के मस्तिष्क में हर तरह के तथ्य, सूचना, पद्धतियां, तरीके ठूंसना है, भले ही इनका इस्तेमाल किसी भी उद्देश्य के लिए किया जाए. ग्रीक इस बारे में बेहतर समझ रखते थे.

तीसरा, ज्ञान अपने साथ यह जिम्मेदारी भी लेकर चलता है कि संसार में उसका उपयोग भले उद्देश्यों के लिए किया जाए. आज किए जाने वाले अधिकांश शोध मैरी शेली के उपन्यास जैसे हैं: तकनीक-जनित दानव जिनके लिए कोई जिम्मेदारी नहीं लेता है और न किसी से जिम्मेदारी लेने की उम्मीद की जाती है. लव कैनाल किसकी जिम्मेदारी है? चर्नोबिल? ओजोन का क्षरण? वैल्डेज़ तेल रिसाव? इनमें से हर त्रासदी इसलिए संभव हुई क्योंकि ऐसे ज्ञान का सृजन किया गया था जिसके लिए आखिरकार कोई भी जिम्मेदार नहीं था. अंततः इन्हें ‘बड़े पैमाने के उत्पादन से उपजी स्वाभाविक समस्या’ की नज़रों से देखा जाएगा. बेहद विशाल और जोखिम भरी परियोजनाओं को करने का ज्ञान हमारा उन्हें जिम्मेदारी से क्रियान्वित करने की क्षमता को पछाड़ चुका है. इसमें कुछ ज्ञान तो ऐसा है जो जिम्मेदारी से इस्तेमाल किया ही नहीं जा सकता है, यानी उसे सुरक्षित तरीके से और निरंतर भले उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है.

चौथा, हम तब तक यह नहीं कह सकते हैं कि हम कुछ समझते हैं, जब तक हम उसका वास्तविक इंसानों और और उनके समुदायों पर पड़ने वाले प्रभावों को नहीं समझते हैं. मैं ओहायो के यंग्सटाउन शहर के नज़दीक बड़ा हुआ, जिसे मुख्य रूप से उद्योगों द्वारा उस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में निवेश न करने के निर्णय ने तबाह कर दिया. खरीद-बिक्री, कर छूट, पूंजी संचलन के दांव-पेंच में पारंगत MBA पढ़े लोगों ने वह कर दिखाया जो कोई आक्रमणकारी सेना भी नहीं कर सकती थी: उन्होंने अपने मुनाफे की ‘बॉटम लाइन’ के खातिर एक अमरीकी शहर को पूरी कानूनी छूट के साथ तबाह कर दिया. मगर एक समुदाय को इस बॉटम लाइन की दूसरी कीमतें चुकानी पड़ती हैं, बेरोज़गारी, अपराध, बढ़ते तलाक, नशाखोरी, बाल उत्पीड़न, गवांई हुई बचत, और बर्बाद जिंदगियां. इस वाकिये में हम देख सकते हैं कि प्रबंधन कॉलेजों और अर्थशास्त्र विभागों ने इन छात्रों को जो सिखाया, उसमें अच्छे मानव समुदायों का मूल्य पहचानना शामिल नहीं था, और न ही कार्यक्षमता और अमूर्त आर्थिक अवधारणाओं को इंसानों और समुदायों से ज्यादा अहमियत देने वाली संकीर्ण आर्थिक नीति से उपजने वाली मानवीय त्रासदी की कीमत पहचानना.

मेरा पांचवा सिद्धांत विलियम ब्लेक से प्रेरित है. यह है बारीकियों पर ध्यान देना और शब्दों के बजाय कर्म से उदहारण पेश करना. छात्रों को वैश्विक जिम्मेदारी के पाठ पढ़ाए जाते हैं, जबकि उनके संस्थान खुद बहुत गैर जिम्मेदाराना चीजों में निवेश करते हैं. जाहिर है कि वास्तविकता में इससे छात्रों को पाखण्ड और अंततः निराशा का पाठ पढ़ाया जाता है. बिना किसी के बताए छात्र यह जान जाते हैं कि वे आदर्शों और यथार्थ के बीच की गहरी खाई पाट पाने में असहाय हैं. ऐसे शिक्षकों और प्रबंधकों की बेहद जरूरत है जो सत्यनिष्ठा, विवेक व संरक्षण का आदर्श प्रस्तुत करें और ऐसी संस्थानों की भी जो अपने हर कार्य में इन आदर्शों को जीएं.

आखिर में, सीखने की प्रक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी विषय-वस्तु. सीखने की प्रक्रिया बहुत मायने रखती है. व्याख्यान की शैली में पढ़ाए गए विषयों से निष्क्रियता पैदा होती है. बंद कमरों में पढ़ते रहने से यह भ्रम पैदा होता है कि सीखना केवल चहारदीवारी के अन्दर होता है, उस संसार से कटकर जिसे हास्यास्पद तरीके से छात्र “वास्तविक दुनिया” कहते हैं. मेंढक का डाइसेक्शन करने से छात्र वह सीखता है जो कितने भी शब्द कहकर नहीं सिखाया जा सकता है. संस्थानों की बनावट भी अक्सर निष्क्रियता, संवाद-शून्यता, दमन और कृत्रिमता का भाव उपजती है. मेरा तात्पर्य है कि छात्र विषय-वस्तु के अलावा भी कई सारी चीजों से सीखते हैं.

आपके संस्थान के लिए एक असाइनमेंट

अगर शिक्षा को सामंजस्य और स्थिरता के पैमानों पर नापा जाए, तो क्या किया जा सकता है? सबसे पहले मैं यह प्रस्ताव रखना चाहुंगा कि आप परिसर-स्तर पर एक संवाद शुरू करें कि आप शिक्षक के रूप में अपना काम किस तरह से कर रहे हैं. क्या आपके संस्थान में चार साल बिताने के बाद आपके छात्र बेहतर वैश्विक नागरिक बन रहे हैं या वे, वेन्डेल बेरी के शब्दों में, “पेशेवर घुमंतू गुंडे” बन रहे हैं? क्या यह कॉलेज एक स्थिर क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था विकसित करने में योगदान दे रहा है, या कार्यक्षमता बढ़ाने के नाम पर विनाश के चक्र बढ़ा रहा है?

मेरा दूसरा प्रस्ताव है कि आप इस परिसर में संसाधनों के प्रवाह का निरीक्षण कीजिए: भोजन, ऊर्जा, पानी, सामान, और कचरा. शिक्षक और छात्र साथ-साथ उन कुंओं, खदानों, खेतों, गोदामों, पशुबाड़ों, और जंगलों का अध्ययन करें जहां से परिसर में सामान आता है और उन जगहों का भी जहां यहां से कचरा भेजा जाता है. सामूहिक रूप से प्रयास कीजिए कि इस संस्थान की खरीद कैसे उन विकल्पों से की जाए जो पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाते हैं, कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम करते हैं, जहरीले पदार्थों का कम उपयोग करते हैं, ऊर्जा का बेहतर इस्तेमाल करते हैं व सौर ऊर्जा उपयोग में लाते हैं, स्थिर क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था विकसित करने में योगदान देते हैं, दीर्घकालीन लागत कम करते हैं, और दूसरे संस्थानों के लिए उदाहरण पेश करते हैं. फिर इन अध्ययनों की खोजों को पाठ्यक्रम में अलग-अलग विषयों, सेमिनारों, व्याख्यानों, और शोधों में शामिल करें. कोई भी छात्र यहां से न निकले जिसे संसाधनों के प्रवाह का विश्लेषण करना न आता हो और जिसने वास्तविक समस्याओं के वास्तविक समाधान खोजने में हिस्सा न लिया हो.

तीसरा, पुनर्विश्लेषण करें कि आपका संस्थान अपना पैसा कहां लगा रहा है. क्या आपका निवेश वैल्डेज़ के सिद्धांतों के अनुसार हो रहा है? क्या यह उन कंपनियों में लग रहा है जो ऐसे काम कर रही हैं जिनकी दुनिया को वाकई जरूरत है? क्या इसका कुछ हिस्सा स्थानीय तौर पर निवेश किया जा सकता है ताकि इस पूरे क्षेत्र में ऊर्जा का बेहतर इस्तेमाल और स्थिर अर्थव्यवस्था विकसित हो सकें?

आखिर में, मैं सलाह दूंगा कि आप अपने सभी छात्रों के लिए पर्यावरण साक्षरता के लक्ष्य निर्धारित करें. इस या किसी भी अन्य संस्थान से एक भी छात्र ऐसा नहीं निकलना चाहिए जिसे इन चीजों की बुनियादी समझ न हो:

  • ऊष्मागतिकी के नियम
  • पारिस्थिकी के बुनियादी नियम
  • किसी तंत्र की वहनक्षमता (carrying capacity)
  • भौतिक, रासायनिक और जैविक तंत्रों के ऊर्जा सम्बन्ध और परिवर्तन (energetics)
  • न्यूनतम लागत और अंतिम-उपयोग (end–use) विश्लेषण
  • किसी स्थान में अच्छे से रहना
  • टेक्नोलॉजी की सीमाएं
  • उचित स्तर पर उत्पादन और विस्तार (appropriate scale)
  • सामंजस्यपूर्ण कृषि और वानिकी
  • स्थिर-स्तर अर्थशास्त्र (steady-state economics), जिसमें उत्पादन के हर कदम पर ऊर्जा और सामान के न्यूनतम उपयोग के जरिए संसाधनों और जनसख्या को एक स्थिर स्तर पर सीमित रखा जाता है
  • पर्यावरण सम्बन्धी नैतिकता

क्या इस संस्थान के स्नातक यह समझते हैं, जैसा अल्डो लियोपोल्ड ने कहा था, कि “वे एक विशाल पारिस्थिकी तंत्र का छोटा सा हिस्सा भर हैं; अगर वे इस तंत्र के साथ काम करेंगे तो वे अपनी मानसिक और भौतिक सम्पदा में असीमित बढ़ोतरी कर पाएंगे, और अगर वे इसके खिलाफ जाएंगे तो यह तंत्र उन्हें कुचल डालेगा”?

लियोपोल्ड ने पूछा था, “अगर शिक्षा हमें ये चीजें नहीं सिखाती, तो फिर शिक्षा किसलिए है?”

 

साभार: http://www.eeob.iastate.edu/classes/EEOB-590A/marshcourse/V.5/V.5a%20What%20Is%20Education%20For.htm

चित्र: इन्टरनेट से

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अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय

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