बाल यौन उत्पीड़न- “काश! मुझे किसी ने बताया होता!!”

kb.PNG

kb2.PNG

 

 

 

 

 

 

कुछ वर्ष पहले जब मैं त्रिपुरा के एक स्कूल में था तो लड़कियों की अधिक भागीदारी और जेंडर पर स्कूल में वार्तालाप शुरू करने के प्रयास किए थे, जिसमें लड़कियों का फुटबॉल खेलना, कक्षा में फ्री पीरियड में जेंडर पर चर्चा करना, शिक्षकों का जेंडर पर सत्र करना इत्यादि शामिल थे. क्योंकि बच्चे और शिक्षक बांग्ला भाषी थे और अधिकाँश हिंदी नहीं पढ़ सकते थे, इसलिए बाल यौन उत्पीड़न पर कमला भसीन की एक सुन्दर पुस्तक का अंग्रेजी में अनुवाद किया और पुस्तक प्रिंट-बाइंड करके पुस्तकालय में रखवाई. पता नहीं उसका कितना उपयोग हुआ, पर उद्देश्य था कि यौन उत्पीड़न जैसे विषय पर खामोशी और उसपर वार्तालाप शुरु करने में वयस्कों-बच्चों की झेंप को दूर करने में शायद एक पुस्तक मध्यस्थता कर पाए जिससे शिक्षक-बच्चे चर्चा शुरु कर पाएं…या शायद कोई बच्ची खुद पुस्तकालय में पुस्तक पढ़कर किसी शिक्षक के पास जाने की सोचे अगर उसके साथ उत्पीड़न हो रहा हो.

आजकल #Metoo मूवमेंट के दौरान शायद एक अच्छा अवसर है जब बच्चों के साथ इस मुद्दे पर बात की जाए, लड़के और लडकियां दोनों से और अपने परिवार के बच्चों से भी…अगर वयस्क होने के नाते आपको भी झेंप है तो यह पुस्तक खुद पढने के बाद बच्चों को पढने के लिए दी जा सकती है और फिर कक्षा में चर्चा की जा सकती है…3-4 प्रतियाँ प्रिंट करके पुस्तकालय में रख लें. यह पुस्तक बच्चों और शिक्षकों/अभिभावकों के लिए लिखी गई है और पता नहीं इस विषय पर किशोरावस्था की लड़कियों के लिए कोई पुस्तक है कि नहीं, पर शायद इसी से शुरुआत की जा सकती है. मेरी समझ और अनुभव बहुत कम है, पर अगर विद्यार्थियों के जीवन में कम से कम एक वयस्क/शिक्षक हो जो उनसे कभी-कभी प्रेम, यौन, जेंडर इत्यादि पर प्रत्यक्ष रूप से बात करता/ करती हो, तो उन्हें अपने व्यक्तिगत जीवन की कई बातों को साझा करने के लिए कोई भरोसेमंद वयस्क मिल जाता है जो अक्सर माता-पिता में नहीं मिल पाता है.

पुस्तकें इन लिंक पर पढ़ें:
हिंदी: http://arvindguptatoys.com/arvindgup…/kaash-kamla-bhasin.pdf
English: http://arvindguptatoys.com/arvindg…/e-bhasin-child-abuse.pdf

Advertisements
महिलाएं व नारीवाद में प्रकाशित किया गया | Tagged , , , , , , | टिप्पणी करे

मेरी कहानी- गंगा डॉल्फिन

gd.jpg

केरल में प्रोफ़ेसर माधव गडगिल की रिपोर्ट की अर्थी उठी और उत्तराखंड में प्रोफ़ेसर जी. डी. अग्रवाल की देह की.

जी. डी. अग्रवाल के निधन/ बलिदान/ बलि के अवसर पर गंगा के एक और पहलु पर ध्यान देने की भी जरूरत है जो मनुष्य-प्रधान चिंताओं में अक्सर उपेक्षित रह जाता है. गंगा के विराट पारिस्थिकी तंत्र पर इंसान के अलावा अनगिनत जीव भी निर्भर हैं जो इंसान के पृथ्वी पर आने से भी पहले से गंगा के आँचल में पल रहे हैं. उनका भी उसपर उतना ही ‘हक़’ है लेकिन आज वे इंसानी गतिविधियों द्वारा गुमनामी में तबाह किए जा रहे हैं. ऐसी ही एक जीव है हमारी राष्ट्रीय जलीय जीव (National Aquatic Animal) ‘गंगा डॉल्फिन’. विश्व में नदियों में पाई जाने वाली डॉल्फिन की मात्र 3 जीवित प्रजातियाँ में से एक गंगा डॉलफिन भारतीय उपमहाद्वीप, और खासतौर से गंगा में पाई जाती है. आज इनकी आबादी बेहद खतरे में है और चीन की यांगत्जे नदी की बैजी डॉल्फिन की तरह ये भी विलुप्त होने की राह पर है. इस छोटी सी पुस्तक में गंगा डॉलफिन की कहानी पढ़ें:

https://archive.org/details/GangaDolphinHI/page/n0

प्रकृति, मनुष्य में प्रकाशित किया गया | Tagged , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

सामाजिक विज्ञान की शिक्षा: प्रोफेसर अमन मदान के साथ बातचीत

अमन मदान वर्तमान में अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु में पढ़ाते हैं और उन्हें ऐसे छात्रों के साथ रहना बहुत अच्छा लगता है जो कि समाज के प्रति संवेदनशील और प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से एंथ्रोपोलॉजी में स्नातकोत्तर और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली से डॉक्टरेट की पढ़ाई की। फिर वे सन् 2000 से 2003 तक एकलव्य के होशंगाबाद केन्द्र से जुड़े रहे। उन्होंने होमी भाभा सेंटर फॉर साइंस एजुकेशन (मुम्बई), टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (मुम्बई) और आई.आई.टी. (कानपुर) में कुछ समय तक अध्यापन कार्य किया है।

 

 

________

प्रश्न: कृपया हमें अपनी शैक्षिक/बौद्धिक यात्रा के बारे में बताएँ। आज आप अपने आप को एक शिक्षाशास्त्री – यानी शिक्षाशास्त्र के एक प्राध्यापक जो शिक्षकों और शोधकर्ताओं की एक नई पीढ़ी को विकसित कर रहा है – के रूप में किस प्रकार देखते हैं?

अमन मदान : मुझे अक्सर इस बात में बड़ा आश्चर्य लगता है कि मेरी यात्रा की शुरुआत अपने अधिकांश शिक्षकों और उनके यांत्रिक पढ़ाने के तरीकों से दूर भागने से हुई थी। इसके चलते मैं उन शिक्षकों, मित्रों और संगठनों की तरफ खिंचा जिनमें कहीं अधिक प्रामाणिकता दिखाई देती थी और हमारे समय के ज्वलन्त मुद्दों के साथ जूझने की, उन्हें समझने की कहीं अधिक प्रतिबद्धता दिखाई देती थी। पहले तो मैंने जीवविज्ञान में बी.एससी. किया था और मुझे पौधों और पशुओं का अध्ययन करना अद्भुत चीज लगती थी, और मेरे लिए वह बड़े आनन्द का स्रोत था। लेकिन प्रयोगशालाओं में और विराट अकादमिक नौकरशाही में बहुत ज्‍यादा बारीक निरीक्षण तले काम करने का विचार बहुत निराशा पैदा करने वाला था। तो इसलिए मैंने सामाजिक विज्ञानों का रुख कर लिया, इस आशा से कि वहाँ मैं अपने चारों ओर फैली हिंसा और साम्प्रदायिक द्वेष की चिन्ताजनक समस्याओं को गहराई से समझ सकूँगा, और यह भी आशा थी कि यह एक ऐसा अध्ययन होगा जिसमें मैं आजादी से साँस ले सकूँगा। पंजाब विश्वविद्यालय में मानव शास्त्र का अध्ययन करते वक्त मैं भाग्यशाली रहा कि मुझे स्वर्गीय दिव्यदर्शी कपूर जैसे शिक्षक मिले जिन्होंने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि, शैक्षिक दृढ़ता और मूर्तिभंजन की प्रकृति से हमें बहुत प्रेरित किया। फिर जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में सौभाग्य से मुझे अविजित पाठक जैसे शिक्षक मिले जो ईमानदारी और सच्चाई में पगी विद्वता का उदाहरण थे।

स्नातक-पूर्व वर्षों से मैं भाग्यशाली था कि मुझे बलराम बोधी और गुरिन्दर सिंह ‘डिम्पी’ जैसे दोस्त मिले जो सार्वजनिक मसलों पर अपना मत रखते थे और उसके लिए खड़े होते थे, और उन मुद्दों के लिए जो उनके दिल के बहुत करीब थे, वे अपने जीवन सहित कुछ भी दाँव पर लगाने के लिए तैयार रहते थे। उस समय जब हम भविष्य के जीवन के बारे में सोचते थे तो हम ऐसे समूहों के साथ काम करने के बारे में ही सोचते थे जो एक बेहतर भारत और एक बेहतर दुनिया बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे, न कि शिक्षक बनने के बारे में। धीरे-धीरे हममें से कई लोगों को यह महसूस होना शुरू हुआ कि दुनिया को बदलने में शिक्षा का केन्द्रीय महत्व है। जब हम लोगों की निराशा और अज्ञानता से भरी प्रतिक्रियाएँ देखते थे तो हमें लगता था कि शायद शिक्षा के क्षेत्र में संघर्ष करके कुछ स्थाई बदलाव लाए जा सकते हैं। बड़ी मासूमियत के साथ हम सोचते थे कि अगर आप बच्चों में तब्दीली ले आएँ तो दुनिया तब्दील हो जाएगी। अब तो खैर हमें भी एहसास होता है कि हमारी वह सोच ज्‍यादा ही सरलता और भोलेपन से भरी थी।

कल्याणी डिके, जिनसे बाद में मैंने शादी की, ने मुझे एकलव्य के स्याग भाई से मिलवाया। उनके माध्यम से हम कई और लोगों से मिले जैसे अरविंद सरदाना, अनु गुप्ता, सी.एन. सुब्रह्मण्यम, रश्मि पालीवाल, यमुना सनी, सुशील जोशी और कई अन्य लोग जिन्हें देखकर लगता था कि वे बहुत बढ़िया जिन्दगी जी रहे थे और भारतीय सामाजिक विज्ञान के बारे में अपने बहुत गहरे विचारों को छोटे-छोटे कस्बों में काम करते हुए लागू कर रहे थे ताकि स्कूल में बच्चों द्वारा सीखी जाने वाली चीज़ों में बदलाव लाया जा सके। कल्याणी और मैंने सोचा कि हमें भी ऐसा ही जीवन जीना है। इसमें अकादमिक समुदाय के आडम्बरों और दिखावों से दूर जाने का लाभ तो था ही, साथ ही सबसे बुनियादी सवालों के साथ जुड़ने की गुंजाइश और स्वतंत्रता भी थी, और शिक्षा जगत के पदानुक्रम पर बैठे लोगों को सन्तुष्ट रखने के लिए किए जाने वाले कार्यों की मजबूरी भी नहीं थी।

सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया से जुड़ने में मेरी रुचि के कारण मैं स्कूलों के भीतर ऐसे अनिवार्य स्थान के रूप में नागरिक शास्त्र की तरफ आकृष्ट हुआ जहाँ हमारे देश की कई समस्याओं से नजरें मिलाई जा सकती थीं। लेकिन समस्या यह थी कि अधिकांश लोगों को नागरिक शास्त्र बहुत उबाऊ और अरुचिकर लगता था। एकलव्य ने अपने खास तरीके से यह सवाल किया कि आखिर क्यों बच्चों को नागरिक शास्त्र उबाऊ लगता था। होशंगाबाद में रहकर, एकलव्य में काम करते हुए इस बारे में मैं सामूहिक जीवन में विभिन्न संस्कृतियों के बीच के संघर्ष की तरफ इशारा करता रहा। तीन सालों तक लोगों से बात करके, पुस्तकालयों को चलाते, कार्यशालाओं का आयोजन करते, गहरी समझ रखने वाले व्यक्तियों से बात करके मैंने यह दलील देनी शुरु की कि यह एक ऐसी संस्कृति थी जो जातीय समाज की सत्ता के संवादों से उपजती थी। जो एक तरफ तो किसी जातीय समूह के भीतर सभी पुरुषों के बीच समानता की बात करती थी, लेकिन दूसरी तरफ उनके और महिलाओं के तथा अन्य जातीय समूहों के बीच ऊँच-नीच का क्रम मौजूद था। इस स्थिति के विरोध में वह संस्कृति खड़ी थी जिसे स्कूली पाठ्यपुस्तकें व्यक्त करने की कोशिश कर रही थीं, और जिसमें संविधान के सभी मूल्यों — सार्वभौमिक समानता, स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ इत्यादि — की बात की जाती थी। इन दोनों संस्कृतियों के बीच का तनाव इतना गहरा था कि नागरिक शास्त्र का पाठ्यक्रम एक सम्भावित युद्धभूमि बन गया था। इसलिए पाठ्यपुस्तक के लेखकों ने उनमें से वह सब कुछ हटा दिया जो विवाद का विषय हो सकता था, और सिर्फ भारतीय राज्य के कानूनों और नियमों को, तथा कुछ पाखण्ड से लगने वाले आदेशों को रहने दिया, जिसका अर्थ था कि हम कुछ भी बुरा नहीं देखते, कुछ बुरा नहीं सुनते और कुछ बुरा नहीं करते। इन दो संस्कृतियों के बीच संवाद स्थापित करने की कोई कोशिश नहीं की गई। इसलिए, विलर्ड वॉलर के अमर कथन को थोड़ा-सा बिगाड़कर यह कह सकते थे कि नागरिक शास्त्र की पाठ्यपुस्तकें नैतिक गुणों के उजाड़ संग्रहालयों में तब्दील हो गई थीं, प्राण रहित और शरीर रहित।

बाद में, आई.आई.टी., कानपुर में काम करते हुए मेरी दिलचस्पी शिक्षा में असमानता से जुड़ी विचारधाराओं में हुई। शोध के इस विषय में मेरी दिलचस्पी मण्डल के दूसरे दौर के कारण हुई। वहाँ पर मेरे कई साथी गैर-अगड़ी जातियों के बारे में जिस तरह की बातें कर रहे थे उनसे मैं बहुत दुखी और आहत हो गया था। उन लोगों की बातों में ऐतिहासिकीकरण की कमी से, सामाजिक विषमताओं को न्यायोचित ठहराने के ढंग से, और सामाजिक ढाँचे किस प्रकार लोगों को शिक्षा में कमतर प्रदर्शन करने के लिए मजबूर करते हैं इसके बारे में उनके भोलेपन से मुझे बहुत अचम्भा हुआ। हालाँकि, मेरे ही साथियों में इसके कई अपवाद भी मौजूद थे, लेकिन मुझे एहसास होना शुरू हो गया था कि शिक्षित भारतीय उच्च वर्गों की व्यापक संस्कृति यही है। बहुत बाद में मैंने लोकप्रिय अर्थशास्त्र की एक किताब पढ़ी जिसका नाम था ‘द विनर टेक ऑल सोसायटी’ (Winner Take All: विजेता सब कुछ ले जाता है)। मुझे लगा कि यह शीर्षक इस तरह की नैतिकता का उचित वर्णन करता है जहाँ सबसे ऊपर बैठे लोग किसी भी चुनौती का विरोध करते हैं और अपने माल पर किसी और के दावे को खारिज करने के लाखों तरीके ढूँढ़ लेते हैं लेकिन खुद अपने दावों की मनमानी प्रकृति और अवैधता की तरफ आँखें मीच लेते हैं। इस अनुभव ने मुझे योग्यता के चरित्र, और फिर आरक्षण की व्यवस्था से जुड़ी चर्चा की तरफ खींचा। मैं बहुत भाग्यशाली रहा कि मुझे अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय में इस तरह के कुछ विचारों को अमल में लाने के लिए बहुत सहयोगपूर्ण माहौल मिला। यहाँ हमने ऐतिहासिक असुविधा भोगे हुए लोगों के प्रवेश को तौलने के लिए न सिर्फ जाति बल्कि आठ अलग-अलग मानदण्डों का इस्तेमाल करके एक सामाजिक-आर्थिक असुविधा सूची बनाने की कोशिश की है।

एकलव्य, ए.पी.एफ. और कई अन्य लोगों के साथ ही मैं भी अक्सर यह सोचता रहा हूँ कि शिक्षा व्यवस्थाओं को अधिक न्यायोचित और समतावादी किस तरह बनाया जा सकता है। आखिरकार, आरक्षण तो एक वृहत सामाजिक और शैक्षणिक व्यवस्था के घावों पर लगाई गई एक सांकेतिक मरहम पट्टी भर था। आजकल मैं उन विभिन्न ताकतों के बारे में सोचता रहता हूँ जो किन्हीं शिक्षा व्यवस्थाओं को रूपान्तरित करने में सहायक होती हैं। एक ताकत जिसे कम तवज्जो मिलती रही है वह है किसी समाज और उसकी शिक्षा व्यवस्था के स्वरूप को निर्धारित करने में राजनीति, सामाजिक आन्दोलनों और सम्भ्रान्त वर्गों की विचारधाराओं की भूमिका। संवेदनशील और विचारवान राम शास्त्री और बी. रामदास, जो एकॉर्ड और आदिवासी मुन्नेत्र संगम के सदस्य हैं, ने मुझे इस स्थिति को बेहतर ढंग से समझने में मदद की है। एन.जी.ओ., सी.एस.आर. और राज्य की नौकरशाही की प्रवृत्ति तकनीकी समाधानों पर ध्यान केन्द्रित करने की होती है। हमें खुद को यह याद दिलाते रहना चाहिए कि हमारे जीवन और समाज का एक राजनैतिक पहलू भी होता है। और इसका हमारी प्राथमिकताओं को तय करने, हम क्या देखते हैं और किसे अनदेखा करते हैं इसे तय करने में और ऐसे समूहों को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है जो बाद में कुछ खास रुख अपनाते हैं, दूसरे नहीं।

मैं शिक्षक के रूप में अपने कार्य को इसी नजरिये से देखता हूँ। यह भारतीय समाज में एक सांस्कृतिक राजनीति का हिस्सा है। विद्यार्थियों और साथियों को जब हम उत्पीड़ित लोगों के अनुभवों को देखने के लिए प्रेरित करते हैं तब हम बलवानों के आधिपत्य के खिलाफ काम करते हैं। सिद्धान्तों से निकलने वाली गहरी समझ का उत्सव हम तकनीकी-यांत्रिकीय ज्ञानहितों की संकीर्णता और समझ की आँखों पर बाँध दी जाने वाली पट्टी के विरोध में खड़े होकर मनाते हैं। इस बात पर जोर देकर कि मनुष्यों और उनके सम्बन्धों का अध्ययन करके भी हम एक कैरियर और सार्थक जीवन हासिल कर सकते हैं, हम तकनीकी विशेषज्ञों वाली नौकरशाही के कठोर पिंजरों से आजाद होने में विद्यार्थियों की मदद करते हैं। यह कहकर कि सुधारवादी आलोचना, शोध, शिक्षण और सृजनात्मक कार्यों के कोई बँधे-बँधाए ढाँचे नहीं होते, बल्कि सब एक साथ चल सकते हैं, दरअसल हम उस निराशा के खिलाफ खड़े होते हैं जो हमें हार मानने को और जीवन के प्रभुत्व विचारों और जीवन शैलियों को अपनाने पर मजबूर करती है।  हो सकता है कि मेरी अपनी जिन्दगी में एक शिक्षक के रूप में मैं यह सब बहुत अच्छे से न कर पाया होऊँ। लेकिन मुझे यह जरूर लगता है कि इन दिशाओं में उठाया गया एक छोटा-सा कदम भी किसी बड़े बदलाव की नींव साबित हो सकता है।

प्रश्न : अगर हम शिक्षा के विषय को एक वृहत सामाजिक-राजनैतिक/दार्शनिक चर्चा के एक अभिन्न अंग के रूप में देखते हैं तो आप आलोचनात्मक/मुक्तिदाई शिक्षण के ज्ञान-शास्त्र की जड़ें कहाँ देखते हैं?

अमन मदान : भारत में जिस तरह हम आलोचनात्मक और मुक्तिदायी शिक्षण की बात करते हैं वह सम्भवत: ज्ञान-शास्त्र के कई स्रोतों से बनता है। एक स्रोत तो निश्चित ही उन्नीसवीं सदी में हुए मानव शास्त्र के विकास के ढंग में मौजूद है, खासतौर पर जैसा कि कार्ल मार्क्स की रचनाओं में हम देख सकते हैं। उदाहरण के लिए, मार्क्स की रचनाओं में हम पाते हैं कि मनुष्यों ने वास्तविक दुनिया के साथ अपनी अन्तर्क्रिया और संघर्ष के द्वारा खुद का निर्माण किया। वे अस्तित्व में बने बनाए नहीं आए थे बल्कि उन्होंने खुद को हर तरह से ‘बनाया।’ हमारी मानवता को इस निर्माण में बहुत-सी निराशाओं और अवरोधों का सामना करना पड़ा। सामन्ती काल में मनुष्यों की रचना और उनकी पूर्ण अभिव्यक्ति को प्रभुत्व और वर्चस्व के उन सामन्ती सम्बन्धों ने बाधित कर दिया जिन्होंने अधिकांश आबादी को बन्धनों और दरिद्रता में घेर कर रखा था। पूँजीवाद में इसे चालाकी भरे बाजारवादी सम्बन्धों के द्वारा और सांस्कृतिक प्रक्रियाओं द्वारा बाधित कर दिया जाता है, और इस तरह हम अपनी क्रियाशीलता को त्याग देते हैं। मनुष्य की क्रियाशीलता और उसके कृत्यों की दृढ़ता आलोचनात्मक शिक्षण का केन्द्र हैं। इसे अपनी अभिव्यक्ति के लिए उत्पीड़न की एक वृहत सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करना पड़ता है। ये वे विचार हैं जो पाउलो फ्रेयर की रचनाओं से भी निकलते हैं।

यहाँ हमें एक ‘झूठी चेतना’ की अवधारणा मिलती है और चेतावनी मिलती है कि संस्कृति और समझ को सतर्कता के साथ देखना चाहिए, और उन्हें उनके प्रत्यक्ष मूल्य के हिसाब से स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। हमारी समझ की संरचना हमारे क्रियान्वयन के द्वारा आकार लेती है, और जब उसे ही विकृत किया जा रहा हो तो हमारी समझ और हमारी कल्पनाशीलता भी उससे अछूती नहीं रह सकती। ज्ञान और उसका प्रयोग इस प्रकार होना चाहिए कि वे किसी पर प्रभुत्व स्थापित करने के काम न आएँ, शायद मुक्त होने का अर्थ यही है।

एक और स्रोत है अमरीकी व्यवहारवाद, खास तौर पर ड्यूई और उनके अनुयायियों का काम। भारत में ऐसे बहुत-से लोग हैं जो मार्क्स को पढ़ने में कतराते हैं लेकिन जॉन ड्यूई, हर्बर्ट ब्लमर और जॉर्ज हर्बर्ट मीड को पढ़ने के लिए तैयार रहते हैं। इन लेखकों में भी हम यही धारणा देखते हैं कि मनुष्य के कृत्य ही उसकी समझ को बनाते हैं। इस दृष्टिकोण से आलोचनात्मक शिक्षण वह है जो शिक्षक व विद्यार्थी के बीच स्वैच्छिक संवाद और अन्तर्क्रिया को प्रेरित करता हो जिससे कहीं ज्‍यादा पूर्ण और गहरी समझ विकसित होती है। इसमें मार्क्स से समानताएँ स्पष्ट दिखती हैं। लेकिन इनके बीच का अन्तर शिक्षक-विद्यार्थियों के बीच के संवाद को सीमित करने में सामाजिक संरचनाओं की भूमिकाओं में देखा जा सकता है। जहाँ ड्यूई हमारे कृत्यों पर सर्वांगीण बाधाओं के सवालों पर चर्चा करने के लिए तैयार हैं, वहीं इस परम्परा के अन्य लोगों में ज्‍यादा संशय दिखाई देता है।

भारत में अम्‍बेडकरवादियों और महिलावादी आन्दोलनों ने हाल में आलोचनात्मक शिक्षण की तरफ जोरदार प्रयास किया है। इन दोनों ही आन्दोलनों ने — और कभी-कभी वे एक ही आवाज में बात करते हैं — इस ओर इशारा किया है कि सांस्कृतिक अर्थ प्रभुत्व व आधिपत्य के रंगों में रंगे हो सकते हैं। पितृसत्ता और जातिवाद ने विद्यार्थियों और शिक्षकों के अपने बारे में, और जिस तरह स्कूली ज्ञान बनता है उस बारे में, दृष्टिकोणों को तय किया है। प्रभुत्व के इन स्वरूपों पर सवाल खड़े करना भारत में शैक्षणिक चर्चाओं से जुड़े आन्दोलनों का एक अहम तत्व रहा है।

शिक्षण से सम्बन्धित दूसरे विचार भी हैं, लेकिन आलोचनात्मक शिक्षण का स्वरूप तय करने के लिए गाँधीवादी जड़ों का उल्लेख करना अभी के लिए काफी होगा। गाँधी और उनसे प्रेरित हुए कई लोग पाश्चात्य तथा औद्योगिकीकरण के हिमायती विमर्शों पर गहरे सवाल खड़े करते हैं। ये विमर्श सोचने, और अपने शरीर को पूरी तरह इस्तेमाल करने की हमारी क्षमताओं को दरिद्र बनाकर हमें कैद कर लेते हैं। ये हमें ऐसी तकनीकों की तरफ खींच लेते हैं जो हमें सबल बनाने की बजाय अपना गुलाम बना लेती हैं। विकास के इस रूप की गाँधीवादी आलोचना, और स्कूली ज्ञान पर प्रभुत्व रखने वाली प्रवृत्तियों ने हमें यह सवाल पूछने के लिए प्रेरित किया है कि हमें वाकई में स्वतंत्र बनाने के लिए और स्वराज प्राप्त करने के लिए किस प्रकार की शिक्षा की आवश्यकता है।

प्रश्न  : द न्यू लीम के इस अंक में हमने कार्ल मार्क्स, इवान इलिच और मोहनदास गाँधी का आह्वान किया है क्योंकि हम मानते हैं कि इन विचारकों/दृष्टाओं ने हमें शिक्षा और जीवन को एक बिलकुल अलग दृष्टिकोण से देखने के लिए प्रेरित किया। लेकिन हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ हम नव-उदारवादी बाजार और सामाजिक रूढ़िवाद का अपवित्र गठबन्धन देख रहे हैं। इन परिस्थितियों में क्या सम्भव है कि हम सिर्फ बाजारोन्मुख/कौशल-आधारित सीखने की बजाय जीवन को महत्व देने वाली शिक्षा में फिर से भरोसा दिखा सकें?

अमन मदान : जिसे आपने जीवन को महत्व देने वाली शिक्षा कहा है वह आसानी से समाप्त नहीं हो जाएगी, वह बार-बार प्रकट होती रहेगी। स्वतंत्रता संघर्ष के सालों में यह नई तालीम की जुबान बोलती थी, 1970 के बाद के कुछ सालों में यह सशक्तिकरण और विज्ञान को लोकप्रिय बनाने की भाषा बोलती थी, आज के वक्त में यह उन सभी आवाजों के माध्यम से बोलती है जो सोचते हैं कि शिक्षा का उद्देश्य क्या है और जो कक्षा के भीतर चुके हुए और निराश महसूस करते हैं। इनमें वे बहुत सारे विद्यार्थी और शिक्षक शामिल हैं जो बेतरतीब ढंग से तकनीकी और मैनेजमेंट की शिक्षा में फँस गए थे। मैनेजमेंट जगत के सम्भ्रान्त लोगों की एक पसन्दीदा तकनीक है जिसका वे बार-बार प्रयोग करते हैं — जीत का गीत गाना, यह बताना कि उनकी संस्थाएँ कितनी श्रेष्ठ हैं और उनका ज्ञान कितना अद्भुत है और यह राष्ट्र कितना महान बन जाएगा। लेकिन विद्यार्थी जिन्हें खाली-खाली महसूस होता है, और शिक्षक जिन्हें अपनी कक्षाओं में नियंत्रण बनाए रखने के लिए ‘पेशेवराना रुख’ अपनाना पड़ता है, अपने दिलों में जानते हैं कि कुछ तो ऐसा है जो ठीक नहीं है।

संस्कृति और शिक्षा को लेकर तकनीकी-यांत्रिकीय पद्धतियों की बुनियादी समस्या है कि वे लोगों की मनुष्यता तक पहुँचने और उसके साथ जुड़ने में नाकाम हैं। इस वजह से बराबर ये सवाल उठता रहेगा कि हो क्या रहा है।

पर इतिहास को सामाजिक ताकतों की कुल गणना के द्वारा निर्धारित नहीं किया जा सकता। हम अपना इतिहास खुद बनाते हैं और बार-बार हम समूहों, संगठनों, आवाज़ों और आन्दोलनों का उभार देखते हैं जो उस मौजूदा दौर की आम समझ को चौंका देते हैं। विकल्प तैयार करना और बनाना हमारे ऊपर है। हम नियतिवाद की सोच नहीं अपना सकते, कि या तो हार मान लें या इतिहास का इन्तजार करें कि वह खुद किसी तरह मुश्किलों से उबरकर चीजों को बदल देगा। एक साथ मिलकर कई आवाजें जीवित रह सकती हैं, अपने समय आने का इन्तजार कर सकती हैं, गहरी समझ विकसित कर सकती हैं।

प्रश्न : सूचना की क्रान्ति में एक विरोधाभास भी है। यह ठीक है कि नई तकनीकों के कारण हम अपने आपको सूचनाओं से घिरा हुआ पाते हैं। फिर भी यह डर तो है कि पढ़ने की संस्कृति — सिर्फ मजे के लिए पढ़ना, पाठ्यक्रम से इतर अच्छी किताबें पढ़ना, श्रेष्ठ साहित्य और दर्शन पढ़ना — समाप्त हो रही है। इसके अलावा, परीक्षाओं का दबाव और कोचिंग संस्थानों द्वारा प्रचारित की जाने वाली गाइड किताबें किशोर व युवा विद्यार्थियों की कल्पनाशीलता को बाँध देने का काम करती हैं। आप इस विरोधाभास को किस तरह देखते हैं? या आप इससे सहमत नहीं हैं?

अमन मदान : इस बारे में मेरी राय थोड़ी अस्पष्ट है। एक तरफ तो यह सच है कि अँग्रेजी में पढ़ी और बेची जा रही अधिकांश किताबें परीक्षाओं से या फिर ‘सफल कैसे बनें’ से सम्बद्ध हैं। लेकिन फिर भी मैं देखता हूँ कि सामाजिक विज्ञानों और मानविकी के विषयों के बाहर के बहुत सारे लोग अन्य तरह की किताबें पढ़ रहे हैं। कथा साहित्य अभी भी खूब बिकता है और इतिहास तथा अन्य प्रकार के गैर-कथा लेखन में भी लोगों की दिलचस्पी बढ़ रही है। भले ही हम इन लेखकों की गुणवत्ता के बारे में कुछ भी सोचें लेकिन जिस तरह चेतन भगत और देवदत्त पटनायक की किताबें अँग्रेजी में बड़ी संख्याओं में बिक रही हैं वह दिखाता है कि लोग ऐसी पौराणिक कथाएँ और वर्णन पढ़ना चाहते हैं जो संकुचित यांत्रिकीय ज्ञान के बाहर हैं। यह याद रखना भी प्रासंगिक होगा कि पिछले कुछ दशकों में ऐसे बहुत सारे लोग पाठकों की दुनिया में शामिल हो गए हैं जिनके माता-पिता ने न तो कभी कोई किताब खरीदी होगी न ही कभी पढ़ी होगी। शायद हमें संवाद करने की शैलियों और स्वरूपों को नई शक्ल देने की जरूरत है ताकि ज्‍यादा-से-ज्‍यादा लोगों तक उनकी पहुँच हो सके। शायद पुराने समय के लिखने के तरीकों को नए जमाने के लोगों के मुताबिक ढालना होगा। समय गुजरने के साथ संवाद की शैलियों में हुआ बदलाव कोई आश्चर्य की बात नहीं है। अगर आज मैं टॉल्सटॉय और हरमन मैलविल जैसे महान लेखकों को पढ़ने की कोशिश करूँ तो आज के लेखकों के वर्णनों के मुकाबले में मुझे उनका लेखन बहुत ज्‍यादा फैलाव वाला और असम्बद्ध लगेगा। वाकई समय के साथ शैलियों में बदलाव होना चाहिए।

जब मैं युवाओं को इंटरनेट का इस्तेमाल करते हुए देखता हूँ तो मैं इसकी सम्भावनाओं के बारे में सोचने लगता हूँ। वे अपने मोबाइल, टेबलेट और लैपटॉप पर सिर्फ तकनीकी सामग्री नहीं पढ़ रहे होते। बल्कि उनका ज्‍यादातर समय ब्लॉग, समाचार पढ़ने या सोशल मीडिया पर जाता है। यह मनुष्यों से जुड़े मामलों में, और जीती-जागती दुनिया में रुचि होने का उदाहरण है। मैं देखता हूँ कि युवा एक-दूसरे के साथ वीडियो और तस्वीरें साझा करते रहते हैं और उन पर काफी भावनात्मक व सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रतिक्रिया देते हैं, और अपने दोस्तों के साथ घण्टों तक टिप्पणियों का आदान-प्रदान करते रहते हैं। कभी किताब न खोलने वाले लोगों के बीच भी टेड टॉक और ऐसे ही बहुत-से अन्य वीडियो, जो बेसिरपैर का मनोरंजन नहीं हैं, की आश्चर्यजनक लोकप्रियता निश्चित रूप से कुछ बताती है। इसके पीछे शायद यह वजह भी हो सकती है कि तकनीक ने चलती-फिरती तस्वीर को बनाना और देखना बहुत सस्ता कर दिया है। और इसकी ताकत और प्रभाव ऐसा हो गया है कि लोग जब अपने जीवन में या रिश्तों में अर्थ तलाशने की कोशिश करते हैं तो शब्द की बजाय चित्र को अपना साधन बनाते हैं।

इतिहास में एक समय, तकनीक की एक खास व्यवस्था के चलते, पुस्तक वह जगह थी जहाँ बुद्धिजीवी अपने काल की पड़ताल करते थे। यू.आर. अनंतमूर्ति जैसे महान विचारक साहित्य प्रेमी विद्वान लोगों में व्यापक रूप से पढ़े जाते थे और उनके लिए ये किताबें कभी प्रेरणा का स्रोत होती थीं तो कभी क्रोध और अस्वीकृति का। इंटरनेट की राजनीति को, और उसमें जिस तरह कुछ खास तरह के संवाद को तरजीह मिलती है, उसे कम करके न आँकते हुए शायद हम आज ऐसा समय देख रहे हैं जहाँ छपी हुई किताबों के अलावा और भी स्थान हो गए हैं और जो लोग विचारों के मन्थन का हिस्सा बनना चाहते हैं उन्हें इन स्थानों पर संवाद करना भी सीखना चाहिए। अगर बहुत सारे लोग फेसबुक और यूट्यूब पर अपने विचारों को और आज के समय के बारे में अपनी आलोचनाओं को साझा कर रहे हैं तो वे लोग जो दूसरों तक पहुँचना चाहते हैं, उन्हें भी इन स्थानों पर संवाद करने की कला को सीखने की कोशिश करना चाहिए।

प्रश्न :  हम आपके पढ़ाने के प्रयास के बारे में कुछ जानना चाहेंगे कि किस प्रकार आप अच्छी किताबों की दुनिया से, गहरे शैक्षणिक फलसफों और नूतन शैक्षणिक पद्धतियों से विद्यार्थियों का परिचय कराते हैं। और फिर विद्यार्थियों की प्रतिक्रिया क्या होती है? क्या यह सम्मिलन का क्षण होता है या द्वन्द्व से भरे संवाद का?

अमन मदान : दुर्भाग्यवश, मैं ऐसा शिक्षक नहीं हूँ जो वह क्या कर रहा है उसके बारे में बहुत सोचे-विचारे या सजग रहे। मेरे ऐसे मित्र और साथी भी हैं जो, वे जो कर रहे होते हैं उसे बहुत अच्छे से सिद्धान्त रूप में व्यक्त कर सकते हैं और फिर अपने सिद्धान्तों के बिलकुल अनुरूप विद्यार्थियों को पढ़ा सकते हैं। लेकिन मैं जो भी करता हूँ उसका वर्णन करना या उसे सही ठहराना मुझे बड़ा मुश्किल लगता है। आइए मैं जरा दो पहलुओं के बारे में बात कर लूँ — मैं जो कुछ भी पढ़ाता हूँ उसकी विषयवस्तु का अर्थ और उसकी अपील तथा विद्यार्थियों को दी जाने वाली जगह और गुंजाइश की जरूरत।

शायद एक चीज जो मैं बहुत करता हूँ वह है कि मैं अवधारणाओं और सिद्धान्तों को जीते-जागते, भावनात्मक, जीवन्त उदाहरणों में बदल देता हूँ। रोजमर्रा का जो जीने का संघर्ष रहता है, मैं उसी से प्रेरित होकर सवालों का जवाब ढूँढ़ता हूँ। ऐसे भी कुछ लोग हैं जिन्होंने पूर्णत: औपचारिक आधार पर कुछ निश्चित सवालों के उत्तर तलाशने के लिए खुद को प्रशिक्षित कर लिया है या फिर उन्हें ऐसा करने से कुछ बाहरी लाभ मिलते हैं। मैं ऐसा नहीं कर सकता और विद्यार्थियों को भी ऐसा करते नहीं देख सकता। किसी मुद्दे का अध्ययन करने या उसके बारे में गहराई से सोचने का कारण उसकी व्यक्तिगत या भावनात्मक अपील, उसके द्वारा उठाई जाने वाली व्यावहारिक चुनौतियाँ, और ऐतिहासिक अर्थ में तथा दैनिक गतिविधियों में उसके द्वारा सामने लाई जाने वाली गहरी नैतिक दुविधाएँ होना चाहिए। तो मैं जब भी पढ़ाता हूँ तब मैं कक्षा के भीतर इन्हीं सरोकारों को लाने की कोशिश करता हूँ। किसी कक्षा के लिए तैयारी का ज्‍यादा सृजनशील और समय लेने वाला भाग होता है किसी विषय की अपील और उसके विभिन्न पहलुओं के अर्थ को तय करने का सही ढंग तलाश करना। कभी-कभी यह तरीका असफल हो जाता है तो कभी सफल भी हो जाता है। जिस समय यह तरीका काम कर जाता है तो ऐसा लगता है कि इससे विद्यार्थियों में अपने से सोचने और पढ़ने की प्रेरणा पैदा होती है और उन मुद्दों से उनका भी जुड़ाव बन जाता है। कक्षा में अपनी चर्चाओं में मैं एक पहलू दिमाग में रखने की कोशिश करता हूँ कि किसी समस्या के बारे में ‘हम क्या कर सकते हैं’। सिर्फ किसी चीज का विश्लेषण करना व्यर्थ और आत्म-आसक्ति जैसा लगता है। लोगों ने इस बारे में जो कुछ किया है या इस क्षेत्र में कार्य करने की क्या सम्भावनाएँ हो सकती हैं, इसके बारे में कम-से-कम कुछ दखल रखने से ऐसा लगता है कि कक्षा को सही गति और उद्देश्य मिल जाते हैं।

मैं आम तौर पर खुद भी एक सन्देही छात्र था इसलिए अभी भी मैं इस बात को नहीं मानता कि आधिकारिक रूप से शिक्षक नियुक्त हो जाने पर मैं अपने आप विद्यार्थियों से सार्थक बातें करने लगूँगा। हाँ, मेरे पास ऐसा कुछ कहने को होगा जो मेरे लिए तो सार्थक हो सकता है लेकिन जरूरी नहीं कि उनके लिए भी हो। एक कोर्स के समाप्त होने पर मैं आमतौर पर मेरी तरफ ध्यान देने के लिए विद्यार्थियों का आभार व्यक्त करता हूँ। कोर्स के दौरान अगर इन मसलों के बारे में वे भी चिन्तित महसूस करने लगें तो मुझे लगेगा कि मेरा प्रयास सफल हुआ। लेकिन, जाहिर है, मैं यह नहीं मान सकता कि यह सिर्फ मेरे प्रयास का नतीजा होगा, उसमें बहुत-से दूसरे कारकों का हाथ हो सकता है। लेकिन ऐसे भी विद्यार्थी होते हैं जिन्हें लगता है कि मेरी बातें इस लायक नहीं हैं कि उनके लिए वे अपनी ऊर्जा या दिमाग का इस्तेमाल करें। या फिर ऐसे भी विद्यार्थी होते हैं जिन्हें मेरे दिए हुए कार्य उनकी बाकी रुचियों की तुलना में कम महत्व के लग सकते हैं। उनके साथ दण्ड देने का तरीका अपनाना निरर्थक है। आप ही सोचें, कोई किसी को डाँटकर या दबाव डालकर किसी चीज को पसन्द करने के लिए कैसे मजबूर कर सकता है! इसकी बजाय मैं ऐसे प्रश्न और उदाहरण ढूँढ़ने की कोशिश करता हूँ जिससे उनका ध्यान खींचा जा सके। कभी-कभी यह तरीका काम करता है, कभी नहीं करता है। शायद किसी भी अन्य सांस्कृतिक प्रस्तुति की तरह शिक्षण भी सांस्कृतिक रूप से बहुत ही विशिष्ट कार्य है। कभी-कभी हमें पूरी तरह एक-से सांस्कृतिक आधारों के साये में बातचीत करने का खुशगवार मौका मिलता है। लेकिन कभी-कभी हम दूसरी संस्कृति के साथ भी बात करते हैं और ऐसी स्थिति में बातचीत की एक धीमी प्रक्रिया विकसित होती है जो, जाहिर है, दोनों को रूपान्तरित करती है। हर समय व्यक्ति को सामने वाले के दृष्टिकोण का सम्मान करना चाहिए और इस बात पर तुले नहीं रहना चाहिए कि मेरी संस्कृति ही बुनियादी रूप से सही और श्रेष्ठ है। जिस क्षण व्यक्ति ऐसा करना शुरु करता है तो फिर वह संवाद न रहकर आरोपण बन जाता है। हाँ, विद्यार्थी हार मानकर आपके आरोपण को भी स्वीकार कर सकते हैं। लेकिन फिर यह एक प्रभुत्व और अधिकार का कृत्य हो जाएगा और आपके बीच एक कष्ट देने में खुशी पाने वाला विकृत रिश्ता बनेगा। मैं तो वही तरीका पसन्द करूँगा जिसमें हम मित्रों की तरह मिलकर सीखें। मुझे तानाशाही शिक्षक कभी अच्छे नहीं लगे और मैं खुद भी ऐसा नहीं बनना चाहता।

 

अँग्रेजी से अनुवाद: भरत त्रिपाठी

साभार: लिंक

सीखना और सिखाना में प्रकाशित किया गया | Tagged , , , , , | टिप्पणी करे

स्कूली विज्ञान के लक्षण!

कैसे विज्ञान को एक रूढ़ि की तरह न पढ़ाएँ

उमा सुधीर

आलेख के इस भाग में स्कूली शिक्षा में विज्ञान के लक्षण, पढ़ाने के तरीके और पाठ्य पुस्तकों में दिए गए प्रयोगों पर उदाहरण सहित टिप्पणियाँ. विज्ञान के परिणामों को ही नहीं उसकी प्रक्रिया को, प्रयोगों को शिक्षकों के साथ साझा करने के प्रयासों की कुछ बातें.

मोटे तौर पर स्कूली विज्ञान और पाठ्य पुस्तकों के निम्नलिखित लक्षण हैं (इन पर मैं आगे विस्तार में चर्चा करूँगी):
* कुछ वैज्ञानिकों को ‘ईश्वरों’ के रूप में प्रस्तुत करना जो आम लोगों को ज्ञान प्रदान करते हैं.
* जो प्रयोग किए जाते हैं, वे प्राय: सत्यापन के लिए होते हैं.
* कई सारे प्रयोग करने योग्य नहीं होते; ये आइटम नम्बर जैसे होते हैं.

वैज्ञानिक यानी ईश्वर
पहले बिन्दु की बात करें – पाठ्य पुस्तकों में आम तौर पर कुछ ‘महान’ लोगों की सूची होती है जिनकी पहुँच ब्रह्माण्ड के रहस्यों तक रही है – क्यूरी, वॉटसन व क्रिक, रदरफोर्ड, मेंडल, बॉयल, हुक, न्यूटन, डारविन. इसका दूसरा पहलू यह है कि कुछ लोगों का मखौल बनाया जाता है – जैसे लैमार्क; (साथ ही कुछ पुरानी अवधारणाओं का सतही जिक्र करके मजाक बनाया जाता है- जैसे पहले लोग मानते थे कि पृथ्वी ब्रह्माण्ड का केंद्र है). परिस्थितियों ने विभिन्न सिद्धान्तों को जन्म दिया, जिस तरह के आँकड़ों तक वैज्ञानिकों की पहुँच थी, उस समय के उपलब्ध उपकरण, इनकी बात तक नहीं की जाती (और न ही उन सांस्कृतिक-सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक-वैज्ञानिक विश्वासों और प्रभावों की जिससे किसी मान्यता या सिद्धांत को बल मिलता है या उसपर सवाल उठाये जाते हैं). ज्ञान सामाजिक सन्दर्भ में निर्मित होता है और उसकी उपयोगिता भी प्राय: उसी सन्दर्भ में उजागर होती है. इसके अलावा, ऐसे ‘लगभग ईश्वरों’ की रचना का परिणाम यह होता है कि वैज्ञानिकों की सामान्य मानवीय नाकामियों को नज़रअन्दाज़ कर दिया जाता है. इसके चलते विद्यार्थी यह मानने लगते हैं कि वैज्ञानिक ज्ञान में कोई योगदान देना उनके बस की बात नहीं है और विज्ञान ज्ञान का अन्तिम रूप से तैयार भण्डार है जिसका पूरा श्रेय इन ‘ईश्वरों’ को जाता है.

स्कूली विज्ञान हमारा सम्पर्क उस प्रक्रिया से नहीं कराता जिसके ज़रिए यह ज्ञान पैदा हुआ है. हमें वे आँकड़े नहीं दिए जाते जिन पर यह ज्ञान आधारित है. न तो हमें इसके प्रमाण बताए जाते हैं और न ही यह बताया जाता है कि कौनसे सवाल पूछे गए थे, क्या शंकाएँ व्यक्त की गई थीं. चलते-चलते बता दूँ कि स्कूली पाठ्य पुस्तकें जवाब देती हैं बगैर यह बताए कि सवाल क्या है.

जवाब का अर्थ तभी बनता है जब हम उस सवाल से जूझते रहे हों या ऐसा कोई विरोधाभास हो जो हमारे पूर्व-ज्ञान के साथ मेल न खा रहा हो. एक बार जब कोई सवाल हमारे दिमाग में कौंध जाता है तो हम जवाब पाने के प्रयास करते हैं. जब विद्यार्थियों को ऐसे सवालों के जवाब दिए जाते हैं, जो उनके मन में नहीं आए हैं तो वह ज्ञान जीवन्त रूप से उनके स्कीमा (schema), उनकी विश्वास प्रणाली में फिट नहीं होता. लिहाज़ा, ऐसे कई बच्चे, और यहाँ तक कि वयस्क भी होते हैं जिनके पास अपनी मज़बूत वैकल्पिक संकल्पनाएँ (alternate conceptions) होती हैं. मगर यहाँ मुद्दा वैकल्पिक संकल्पनाओं का या उनसे निपटने का नहीं है. अत: मैं उसमें नहीं जाऊँगी. आशा है हम उस बात को फिर कभी ज़रूर उठाएँगे.

प्रयोग प्राय: रस्मअदायगी
खैर, विज्ञान शिक्षा का एक प्रमुख मकसद आलोचनात्मक सोच (critical thinking) की प्रवृत्ति को बढ़ावा देना है और यदि विज्ञान को इसी तरह पढ़ाना जारी रहा, तो यह हो नहीं सकता. हम स्वयं चीज़ें पता करने की कोशिश नहीं करते, हमें तो सिर्फ कुछ प्रयोग दोहराने की अनुमति होती है. उदाहरण के लिए दोलक का प्रयोग लीजिए. जब हम इस प्रयोग को स्कूल में करते हैं, तो हमें पहले से पता होता है कि (प्रायोगिक त्रुटियों की सीमा में) दोलन काल पर धागे की मोटाई, वह जिस पदार्थ से बना है, और गोलक का वज़न या वह जिस पदार्थ से बना होता है, इन सबका कोई प्रभाव नहीं पड़ता. हमें पहले से पता होता है कि दोलक का दोलन काल दोलक की लम्बाई पर निर्भर करता है, किसी अन्य चीज़ पर नहीं. हमें गुरुत्वीय त्वरण (g) का वह मान भी पता होता है जो हमें इस प्रयोग से निकालना है.

इसका नतीजा यह हुआ है कि अधिकांश स्कूलों में प्रयोग एक रस्म-अदायगी भर रह गए हैं. कई बोर्ड ने तो कक्षा-10 तक प्रयोगों को अलविदा कह दिया है. लिहाज़ा, उन्हें ऐसे सवालों से नहीं जूझना पड़ता और वे चैन की नींद सो सकते हैं. मगर जहाँ प्रयोग किए जाते हैं और कॉलेेज के स्तर पर, वहाँ पूरी प्रक्रिया एक स्वांग होती है, चाहे वह अनुमापन (titration) हो या स्वरित्र (tuning fork) की आवृत्ति पता करना हो.

थोड़ा समझाती हूँ कि मैं इसे स्वांग क्यों कह रही हूँ. आपने कभी परावर्तन का पहला नियम प्रदर्शित करने की कोशिश की है? ईमानदारी से कीजिए; आपतन किरण 40 डिग्री पर बनाइए, दर्पण को ठीक से रखिए, पिनों को सीध में लगाइए और परावर्तन का कोण नापिए. यह प्रयोग तीन अन्य कोणों के साथ कीजिए. कितने मामलों में आपको दोनों कोण एकदम बराबर मिले? जब हम वास्तव में कोई प्रयोग करते हैं, जब भी कोई रीडिंग लेते हैं, कोई भी मापन करते हैं तो तमाम गलतियाँ होती हैं. इनमें से कुछ तो हमारी लापरवाही के कारण होती हैं और पर्याप्त सावधानी बरतकर हम इन्हें कम-से-कम कर सकते हैं. मगर कुछ त्रुटियाँ उपकरण में निहित समस्याओं के कारण, उसकी सीमाओं के कारण होती हैं और ये तो सदा बनी रहेंगी. इसके अलावा प्रकृति में तमाम किस्म की विविधताएँ होती हैं. लिहाज़ा, यदि विद्यार्थी संजीदगी से प्रयोग करेंगे तो उनके अवलोकनों एवं आँकड़ों में उतनी ही विविधता होगी, जितनी कि उनकी शक्ल-सूरत में और नामों में होती है. मगर सूक्ष्मदर्शी में नज़र आ रहे अमीबा का चित्र बनाने की बजाय वे सब किसी पाठ्य पुस्तक में दिए गए चित्र की नकल बनाने लगते हैं और हम बेहिचक उनके रिकॉर्ड पर हस्ताक्षर कर देते हैं. छात्र अपनी रीडिंग से प्राप्त g के मान की बजाय रीडिंग्स गढ़ते हैं ताकि अपेक्षित मान निकल सके. अर्थात् वे प्रायोगिक कौशल भी नहीं सीखते और त्रुटियों को कम-से-कम करना भी नहीं सीख पाते. सारे विद्यार्थियों से मानक प्रयोग करवाने का एक अहम कारण यह है कि वे विभिन्न उपकरणों को हैंडल करना सीखें, काँच के उपकरणों को सावधानी से सम्भालना सीखें, प्रायोगिक कुशलताएँ सीखें और यह सीखें कि क्या सावधानियाँ ज़रूरी हैं. तभी तो वे इन कुशलताओं का उपयोग किसी नई परिस्थिति अथवा सवाल से सामना होने पर कर पाएँगे.

हमें कबूल करना चाहिए कि वास्तविक दुनिया से प्राप्त आँकड़े गड्ड-मड्ड होते हैं. उनमें बेतरतीब त्रुटियाँ होती हैं, उपकरण की सीमाओं के चलते त्रुटियाँ होती हैं, हमारी अपनी इन्द्रियों की सीमाओं की वजह से त्रुटियाँ होती हैं, रैंडम त्रुटियाँ होती हैं. विज्ञान (या वैज्ञानिक) इस सबके बावजूद ज़ोरदार दावे कर पाते हैं, कैसे?

दरअसल, मापन अपने आप में एक पूरा विज्ञान है. यदि आप किसी कक्षा में सारे बच्चों से अपनी कक्षा के कमरे की लम्बाई नापने को कहें, तो मापों में विविधता को देखकर आप भौचक्के रह जाएँगे. यही बात किसी भी प्रयोग की रीडिंग पर लागू होती है. 50 से.मी. लम्बाई वाले किसी दोलक के एक दोलन का समय नापिए. आपको कुछ रीडिंग मिलेंगी. अपने दोस्त से इसी प्रयोग को दोहराने को कहिए, खुद इसे दोहराइए. आपके पास तीन अलग-अलग रीडिंग्स होंगी. स्टॉप वॉच को शुरु और बन्द करने में थोड़ा अन्तर होगा (प्रतिक्रिया अवधि में भी फर्क होगा – जब तक आप देखते हैं कि दोलन पूरा हो गया और फिर घड़ी को बन्द करते हैं, तब तक तो सेकण्ड का एक अंश बीत जाता है. आप सबके पास मोबाइल फोन में स्टॉप वॉच तो होगी ही. ज़रा देखिए कि उसे शुरु करके बन्द करने में कितना समय लगता है – यही आपकी प्रतिक्रिया अवधि है). यह त्रुटि तो कमोबेश हर मापन में निहित होती है. इस तरह की त्रुटि को कम करने का एक तरीका यह है कि आप एक दोलन की बजाय 20 दोलन का समय नापें. 50 दोलन का समय नापना और भी बेहतर होगा.

तो, हम कोई भी माप कैसे लें? बेतरतीब (random) और व्यवस्थित (systematic), दोनों तरह की त्रुटियों को कम करने के तरीके विकसित किए गए हैं. और किसी भी वास्तविक वैज्ञानिक अध्ययन में यह ज़रूर बताया जाता है कि उसके मापों में निहित त्रुटियाँ कितनी हैं. ग्राफ में भी दर्शाया जाता है कि मापों में कितनी विविधता है.

आइटम नम्बर प्रयोग
इसके बाद बात आती है पाठ्य पुस्तकों में अवधारणाओं को स्पष्ट करने के लिए सुझाई गई गतिविधियों और प्रयोगों की. इनमें से कई सारी गतिविधियों की समस्या यह है कि वे या तो काम नहीं करतीं या जिस ढंग से बताई गई हैं उस ढंग से काम नहीं करतीं. या वे किसी अन्य परिघटना का प्रभाव दर्शाती हैं. उदाहरण के लिए प्राथमिक स्कूल के लिए दी गई एक गतिविधि लीजिए – इस गतिविधि से यह बताने का प्रयास है कि हवा में द्रव्यमान होता है (air has mass) अर्थात् हवा एक पदार्थ है. आप दो गुब्बारे लेकर उन्हें तराज़ू के दो पलड़ों पर रखते हैं. यह सुनिश्चित करना होता है कि वे सन्तुुलित हो जाएँ. इसके बाद एक गुब्बारे में हवा भरते हैं और दिखाते हैं कि अब उसका वज़न खाली गुब्बारे से ज़्यादा है. इस गतिविधि में उतप्लावन (buoyancy) की वजह से होने वाली दिक्कतों को पूरी तरह नज़रअन्दाज़ किया गया है (Filled and empty balloons do not demonstrate the weight of air). कल्पना कीजिए कि आपको पानी से भरी एक बाल्टी का वजन उस स्थिति में निकालना है जब वह बाल्टी पानी के हौज़ में डूबी हुई हो. क्या आप ऐसा कर सकते हैं? तो क्या आस-पास मौजूद हवा में डूबे किसी हवा से भरे गुब्बारे का वजन तराजू पर इस तरह निकाला जा सकता है? खाली और भरे गुब्बारे के बीच वज़न का अन्तर बहुत ही कम होता है और शायद साधारण तराज़ू पर नज़र भी न आए. और यह अन्तर इसलिए नहीं है कि एक गुब्बारा हवा से भरा है बल्कि इसलिए है कि उसमें भरी हवा दबाव में है – अर्थात् 450 मि.ली. (मान लें) हवा गुब्बारे के अन्दर दबाव में है और उसमें 450 मि.ली. साधारण हवा से ज़्यादा अणु हैं. कल्पना कीजिए कि इस गुब्बारे में हाइड्रोजन भरी जाए. तब यह हवा में तैरेगा और आप इसे तोल नहीं पाएँगे. तो क्या इस प्रयोग से यह निष्कर्ष निकला जाए कि हाइड्रोजन का द्रव्यमान ऋणात्मक होता है?

ऐसे ही एक और प्रयोग का सम्बन्ध ग्रेफाइट और लवणों द्वारा विद्युत के चालन से है. यदि आप 1.5 वोल्ट का एक सेल लें और इसे धातु के तारों की मदद से एक टॉर्च बल्ब से जोड़ दें तो बल्ब जल उठेगा. मगर यदि इसी परिपथ में कहीं ग्रेफाइट का टुकड़ा (पेंसिल का सीसा) लगा हो या बीच में लवण का घोल हो, तो एकदम सही तरीके से जुड़ा होने पर भी बल्ब नहीं जलेगा या बहुत धीमे जलेगा. ग्रेफाइट और लवण के घोल की चालकता धातुओं के मुकाबले काफी कम होती है, इसलिए इस मामले में बल्ब को चमकाने के लिए कहीं अधिक वोल्टेज की ज़रूरत होगी और तभी प्रयोग सही से काम करेगा.

तो ऐसे प्रयोगों को पाठ्य पुस्तक में क्यों रखा जाए? ऐसा लगता है कि पाठ्य पुस्तक के लेखक विज्ञान के प्रायोगिक आधार की लफ्फाज़ी भर करना चाहते हैं. उनके पास विद्यार्थियों को बताने के लिए कोई अवधारणा है और वे उसे किसी गतिविधि का लबादा पहना देते हैं जिससे कथित रूप से वह अवधारणा प्रदर्शित होती है. पाठ्य पुस्तकों को सावधानी से पढ़ेंगे और पुस्तक में दिए गए निर्देशों के अनुसार उस गतिविधि को करने का प्रयास करेंगे तो आपको ऐसे विरोधाभास नज़र आएँगे क्योंकि पाठ्य पुस्तक लेखन इस देश में एक मज़ाक है. किसी भी चीज़ को पाठ्य पुस्तक में शामिल करने से पहले जाँच करने की कोई कोशिश नहीं की जाती – न तो सूचनाओं की और न ही गतिविधियों की. इस लापरवाही के दो उदाहरण देखिए. एक है कि पालक में लौह की बहुत अधिक मात्रा होती है. मूल अध्ययन में एक त्रुटि रह गई थी, शायद दशमलव बिन्दु गलत जगह लग गया था (यह भी एक मिथक है जो लेखिका ने सही नहीं किया है). इसके चलते लगता था कि पालक लौह का एक बहुत बड़ा स्रोत है. ‘पॉपॉय दी सेलर’ नामक कार्टून पात्र सामने आया जो पालक खाते ही अचानक ताकतवर हो जाता है. उस त्रुटि को अब वैज्ञानिक साहित्य में सुधार लिया गया है मगर हमारी पाठ्य पुस्तकें उस पुरानी त्रुटि को दोहराए चली जा रही हैं. इसी प्रकार से बताया जाता है कि कटा हुआ सेब कत्थई इसलिए पड़ता है क्योंकि उसमें लौह तत्व होता है – माफ कीजिएगा, ऐसा नहीं है.

उपयुक्त गतिविधि का चयन
एक अन्य स्थिति होती है जब आप किसी अवधारणा को प्रदर्शित करने के लिए उपयुक्त गतिविधि चुनते हैं. जब एकलव्य की टीम हाई स्कूल के लिए गर्मी और तापमान के मॉड्यूल पर काम कर रही थी, तब हम यह बताना चाहते थे कि कैसे किसी पदार्थ की विशिष्ट ऊष्मा का प्रभाव इस बात पर पड़ता है कि गर्मी मिलने पर उसका तापमान किस गति से बढ़ेगा. हमें लगा था कि यह तो आसान है. हमने दो परखनलियों में बराबर-बराबर मात्रा में पानी और सरसों का तेल लिया (चूँकि हम यह प्रयोग इन्दौर में आज़मा रहे थे, इसलिए सरसों का तेल आसानी से उपलब्ध था) और उन्हें गर्म पानी में रख दिया. अब हमने यह रिकॉर्ड किया कि समय के बराबर-बराबर अन्तरालों पर दोनों पदार्थों के तापमान में क्या अन्तर आता है. हमने जो आँकड़े देखे थे, उनके मुताबिक सरसों के तेल की विशिष्ट ऊष्मा पानी से आधी या एक-चौथाई थी. इसलिए हमारा विचार था कि यह फर्क पर्याप्त है और हमें अपेक्षित परिणाम मिल जाएँगे – तेल का तापमान पानी की अपेक्षा तेज़ी-से बढ़ना चाहिए.

मगर, आश्चर्य. पानी का तापमान तेल की अपेक्षा ज़्यादा तेज़ी-से बढ़ रहा था. हमें यह समझने में काफी समय लगा कि इसका कारण यह है कि तेल पानी की अपेक्षा कहीं ज़्यादा गाढ़ा (श्यानता, viscosity) होता है और इस वजह से उसमें संवहन धाराएँ (convection current) बहुत धीमे स्थापित हो पाती हैं. हम रसोई के तेल का उपयोग करना चाहते थे क्योंकि वह कहीं भी आसानी से उपलब्ध हो जाएगा. इसके बाद हमने कई अन्य द्रवों को जाँचा कि कौन-सा काम करेगा – हम ऐसा द्रव चाहते थे जो आसानी-से उपलब्ध हो और जिसकी विशिष्ट ऊष्मा पानी से बहुत अलग हो ताकि तापमान में वृद्धि की दर में अन्तर प्रायोगिक त्रुटियों में गुम न हो जाए. यदि हम यह कहकर शुरु करते कि पानी और क्लोरोफॉर्म ले लो, तो बहुत मुमकिन है कि सामग्री के अभाव में यह गतिविधि कभी न की जाती.

लिहाज़ा, जहाँ कहीं भी एकलव्य पाठ्य पुस्तक लेखन की कवायद में भागीदार होता है तो हम दो चीज़ें सुनिश्चित करने की कोशिश करते हैं. पहली कि प्रयोग उस तरह से काम करे जैसा कि हमने उसका विवरण दिया है. और दूसरी कि गतिविधि के लिए ज़रूरी सामग्री स्थानीय स्कूल में उपलब्ध हो. जब मैं उस टीम की सदस्य थी जो एन.सी.ई.आर.टी. की कक्षा 9 व 10 की पाठ्य पुस्तकों पर काम कर रही थी, तो हमारी टीम में एक शिक्षिका थीं जो रसायन शास्त्र के अध्यायों में दिए गए सारे प्रयोगों को अपनी कक्षा के विद्यार्थियों के साथ करके देखती थीं. छत्तीसगढ़ में हम गतिविधि की योजना बनाने से पहले टीम में शामिल शिक्षकों से पता करते हैं कि स्कूल की प्रयोगशाला में कौन-से रसायन उपलब्ध हैं. कहने की ज़रूरत नहीं है कि सिल्वर नाइट्रेट के साथ आप कुछ अद्भुत परिणाम दिखा सकते हैं मगर सिल्वर नाइट्रेट इतना महँगा है कि 95 प्रतिशत स्कूल इसे खरीद ही नहीं पाएँगे. तब इसकी बात करके क्या फायदा?

एक किस्सा थोड़ा हटकर. हम रदरफोर्ड और उनके सोने के वर्क (पत्ती) के प्रयोग के बारे में पढ़ते रहते हैं. जब हम छत्तीसगढ़ में इस विषय पर काम कर रहे थे और इस प्रयोग के बारे में पढ़ रहे थे तब हमें पता चला कि रदरफोर्ड (या वास्तव में उनके विद्यार्थियों) ने विभिन्न धातुओं से बने वर्क की जाँच की थी. आपको क्या लगता है कि यदि सोने की बजाय चांदी का वर्क इस्तेमाल करें तो आँकड़ों में क्या फर्क आएगा? चूँकि यह एक ऐसा प्रयोग है जो अधिकांश विद्यार्थियों की समझ में नहीं आता है, तो सोचा गया कि इसकी बात थोड़े विस्तार में की जाए, यह बताया जाए कि अलग-अलग चीज़ें आज़माई गई थीं. हो सकता है कि इससे कुछ भ्रम साफ हो सकें.

विज्ञान, खोजबीन करने का मौका
चलिए अपने विषय पर लौटते हैं. इस सब (विषय वस्तु और प्रयोगों) का ध्यान रख लेने के बाद भी ज़रूरी होता है कि विज्ञान की कक्षा में खुली खोजबीन के लिए गुँजाइश रहे. प्रोजेक्ट्स में इसके लिए जगह होनी चाहिए मगर बदकिस्मती से अधिकांश स्थानों पर प्रोजेक्ट कार्य भी रस्मअदायगी भर रह गया है. अन्यथा प्रोजेक्ट कार्य के लिए निर्धारित समय का उपयोग विद्यार्थी यह पता करने में कर सकते हैं कि विज्ञान की प्रक्रिया का उपयोग विविध सवालों के जवाब पाने के लिए किया जा सकता है. हो सकता है कुछ सवाल उनके अपने हों.

हम अपने शिक्षक प्रशिक्षण सत्रों में इसका उपयोग नियमित रूप से करते हैं. यह प्रशिक्षण एक सप्ताह का होता है और इसमें रेगुलर सिलेबस से सम्बन्धित विषयों के अलावा कुछ समय रखा जाता है कि शिक्षक उन सवालों पर काम कर सकें जिनके उत्तर वे पाना चाहते हैं. शुरुआत करते हैं सवालों की सूची बनाकर, जिसमें प्रत्येक शिक्षक अपने सवाल जोड़ता/ती है. इसके बाद हम उन सवालों को चुनते हैं –
1) जिन्हें प्रशिक्षण की अवधि में हल किया जा सके (जैसे इस वर्ष एक सवाल था कि गेहूँ का बीज कितने समय तक जीवनक्षम रहेगा यानी अंकुरित हो सकेगा – इसका अध्ययन एक सप्ताह में सम्भव नहीं है).
2) जिनके लिए इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी जैसे किसी परिष्कृत उपकरण की ज़रूरत न हो.

मैं यहाँ कुछ उदाहरण दूँगी कि हमने किस तरह के सवालों पर काम किया है:
1. कपड़ों को साफ करने के लिए वास्तव में कितना साबुन और पानी चाहिए?
2. हमें पारदर्शी बर्फ क्यों नहीं मिलता, पारदर्शी बर्फ कैसे प्राप्त किया जाए?
3. यदि हम एक गिलास में थोड़ा पानी भरें, उसके मुँह को एक सख्त कागज़ से ढँक दें, और गिलास को उल्टा कर दें, तो भी पानी नहीं गिरता, क्यों? और हम यह देख पाए कि हवा के दबाव वाली प्रचलित व्याख्या पर्याप्त नहीं है (see here and here for detailed explanation, although they differ a bit).
4. क्या धागों को गूँथने से ज़्यादा मज़बूत रस्सी बनती है? क्यों?
5. क्या हम विभिन्न खाद्य पदार्थों में लौह और विटामिन-सी की मात्रा पता कर सकते हैं?
6. हम इस दावे की जाँच कैसे करें कि पानी का सर्वोच्च घनत्व 4 डिग्री सेल्सियस पर होता है?

ऐसा तो नहीं है कि उपरोक्त सारी खोजबीन के सन्तोषजनक परिणाम मिल ही जाते हैं. मगर खोजबीन की प्रक्रिया में सीखने को बहुत कुछ मिलता है. लगभग सारे सहभागी अपनी टीम द्वारा विकसित परिकल्पना की जाँच के लिए प्रयोगों की एक शृंखला की योजना बनाते हैं और अपने प्रयोगों की बारीकियाँ सीखते हैं. टीमें अपनी गलतियों से सीखती हैं और सिर्फ उस सवाल के बारे में नहीं सीखतीं जिसकी वे खोजबीन कर रही हैं बल्कि उन्हें विज्ञान की प्रक्रिया का प्रत्यक्ष अनुभव भी प्राप्त होता है.

मुद्दा यह है कि जब तक स्कूलों में विज्ञान को विज्ञान की तरह – यानी सिर्फ उत्पाद नहीं बल्कि प्रक्रिया के तौर पर भी – नहीं पढ़ाया जाता, तब तक हमें परिणाम भुगतने को तैयार रहना होगा. किसी बात पर आँख मून्दकर भरोसा करने की समस्याओं की बात तो मैं पहले ही कर चुकी हूँ – क्या कॉफी से कैंसर होता है? क्या सेलफोन से कैंसर होता है? क्या टीके (वैक्सीन) सुरक्षित हैं? ऐसे मामलों में निर्णय लेने के लिए इक्का-दुक्का घटनाएँ कितनी मददगार हो सकती हैं? क्या यदि घटना A घटना B के बाद हो, तो यह कहा जा सकता है कि घटना A घटना B की वजह से होती है? यह कैसे पता किया जाए कि घटना A किस कारण से होती है?

इसके साथ हम विज्ञान के एक और लक्षण पर आते हैं – वैज्ञानिक व्याख्याएँ सुसंगत (consistent) होती हैं. विज्ञान हर परिघटना के लिए अलग-अलग व्याख्याएँ नहीं गढ़ता, और न ही वैज्ञानिक सिद्धान्त एक इकलौते अवलोकन पर टिके होते हैं.

अर्थात् विज्ञान में हम ज़्यादा तरजीह उस सिद्धान्त को देते हैं जो विविध अवलोकनों को एक साथ पिरो सके और नवीन व अनपेक्षित भविष्यवाणियाँ कर सके. उदाहरण के लिए सूर्य के आसपास पृथ्वी की परिक्रमा की व्याख्या करने के लिए हमारे पास न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण पर आधारित सिद्धान्त है और आइंस्टाइन की व्याख्या है कि विशाल पिण्ड स्थान (स्पेस) में ही वक्रता पैदा कर देता है. आइंस्टाइन के सिद्धान्त का एक दिलचस्प परिणाम था. यदि स्थान वक्रतापूर्ण है, तो प्रकाश को सीधी रेखा में आगे बढ़ने की बजाय इस वक्र रेखा पर आगे बढ़ना चाहिए. एडिंग्टन ने एक सूर्य ग्रहण के दौरान कुछ फोटोग्राफ लिए थे जिनमें दिखता था कि उन तारों का प्रकाश भी दिख रहा है जो सूर्य के पीछे हैं. इस अवलोकन ने आइंस्टाइन के सिद्धान्त को समर्थन दिया और उसे वैज्ञानिक समुदाय में व्यापक स्वीकृति मिली.

मगर यदि हम यह नहीं सीखते कि विज्ञान वास्तव में क्या है तो हम छिटपुट तर्कों और छद्म वैज्ञानिक दावों से विचलित होते रहेंगे. तथ्यों और अवधारणाओं की जो खिचड़ी हमें स्कूल में दी जाती है, उससे हमें यह सीखने में कोई मदद नहीं मिलती कि विज्ञान वाकई क्या है और न ही हम यह सीख पाते हैं कि स्वयं कोई चीज़ पता करने या किसी के दावे की जाँच करने के लिए विज्ञान की प्रक्रिया का इस्तेमाल कैसे करें. लिहाज़ा, यह सबसे एक दिली दरखास्त है कि स्कूलों में विज्ञान पढ़ाने के तौर-तरीकों में आमूल-चूल बदलाव लाएँ.


उमा सुधीर: एकलव्य के साथ जुड़ी हैं. विज्ञान शिक्षण के क्षेत्र में काम कर रही हैं.
अँग्रेज़ी से अनुवाद: सुशील जोशी: एकलव्य द्वारा संचालित स्रोत फीचर सेवा से जुड़े हैं. विज्ञान शिक्षण व लेखन में गहरी रुचि.

साभार: https://www.eklavya.in/magazine-activity/sandarbh-magazines/350-sandarbh-101-to-110/sandarbh-issue-108/1745-vigyan-ki-prakrati

सीखना और सिखाना में प्रकाशित किया गया | Tagged , , , , , , , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे

“मेरी दुनिया के तमाम बच्चे” (All the Children of My World)

38200023_505444116544003_1689815454811422720_o

All the Children of My World

 

हिंदी पोस्टर: फ़ोटो- Saswata Raha, Kolkata, डिज़ाइन- आशुतोष उपाध्याय

अंग्रेजी पोस्टर: फोटो- Enrique Castro-Mendivil

कविता में प्रकाशित किया गया | Tagged , , , , , | टिप्पणी करे

‘दो’ – सत्यजीत रे की लघु फ़िल्म (1964)

फिल्म और वीडियो में प्रकाशित किया गया | Tagged , , , , , , , , | टिप्पणी करे

वह सारस जिसे एक इंसान से प्यार हो गया

गर्मियों की एक सुबह, जब ब्लू रिज पहाड़ों (Blue Ridge Mountains) की तलहटी पर बारिश हो रही है, एक अधेड़ उम्र का आदमी एक सारस को रिझा रहा है. 42 वर्ष के क्रिस क्रो (Chris Crowe) थोड़ा नीचे झुकते हैं और अपनी बाजुओं को धीरे से पंखों की तरह फड़फड़ाते हैं. वे प्यार से कहते हैं “तो इसके बारे में क्या ख्याल है”.

वॉलनट (Walnut: अखरोट) ने यह बात पहले भी सुनी है. वह भव्य चिड़िया क्रो को नजरअंदाज करती है, अपने स्लेटी पंखों को हिलाती है, और फिर खूबसूरती से अपनी गर्दन जमीन के पास ले जाकर खाने के लिए कोई स्वादिष्ट चीज ढूंढने लगती है.

“अरे आ भी जाओ” क्रो कहते हैं. चिड़ियाघर के संरक्षक अपनी मुट्ठी में घास भरते हैं और हवा में फेंकते हैं. यह क्रो की सबसे मनमोहक अदा है – साथ में घोंसला बनाने का चालाकी भरा संकेत. वॉलनट ऊपर देखती है, उसकी पीली आंखें चमकते हुए, लेकिन वह फिर से अपनी चोंच से नम मुलायम जमीन में कुछ ढूंढने लग जाती है. वह बिलकुल भी रूमानी महसूस नहीं कर रही है, लेकिन उसका क्या दोष? मैं उन्हें गाड़ी के पीछे से जो देख रही हूं. अपनी दूरबीन से. चिड़िया बहुत असहज महसूस कर रही होगी.

क्रो मुझसे कहते हैं “गाड़ी के अन्दर जाओ”. मैं उनका कहा करती हूं, और तुरंत वॉलनट क्रो के इशारों की प्रतिक्रया देने लगती है. प्रतिक्रिया में वह भी झुकती है और फिर उनसे उलटी तरफ मुड़कर अपने पंख थोड़ा फैला लेती है. चिड़िया के पीछे घुटने टेके हुए, क्रो उसकी पीठ पर हलके से हाथ रखते हैं. फिर वे उसकी जांघें सहलाने लगते हैं, लयबद्ध तरीके से, जैसे कोई पॉर्न फिल्म का दृश्य हो. तीस सेकंड गुजर जाते हैं – लेकिन मुझे बहुत ज्यादा देर महसूस होती है – जब वॉलनट क्रो से दूर चली जाती है, अपने कुछ बाहर निकले पंख ठीक करती है, और फिर अपने पंख फैला लेती है, फिरसे करने को कहते हुए.

पिछले कुछ सालों तक क्रो इस अवसर का इस्तेमाल वॉलनट में सिरिंज के जरिए सारस का वीर्य डालने के लिए करते थे. लेकिन फिर मेम्फिस निवासी एक जोड़ा बनाने वाले एक व्यक्ति – जिनके पास वाइट-नेप्ड सारस (white-naped crane) की वंशावली पुस्तक है, और जिनका काम संरक्षित जनसंख्या में आनुवंशिक विविधता बनाना है – ने निर्धारित किया कि उन्हें अब वॉलनट से और अधिक बच्चे नहीं चाहिए, कम से कम इस साल तो नहीं. लेकिन इससे क्रो और वॉलनट ने पूरी गर्मियों में अपनी काम-क्रिया करना बंद नहीं किया, हफ्ते में पांच दिन, कभी-कभी एक दिन में कई बार. “इससे मुझे आनंद नहीं मिलता है लेकिन इससे वॉलनट खुश रहती है” क्रो बताते हैं.

w1

w2.jpg

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

बाएं से: क्रिस क्रो, स्मिथसोनियन संरंक्षण जीव विज्ञान संस्थान (Smithsonian Conservation Biology Institute, SCBI) के पक्षी संरक्षक, तासी नाम के ग्वाम रेल (Guam rail) पक्षी के साथ; वॉलनट, एक वाइट-नेप्ड सारस (white-naped crane) जो क्रो को अपना जीवनसाथी मानती है.

SCBI में क्रो के सहकर्मी वॉरेन लिंच (Warren Lynch) बताते हैं कि दो अलग प्रजातियों की इस काम-क्रिया ने यह सुनिश्चित किया है कि वाइट-नेप्ड सारस जीवित रहेंगे, भले ही बाड़ों के अन्दर क्यों न सही. “क्रिस ने वॉलनट के साथ जो हासिल किया है वह अद्भुत है”, लिंच कहते हैं. “इसे हर कोई नहीं कर सकता है.”

जब 2004 में वॉलनट फ्रंट रॉयल, वर्जीनिया, के प्रजनन केंद्र में आई थी तो आनुवंशिकी के नजरिये से वह कैद में मौजूद सबसे कीमती वाइट-नेप्ड सारस थी. 23 साल की उम्र में अभी भी उसने कोई बच्चा पैदा नहीं इया था और वह नर सारसों को मार डालने के कुख्यात थी. दो नर सारस, जिन्होंने वॉलनट को रिझाने की कोशिश की थी, मरे हुए पाए गए थे, और वॉलनट के पैने पंजों से उनका पेट चीरा हुआ था. लिंच कहते हैं कि अफवाह तो यही थी.

क्रो, जो स्मिथसोनियन के नए संरंक्षक थे, इस कार्य में लगाए गए. “वॉलनट ‘ब्लैक विडो’ जैसी कातिल जीव की तरह थी”, लिंच याद करते हुए बताते हैं. “मैंने क्रिस से कहा ‘इसके साथ सावधान रहना.’ ” वे इतने सजग, इतने संवेदनशील और धैर्यवान और समझ वाले थे कि वॉलनट का गर्भवती होना उन दोनों की कहानी का बस एक छोटा सा हिस्सा है. क्योंकि ज्यादा बड़ा किस्सा था कि क्रिस क्रो ने वॉलनट के जंगली दिल को कैसे जीता.

___

वॉलनट का जन्म 2 जुलाई 1981 को बैरबू शहर, विस्कॉन्सिन, के एक पुराने अस्तबल में हुआ था. अंतर्राष्ट्रीय सारस संस्था (International Crane Foundation, ICF) के सह-संस्थापक जॉर्ज आर्चिबाल्ड (George Archibald) बताते हैं कि वह उस गर्मी के मौसम में संस्था में पैदा हुई सातवीं सारस थी, इसलिए उसका पैदा होना बहुत बड़ी खबर नहीं बनी. वहां के वॉलंटियर ने बिना ज्यादा विचार किए उसका नाम नजदीक के रेस्तरां में मिलने वाली उनकी पसंदीदा वॉलनट क्रीम पाई के नाम पर रख दिया.

ICF के भूतपूर्व पक्षी विज्ञानी माइकल पुटनैम (Michael Putnam) याद करते हैं कि उस समय उनकी संस्था सारस के बच्चे बनाने में जोर-शोर से लगी हुई थी. जब सारस का कोई जोड़ा अंडे देता था तो वे अण्डों को इनक्यूबेटर (incubator) में रख देते थे जिससे जोड़ा और अंडे बनाने में जुट जाता था.

वॉलनट के माता-पिता, मरक्युरी (Mercury) और एमैजोन (Amazon), फिरसे अंडे देने को राजी थे. ICF में वे बहुत सारे अंडे देने के लिए प्रसिद्ध थे, और अपने अजीब सफ़र के लिए भी. संस्था के ज्यादातर सारस कैद में पैदा हुए थे, लेकिन मरक्युरी और एमैजोन जंगल से पकड़े गए थे. आर्चिबाल्ड बताते हैं कि चीन में अवैध रूप से पकड़कर हॉन्ग कॉन्ग में तस्करी किया गया यह जोड़ा संभवतः किसी प्रदर्शनी के लिए भेजा जा रहा था या किसी चर्म प्रसाधक (taxidermist) के पास. लेकिन उन्हें स्थानीय अधिकारियों ने पकड़कर आख़िरकार ICF के पास भेज दिया.

पुटनैम ने बताया कि बेहतर होता अगर उन्हें दोबारा जंगल में छोड़ दिया जाता, लेकिन 1978 में अंतर्राष्ट्रीय तनावों के कारण यह संभव नहीं हो पाया. इसके अलावा कोई भी नहीं जानता था कि उन्हें चीन में कहां पकड़ा गया था या सफ़र में किसी चीज से प्रभावित हुए थे. पुटनैम कहते हैं “हम ऐसे पक्षियों को आजाद करके उनकी जंगली आबादी के बीच नहीं छोड़ना चाहते थे जिनसे बीमारी हो सकती थी.”

आज ऐसे अवैध शिकार कम होते हैं, लेकिन वाइट-नेप्ड सारस की आबादी एक खतरनाक दुश्मन के कारण तेजी से कम हो रही है: विस्फोट करती हुई इंसानों की आबादी, जो सारसों के जिन्दा रहने के लिए जरूरी दलदली इलाकों पर कब्ज़ा कर रही है, प्रदूषित कर रही है या उन्हें सुखा रही है. आर्चिबाल्ड कहते हैं “सारस के एक जोड़े को प्रजनन करने के लिए बहुत बड़े दलदली इलाके की जरूरत पड़ती है. हो सकता है कई एकड़, या सैकड़ों एकड़.”

विशाल अनछुए जंगली इलाकों की जरूरत के अलावा ये दुर्लभ पक्षी संकरे इलाकों की ओर खिंचे चले आते हैं. उदाहरण के लिए, वाइट-नेप्ड सारसों के सबसे महत्वपूर्ण शीतकालीन प्रजनन स्थानों में से एक है उत्तरी और दक्षिणी कोरिया को बांटने वाला 2.5 मील का वह इलाका जहां सैन्य तैनाती निषेध है. वहां, एक अजीब से प्राकृतिक संरक्षण स्थान में, वाइट-नेप्ड सारस खुद से भी अधिक दुर्लभ रेड-क्राउंड सारस (red-crowned crane) के साथ मिलकर जमीन के नीचे कंद ढूंढते हैं, बारूदी सुरंगों के बीच जो सारसों के बहुत हलके होने के कारण ट्रिगर नहीं होती हैं. अगर कोरियाई देशों के बीच का तनाव कम हो जाता है, तो सारसों पर खतरा मंडराने लगेगा. किसान पहले से ही इस उपजाऊ जमीन पर खेती करने का अधिकार मांग रहे हैं और निर्माण करने वाले वहाँ एक शहर और बंदरगाह बनाने की योजना बना रहे हैं.

 

जहां संरक्षणकर्ता लोगों को सारसों के लिए जमीन बचाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, वहीं चिड़ियाघर एक समान्तर रणनीति अपना रहे हैं. वे कैद में वाइट-नेप्ड सारसों का प्रजनन करा रहे हैं जिससे एक “इन्श्योरेंस आबादी” तैयारी होगी; अगर उनके जंगली साथी विलुप्त हो जाते हैं तो इन्हें आजाद छोड़ा जा सकेगा.  मगर कैद में पली आबादी के साथ समस्या यह है कि वे आपस में प्रजनन करते हैं (जिससे आनुवांशिक विविधता कम हो जाती है), और इसीलिए – 1981 में – मरक्युरी और एमैजोन के जीन पाकर संरक्षक बहुत खुश थे.

उस जोड़े ने चीन से विस्कॉन्सिन स्थानांतरित होने पर कोई आपत्ति नहीं जताई. शायद हिमनद (glacier) से तराशा गया बैरबू का भूदृश्य उन्हें जाना-पहचाना लगा हो, या शायद मरक्युरी और एमैजोन ने एक अनजान परिस्तिथि का भी भरपूर लाभ उठाने का निर्णय लिया हो. जो भी हो, उस जोड़े ने ICF के लोगों को अपने प्रेमालाप प्रदर्शन से अचंभित कर दिया – गर्मी के पूरे मौसम में दौड़ना, झुकना, उछलना और एक-दूसरे के प्रति अपने प्यार को जोर-जोर से आवाजें निकालकर व्यक्त करना. उस साल उन्होंने नौ बच्चे दिए, जिनमें से एक वॉलनट थी.

इन बच्चों को छोटे समूहों में बड़ा किया गया, जिनकी देखभाल ‘चिक मामा’ (chikc mama: ‘चूजों की मां’) करते थे, जो उन्हें खिलाते थे, उनके बाड़े साफ़ रखते थे, उन्हें हर दिन कसरत कराने के लिए घोड़ों के मैदान में ले जाते थे और तैरना सिखाने के लिए एक छोटे पूल में ले जाते थे. ICF के भूतपूर्व कार्यकर्ता जोन फॉर्ढेम (Joan Fordham) बताते हैं कि ज्यादातर चिक मामा वॉलंटियर थे. एक गर्मी के मौसम में फॉर्ढेम की 10 साल की बेटी चिक मामा थी, और लगता है उसे ज्यादा प्रशिक्षण नहीं मिला था. फॉर्ढेम याद करते हैं, “अगर सारस आपस में लड़ने लगते थे उसे उन्हें अलग करना आता था, लेकिन और कुछ नहीं.”

तब से सारसों की देख-रेख के मानक बदल चुके हैं. अब चिड़ियाघर के बेहद प्रशिक्षित संरक्षक उनकी देखभाल करते हैं, और चूजों को या तो उनके माता-पिता के पास रखा जाता है या, अगर संभव हो तो, किसी दूसरे सारस माता-पिता के साथ. ऐसा इसलिए क्योंकि सारस माता-पिता का काम उससे कहीं ज्यादा जटिल है जैसा इंसान पहले मानते थे. सारसों की शारीरिक संकेतों की विस्तृत भाषा होती है और शिकार के जटिल तरीके होते हैं – ऐसे हुनर जो चूजे, आंशिक रूप से, अपने माता-पिता को देखकर सीखते हैं. इसके अलावा, अगर कैद में पैदा हुआ कोई चूजा जंगली इलाके में छोड़ा जाना है, तो उसके जिन्दा बचे रहने के लिए इंसानों का डर होना जरूरी है.

लेकिन सारस के चूजों को इंसानों द्वारा नहीं पालने का शायद सबसे बड़ा कारण है कि उनपर इंसानों की “छाप” पड़ सकती है. जब अपना साथी ढूंढने का समय आता है, तो इंसानी छाप पड़े हुए सारस ऐसा साथी चुनते हैं जो उन्हें अपने अभिभावक जैसा दिखता है – एक इंसान, बजाय कि दूसरी चिड़िया. वॉलनट के साथ शायद यही हुआ था.

w3.PNG

क्रो वॉलनट को चूहे का मरा हुआ बच्चा देते हुए. वॉलनट को उनका स्पर्श बर्दाश्त करने के लिए वे उसे प्रशिक्षण में ईनाम के रूप में भोजन देते थे.

1980 के दशक में भी सारसों की देखभाल करने वाले लोगों को छाप पड़ने के खतरों के बारे में पता था, और वे ध्यान रखते थे कि सारसों के बच्चे दूसरी चिड़ियाओं के साथ पर्याप्त समय बिताएं – जैसे वे उन्हें एक समूह में रखते थे और उनके आस-पास कुछ दर्पण रख देते थे. लेकिन कुछ बच्चे अपने भाई-बहनों को चोंच मारकर मार डालने को आतुर रहते थे, इसलिए उन्हें दूसरों से अलग कर दिया जाता था. आर्चिबाल्ड कहते हैं कि वॉलनट शायद ऐसी ही थी; वे ऐसा निश्चित तौर से नहीं जानते हैं क्योंकि क्रो से पहले वॉलनट के सभी संरक्षकों की तरह उन्हें भी वॉलनट के बारे में खासतौर से याद नहीं है. आर्चिबाल्ड कहते हैं “शायद वह अकेली थी और किसी ने उसपर बहुत ज्यादा ध्यान दिया होगा.”

32 करोड़ साल के जैविक विकास के फासले को पाटते हुए शायद वॉलनट ने किसी इंसान को अपने प्रेम में डाल दिया था. लिंच का अनुमान है कि इस इंसान में बहुत ज्यादा मातृत्व भाव रहा होगा. वे कहते हैं “मैं कल्पना कर सकता हूं कि जिसने उसका ख्याल रखा था शायद वह उसे बच्चे की तरह गोद में लेकर भी घूमी होगी /घूमा होगा. मैंने इतनी गहरी छाप पड़ी हुई कोई चिड़िया नहीं देखी है.”

लेकिन इस प्रेमपूर्ण सम्बन्ध ने वॉलनट को आजीवन अकेले रहने को अभिशप्त कर दिया. सारस, जो आजीवन एक ही साथी से जोड़ा बनाते हैं, सबसे खुश तब होते हैं जब वे अपने साथी के साथ रहते हैं. वॉलनट को डेन्वर (Denver) और सिनसिनैटी (Cincinatti) के चिड़ियाघरों में रखा गया लेकिन संरक्षक कभी भी उसके लिए कोई साथी नहीं ढूंढ पाए. और इस यात्रा में कहीं वह कातिल के रूप में मशहूर हो गई, भले ही कोई भी चिड़ियाघर यह स्वीकार करने को तैयार नहीं था कि कोई दुर्लभ सारस उनकी निगरानी में मरा है. फिर भी SCBI के कर्मचारी मानते हैं कि ये अफवाहें संभवतः सच हैं.

वॉलनट अपने साथ के सारसों को मार रही थी या नहीं, पर वह अपनी प्रजाति को बचाने में योगदान तो नहीं दे रही थी – और इसी वजह से अक्टूबर 2004 में उसे माँ बनाने के आखिरी प्रयास के लिए उसे SCBI भेजा गया.

w4.PNG

क्रो, जो 2004 में  SCBI आए थे, सारस के बाड़ों की देखभाल करते हुए.

___

SCBI शेनन्डो नेशनल पार्क (Shenandoah National Park) के नजदीक के पहाड़ी इलाके में 3200 एकड़ में फैला हुआ है. वहां, अपनी साथी संस्था नेशनल चिड़ियाघर वॉशिंगटन की शोर भरी भीड़ से दूर, खतरे में पड़ी 21 प्रजातियां बच्चे पैदा करने और अपनी प्रजाति को कम दुर्लभ बनाने में व्यस्त हैं.

दिसम्बर 2004 में, अपने कार्य के पहले सप्ताह में, क्रो को अपनी नई जिम्मेदारी मिली: 17 सारस और 36 बतखें. इन सभी जानवरों में भी वॉलनट अनोखी थी. अन्य चिड़ियाओं से अलग, क्रो से छिपने के बजाय वॉलनट बिना डरे अपने बाड़े की सीमा तक गई, और अपने पंखों को फड़फड़ाकर गुर्राई. क्रो स्मरण करते हैं “वह ठीक मेरे सामने आकर अलग-अलग तरह की हरकत करने लगी. उस वक्त मुझे समझ नहीं आया, लेकिन वह अपने इलाके पर हक़ जता रही थी.” उसी दौरान क्रो के सहकर्मी वॉरेन लिंच ने उन्हें वॉलनट के (तथाकथित) खूनी अतीत के बारे में बताया.

क्रो को पता था कि सभी सारसों को काफी जगह देनी है. भले ही वे बेहद हलके होते हों – सीक सी पतली टांगों के ऊपर भारहीन पंखों की तरह – सारस अपने सटीक पंजों से कपड़े और खाल चीर डालने के लिए प्रसिद्ध हैं. सारस की देखभाल करने वाले के लिए खाने के बर्तनों की सफाई करने जैसा साधारण काम भी खतरे से खाली नहीं होता है.

जाड़ों के बाद जैसे-जैसे वसंत आया, कैरल हेश (Carol Hesch), जो मेम्फिस (Memphis) चिड़ियाघर के सहायक निरीक्षक हैं और जिनके पास चिड़ियाघर तथा एक्वेरियम संघ की वाइट-नेप्ड सारस वंशावली पुस्तक (studbook) रहती है, ने एक आनुवंशिकी डेटाबेस देखा और निर्धारित किया कि वॉलनट को रे (Ray) के साथ मिलन करना चाहिए, जो उससे दो गज दूर रहने वाला एक मनमोहक नर था. लेकिन रे पहले से एबिगेल (Abigail) का साथी था; अगर वे उन दोनों को एक साथ रख देते तो कोहराम मच जाता. इसलिए कृत्रिम गर्भाधान की योजना बनाई गई, एक तनाव भरी प्रक्रिया जिसमें चिड़िया को पकड़कर उसे कई मिनटों तक दबोचकर रखना पड़ता है.

उस मार्च में, एक दिन क्रो और लिंच वॉलनट के बाड़े में गए और उसे एक कोने में घेर लिया. जैसे ही वॉलनट ने दूसरी ओर देखा, लिंच ने उसे पंखों के नीचे से दबोच लिया. फिर उन्होंने पीछे की ओर मुंह करके उसे लांघा और उसे अपने दोनों पैरों के बीच में दबा लिया. फिर क्रो उसकी क्लोआका (cloaca) – पक्षियों द्वारा मल त्यागने और प्रजनन करने के लिए इस्तेमाल होने वाली गुहा – को सहलाने लगे और उसकी पीठ पर हल्का दबाव दिया, किसी नर सारस के भार की तरह. वॉलनट ने हलके से घुरघुराहट की, उसकी क्लोआका खुली, और क्रो ने उसमें रे का वीर्य इन्जेक्ट कर दिया जो दोनों ने कुछ ऐसी ही प्रक्रिया द्वारा रे से प्राप्त किया था.

कुछ सप्ताह बाद वॉलनट ने दो निषेचित अंडे दिए, जो क्रो ने चुराकर रे और एबिगेल के घोंसले में रख दिए. यह जरूरी था क्योंकि जंगल में सारस जोड़ा बारी-बारी से अंडे सेते हैं, और क्रो नहीं चाहते थे कि वॉलनट यह अकेले करे. “इससे उसपर बहुत बोझ हो जाएगा”, वे कहते हैं, “और मैं खुद अण्डों पर नहीं बैठना चाहता हूं.”

साथ ही क्रो को समझ आ रहा था कि वॉलनट खुद को सारस नहीं मानती थी और शायद वह चूजों को भी अपना बच्चा नहीं मानती. बल्कि एक जवान सारस, जिसे वॉलनट अच्छे से दिख रही थी, हमेशा उसका ध्यान खींचने की कोशिश करता था, अपना सिर हिलाकर और आवाजें निकालकर. लेकिन वॉलनट उसपर ध्यान ही नहीं दे रही थी. “उसने उसे कोई भाव नहीं दिया”, क्रो बताते हैं.

उस गर्मी के मौसम में क्रो को पता चला कि वॉलनट की एक नर में रूचि बन रही है, उनमें. जब क्रो उसके बाड़े पर रुकते थे, तो वह अपना सिर नीचे करके अपने पंख उठाती थी- वे संकेत जो अब क्रो जानते हैं कि काम-क्रिया के नृत्य के शुरुआती कदम होते हैं. क्रो कहते हैं “पहले मैंने सोचा कि वह मुझे देखकर उत्साहित है. फिर मैंने दूसरे जोड़ों को वैसा ही करते हुए देखा और तब मुझे समझ आया.”  क्रो ने वॉलनट का नृत्य करने का निमंत्रण स्वीकार कर लिया. भले ही ये उन्हें बेवकूफी भरा लगा, लेकिन जब वॉलनट ने अपना सिर हिलाया तो उन्होंने भी अपना सिर हिलाया और अपने हाथ पंखों की तरह ऊपर-नीचे किए. उन्होंने एक-दूसरे के चक्कर लगाए और कभी-कभी वॉलनट एक जोरदार लम्बी आवाज निकालती थी – वाइट-नेप्ड सारस जोड़े के प्रेमगीत की शुरुआत. अगर कोई आस-पास नहीं होता था तो क्रो गीत के नर सारस वाले हिस्से की आवाज निकालने की कोशिश करते थे – होमर सिम्पसन कार्टून चरित्र की तरह “वू-हू” कहना – लेकिन वॉलनट को उनके प्रयास कभी भी संतोषजनक नहीं लगे.

मौसम के ठन्डे होने के साथ वॉलनट का उनके प्रति आकर्षण भी कम हो गया. लेकिन वसंत में वॉलनट अपने संरक्षक को फिर से झुककर सलाम देने लगी. इससे क्रो को एक विचार आया: अगर वॉलनट उन्हें अपना साथी मानती है, तो शायद क्रो उसके लिए और अपने लिए उस साल का कृत्रिम गर्भाधान कम तनावपूर्ण बना सकते हैं. क्रो कहते हैं “अगर हम उसे यह बिना दबोचे करा लें, तो फिर कोई तनाव नहीं होगा, और चोट लगने का कोई खतरा भी नहीं होगा.” लिंच सहमती जताते हैं, “यह हम सबके लिए और सारस के लिए कहीं बेहतर है”. वे याद करते हैं “जितना हम जानते थे, ऐसा पहले कभी नहीं किया गया था, लेकिन हमें यह कोशिश करने लायक एक अच्छी योजना लगी.”

इससे पहले कम से कम एक आदमी ने सारस के साथ “सम्भोग” किया था. 1982 में ICF के जॉर्ज आर्चिबाल्ड ने टेक्स (Tex) नाम की व्हूपिंग सारस (whooping crane) के साथ जोड़ा बनाया था. वॉलनट की तरह टेक्स पर भी इंसानों की छाप पड़ी थी, इसलिए आर्चिबाल्ड ने उसका साथी बनने और उसका कृत्रिम गर्भाधान करने का निश्चय किया, ताकि व्हूपिंग सारस की बेहद खतरे में पड़ी आबादी में एक और कीमती चूजा जुड़ जाए. तीन महीनों तक आर्चिबाल्ड ने टेक्स के बाड़े के बगल में कैंप लगाया और उसके नृत्य की नक़ल करके उसके साथ आत्मीयता बनाई. आर्चिबाल्ड बताते हैं कि टेक्स के साथ जुगलबंदी करना बहुत फुर्तीला काम था. “मैं उसके साथ दौड़ता था और हवा में उछलता था और यह सब बहुत थकाने वाला था. इससे अच्छी कसरत हुई.”

आर्चिबाल्ड सारसों के नृत्य के सभी कदम जानते थे क्योंकि उन्होंने कॉर्नेल विश्वविद्यालय (Cornell University) में अपनी पीएचडी के लिए सारस के व्यवहार का अध्ययन किया था. इसके विपरीत, क्रो ने SCBI में ही रहने वाले एक बेहद रूमानी जोड़े, ब्रेंडा (Brenda) और ऐडी (Eddie), को देखकर वॉलनट को रिझाना सीखा. ब्रेंडा को खासतौर से तब बहुत ही अच्छा लगता था जब ऐडी घोंसला बनाने के लिए उसके लिए सामान लाता था, इसलिए क्रो भी वॉलनट के लिए घास और डंडियां लाने लगे. कभी वह घोंसले से डंडियां बाहर फेंककर क्रो का उपहार एकदम ही नामंजूर कर देती थी. क्रो बताते हैं “उसे एक खास लम्बाई और मोटाई की ही डंडियां पसंद आती हैं और उसकी पसंद हर साल बदलते रहती है.” जब क्रो सही होते थे, तो वॉलनट बहुत ही खुश हो जाती थी.

भले ही क्रो ने अपने घर सजाने के हुनर को साबित कर दिया था, लेकिन वॉलनट उन्हें खुद को छूने नहीं देती थी – जो कृत्रिम गर्भाधान के लिए जरूरी था. इसलिए क्रो उसे उनका स्पर्श बर्दाश्त करने के लिए प्रशिक्षित करने लगे. वे अपना हाथ धीमे से आगे करके अपनी अँगुलियों से उसकी पूंछ के पंखों को छूते थे और फिर तुरंत उसे ईनाम में एक मरा हुआ चूहा देते थे जो वॉलनट का सबसे पसंदीदा भोजन है. आखिरकार वॉलनट ने क्रो अपनी पूरी पीठ सहलाने की इजाजत दे दी और वह बिल्ली की तरह घुरघुराहट करते हुए इससे आनंदित होती थी.

w5.PNG

वॉलनट के साथ नर सारस के व्यवहार की नक़ल करके क्रो कृत्रिम गर्भाधान की प्रक्रिया करते हुए. सारस सारा जीवन  एक ही साथी से जोड़ा बनाते हैं.

एक दिन, कुछ समय पीठ सहलाने के बाद, वॉलनट ने क्रो से मुंह मोड़ा, अपने पंख फैलाए, और अपनी पूंछ उठाई – यह सम्भोग करने का निमंत्रण था. वॉलनट क्रो को अपनी पीठ पर चढ़कर वह करने को कह रही थी जिसे काव्यात्मक तरीके से “क्लोआकल चुम्बन” (cloacal kiss) कहते हैं. क्रो याद करते हैं कि वे सकपका गए थे और अचंभित रह गए थे. वे कहते हैं “मैं इसी के लिए वह सब कर रहा था और इसकी उम्मीद कर रहा था, लेकिन जब वह हुआ तो मैं आश्चर्यचकित रह गया”.  खुद को संभालते हुए क्रो ने वॉलनट की पीठ पर हाथ रखा और कृत्रिम गर्भाधान की प्रक्रिया के अनुसार उसकी जांघें सहलाई. यह आने वाले मार्च में उन्हें असली प्रक्रिया के लिए तैयार करने वाला था.

दुर्भाग्य से वॉलनट को क्रो निराश करने वाले प्रेमी लगे, कम से कम शुरुआत में. वे बताते हैं “मैं उसकी पीठ सहलाना शुरु करता था, जहां सम्भोग करते वक्त नर सारस बैठा होता है, लेकिन मुझे उसके अन्य भाग सहलाने के थोड़ी देर के लिए रुकना पड़ता था, और इससे वह सम्भोग ख़त्म करके दूर चली जाती थी. मुझे यह सीखने में थोड़ा समय लगा कि एक हाथ एक जगह रखूं और दूसरा हाथ दूसरी जगह, और अगर मैं थोड़ी देर के लिए उससे हाथ हटा भी लूं तो भी वह सम्भोग क्रिया में शामिल रहे.”

एक बार दोनों ने इसका अभ्यास कर लिया तो इसे फिर करने का समय आ गया. मार्च 2007 में लिंच और क्रो ने रे को पकड़कर उसका वीर्य इकठ्ठा किया, और फिर क्रो ने अकेले ही वॉलनट की भागीदारी से उसका कृत्रिम गर्भाधान किया.

वॉलनट और क्रो ने इस तरह पांच चूजे पैदा किए – जो वाइट-नेप्ड सारस की कैद में मौजूद आबादी के लिए बहुत बड़ा वरदान था, लिंच कहते हैं. इसका यह अर्थ भी है कि अब वॉलनट के दुर्लभ जीन उसके साथ ख़त्म नहीं होंगे, और इसीलिए 2008 में अमैंडा (Amanda) नाम की सारस ने कैद में मौजूद सबसे कीमती सारस का खिताब वॉलनट से छीन लिया. वॉलनट की तरह ही अमैंडा के बहुत कम रिश्तेदार थे और कोई बच्चा नहीं था, इसलिए उसे SCBI भेजा गया, यह देखने के लिए कि क्या क्रो अपना जादू फिर चला सकते हैं. वे सफल हुए और इसलिए उनके पास एक और जवान सारस भेजी गई जिसका नाम था वुचेंग (Wucheng).

“अमैंडा और वुचेंग के साथ प्रशिक्षण जल्दी पूरा हो गया – मुझे लगता है इसलिए क्योंकि वॉलनट ने एक तरह से मुझे प्रशिक्षण दिया था” क्रो कहते हैं. अमैंडा का आखिरकार सफलतापूर्वक एक नर सारस के साथ जोड़ा बनाया गया, और वुचेंग इंसान और सारस दोनों के साथ आत्मीयता बना लेती है, इसलिए उसका भी शायद किसी दूसरी चिड़िया के साथ जोड़ा बना दिया जाएगा. लेकिन जहां तक वॉलनट का सवाल है, क्रो ही उसके जीवन भर के साथी हैं.

___

w6.PNG

क्रो कहते हैं “मैंने सोचा, अगर हम इतने सारे जीवों को विलुप्त करने और खतरे में डालने के लिए जिम्मेदार हैं, तो इसका समाधान भी हम ही हैं. समाधान के जिम्मेदार भी हमें ही होना चाहिए, क्योंकि इस समस्या को शुरु भी हमने ही किया है.”

शांत, गौर से सब कुछ देखने वाले छोटे क्रिस क्रो को जानवरों के साथ एक ख़ास रिश्ते का एहसास होता था. और भले ही वे रॉकविल, मेरीलैंड, (Rockville, Maryland) के मॉल और छोटे हिस्सों की बीच बड़े हुए थे, उन्हें हर तरफ वन्य जीव दिखते थे. वे कहते हैं “मैं बगीचे की गिलहरियों को खाना देता था, या अगर कोई चिड़िया का बच्चा घोंसले के बाहर होता था तो मैं उसे घर ले आता था, उसकी देखभाल करता था, उसके लिए कीड़े काट के लाता था.” क्रो कहते हैं कि उन्हें अब समझ है कि उन्हें शायद चिड़ियों के बच्चों को वहीं छोड़ देना चाहिए था जहां वे उन्हें मिले थे. नए बच्चे अजीब से और असहाय दिखते हैं, लेकिन यह उनके विकास का साधारण चरण है. माता-पिता उन्हें खाना खिलाते रहते हैं, कभी-कभी घोंसला छोड़ने के कई हफ्तों बाद तक. जब अच्छी मंशा वाले इंसान उन्हें उठाकर ले जाते हैं, तो यह अक्सर चिड़ियों के लिए बुरी खबर होती है.

जब क्रो 7 साल के थे तो येलोस्टोन (Yellowstone) नेशनल पार्क में परिवार के साथ छुट्टियों मनाने के दौरान जानवरों के प्रति उनका प्यार जीवन भर के समर्पण में बदल गया. क्रो याद करते हैं “मेरे पिता ने मुझे उठाया और मुझे एक बाइसन (bison) के सामने ले गए, जो करना सुरक्षित नहीं है. और मैं रोने लग गया. मैं डरा हुआ और परेशान था. मेरे पिता ने कुछ मजाक किया. उन्होंने कहा ‘अगर वह मारने आए, तो अपनी जगह डटे रहना और मैं दौड़कर कार ले आऊंगा.’ मुझे लगता है कि इससे मेरा डरकर रोना एकदम ख़त्म हो गया.” उस एक क्षण में क्रो ने बाइसन को उस रूप में देखा जैसा वह था: “मैंने उसकी बड़ी, चमकीली आंखों, उसके हिलते हुए कान और गीली नाक को देखा, और मुझे एहसास हुआ कि यहां एक वास्तविक प्राणी खड़ा है, एक वास्तविक जीव, जो सोचता है और महसूस करता है.”

उसके बाद उंसी यात्रा के दौरान उन्होंने पढ़ा कि कैसे 19वीं सदी के बसने वाले लोगों ने बाइसन को मारकर उन्हें लगभग विलुप्त कर दिया था. वे कहते हैं “मैं बहुत सहम गया था कि इंसान ऐसा कर सकते हैं”. उस एहसास के बाद उन्हें एक और एहसास हुआ, जिसने क्रो का जीवन और करियर निर्धारित किया. वे कहते हैं “मैंने सोचा, अगर हम इतने सारे जीवों को विलुप्त करने और खतरे में डालने के लिए जिम्मेदार हैं, तो इसका समाधान भी हम ही हैं. समाधान के जिम्मेदार भी हमें ही होना चाहिए, क्योंकि इस समस्या को शुरु भी हमने ही किया है.”

1998 में वर्जिनिया टेक (Virginia Tech) से स्नातक करने के बाद क्रो को ब्लैकवॉटर (Blackwater) और पटक्सटंट (Patuxent) राष्ट्रीय वन्य जीव पनाहगाह (refuge) में इंटर्नशिप मिल गई जहां वे जंगली चिड़ियाओं के गिनती करते थे और घोंसला बनाती वुड बतखों (wood duck) पर नजर रखते थे. उसके बाद उन्हें अपना बड़ा अवसर मिला: कैलिफ़ोर्निया के कॉन्डोर (condor) पुनर्वास कार्यक्रम में. क्रो ने एक साल तक ग्रैंड कैनियन (Grand Canyon) के आस-पास के विशाल रेगिस्तान में वहां हाल ही में छोड़े गए कॉन्डोर पक्षियों को ढूंढने के लिए गाड़ी चलाई और पैदल चले. अनुभवहीन जवान पक्षी हवा में तैरना और मरे जीव खाना सीख ही रहे थे, और क्रो का काम था उनके लिए अतिरिक्त मांस ले जाना और रहने की असुरिक्षित जगहों से उन्हें खदेड़ना.

उसके बाद उन्होंने उत्तरी कैरोलाइना (North Carolina) के भेड़िया पुनर्वास कार्यक्रम और फिर उत्तरी डकोटा (North Dakota) में तटीय इलाकों के पक्षियों पर शोध कार्यक्रम में काम किया. अंत में वे पटक्सटंट वापस आ गए जहां उन्हें व्हूपिंग सारस की देखभाल करने का काम मिला. 2003 में उनका काम 1981 की चिक मामा कार्यक्रम जैसा था जिसने वॉलनट को बड़ा किया था, लेकिन अब चूजों के साथ इंसानों के संपर्क के नियम बहुत सख्त हो चुके थे. सारसों पर इंसानों की छाप पड़ने या उन्हें पालतू होने से बचाने के लिए क्रो सारस की पोशाक पहनते थे, और वे कभी भी शब्दों में चूजों से बात नहीं करते थे. “अगर आपको उनसे बात करनी होती थी तो आपको सारस की आवाज निकालनी होती थी. अगर वे शैतानी करते थे या ध्यान नहीं देते थे, तो मुझे सिर्फ ‘बर्रर्रर्र बर्रर्रर्र’ कहना होता था”, क्रो ऐसे करके दिखाते हैं जैसे कोई बाजा बजाने वाला अभ्यास शुरु कर रहा हो. “बच्चों की तरह ही चूजे मुड़कर आपको देखते थे, और जो भी लड़ाई या शैतानी या काम वे कर रहे होते थे उसे करना छोड़ देते थे.”

क्रो को चिड़िया पसंद हैं, लेकिन उनका सपना एक और भेड़िया पुनर्वास कार्यक्रम में काम करने का है. दुर्भाग्य से ऐसी नौकरी मुश्किल से मिलती है, क्योंकि तेज दांतों वाले मांसाहारी जानवारों को आजाद करना राजनैतिक विवाद वाला मुद्दा होता है. वे कहते हैं “बहुत से लोग भेड़ियों से डरते हैं जबकि उनसे डरने का कोई कारण नहीं है”.

वहीं दूसरी ओर सारसों के पुनर्वास कार्यक्रम की अनुमति मिलना आसान होता है. आर्चिबाल्ड कहते हैं ये भव्य जीव महाद्वीप और महासागर पार करने की अपनी क्षमता से हमें विस्मित कर देते हैं. उन्हें बचाना “किसी कलाकृति को बचाने जैसा है.” साथ ही उनकी खूबसूरती उन्हें एक बढ़िया “वृहत प्रजाति” बनाती है – ऐसे शानदार बड़े जीव जिनसे लोगों को पूरे पारिस्थतिकी तंत्र को बचाने की प्रेरणा मिलती है.

पटक्सटंट में व्हूपिंग सारसों के साथ उनका काम कुछ ही महीने होता था, इसलिए जब SCBI में स्थायी सारस संरक्षक के पद की नौकरी आई, तो उन्होंने उसके लिए आवेदन किया. और तब उनकी मुलाकात वॉलनट से हुई.

___

w7.PNG

क्रो कहते हैं “अगर मेरे रिटायर होने के समय  तक भी वह यहां रही, तो मैं छोड़ नहीं पाऊंगा. मुझे खुद पर शर्म आएगी.”

कैद में रह रहे सारस 60 साल तक जी सकते हैं, जिसका मतलब है कि सैद्धांतिक रूप से क्रो का वॉलनट के प्रति समर्पण दशकों तक हो सकता है. क्रो कहते हैं “अगर मेरे रिटायर होने के समय तक भी वह यहां रही, तो मैं छोड़ नहीं पाऊंगा. मुझे खुद पर शर्म आएगी.” अगर क्रो गायब हो जाते हैं तो शायद कोई दूसरा पुरुष संरक्षक – वॉलनट साफ़ तौर से महिलाओं से ज्यादा पुरुषों को पसंद करती है – उसका दिल जीत ले. लेकिन जैसा कि क्रो ने दूसरे सारसों के साथ देखा है, अपने साथी को खोने से उनको बहुत गहरा सदमा पहुंचता है. विधवा हुई सारस खाना खाना छोड़ देती हैं और उनके विलाप की आवाज चारों ओर गूंजती है, कभी-कभी कई हफ़्तों तक.

इसकी बहुत कम संभावना है कि वॉलनट को फिर से चूजे पैदा करने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा, लेकिन क्रो ने उसके साथ नृत्य करना जारी रखा है, और जब वह कहती है “सम्भोग” करना भी. यह बहुत अजीब सी नौकरी है, लेकिन क्रो कहते हैं कि वे अब चिढ़ाए जाने के आदी हो चुके हैं. वे कहते हैं “मैं अब हर चुटकुला सुन चुका हूं” और फिर अपना पसंदीदा चुटकुला बताते हैं: “इरोटिक (erotic) और किंकी (kinky) में क्या अंतर होता है? इरोटिक, जब आप एक पंख का इस्तेमाल करते हैं. किंकी, जब आप पूरी चिड़िया का.”

लेकिन सबसे बढ़िया चुटकुला क्रो अपने जोखिम पर सुनाते हैं. जब मैं उनसे पूछती हूं कि क्या उनकी कोई महिला साथी है, और क्या वे वॉलनट से ईर्ष्या करती हैं, तो क्रो आश्चर्यजनक चुटकी लेते हैं: “वॉलनट दूसरों के लिए मुकाबला बहुत कठिन कर देती है. मुझे कभी ऐसी महिला नहीं मिलेगी जो मुझे देखते ही इतनी खुश हो जाए कि वह बस नाचने लगे.”

एक बुजुर्ग जोड़े की तरह, क्रो और वॉलनट का एक सहज जीवन बन चुका है. क्रो के साथ “सम्भोग” करने के बाद वॉलनट अक्सर अनिषेचित अंडे देती है. क्रो उनकी जगह नकली अंडे रख देते हैं; असली अंडे सड़ जाते हैं और उन्हें कौवे खा लेते हैं जिससे वॉलनट और अंडे देती है. फिर वह कई घंटों तक नकली अण्डों पर बैठकर उन्हें सेती है, इसलिए क्रो को जब भी मौका मिलता है तो वे उसकी मदद करते हैं. “मैं घोंसले के पास जाकर कहता हूं ‘अब तुम आराम कर लो,’ और वह घूमने चली जाती है. वह धारे पर जाकर नहाती है. फिर 15 या 20 मिनट बाद वह वापस आती है और घोंसले में बैठने के लिए फिरसे तैयार हो जाती है.”

हालांकि क्रो लापरवाह पिता न होने की पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन वे जानते हैं कि वे सारसों के पैमाने में खरे नहीं उतरते हैं. ये ऐसे जीव हैं जो साथी बनाने के बाद उसे आंखों से दूर नहीं होने देते हैं; इसके विपरीत क्रो हर सप्ताह के अंत में गायब हो जाते हैं. लेकिन क्रो की खामियों के बावजूद, वॉलनट उनसे बिना शर्त प्यार करती है. बल्कि क्रो कहते हैं कि इस साढ़े पांच किलो की चिड़िया की असीमित प्यार करने की क्षमता से हम सभी कुछ सीख सकते हैं. वे समझाते हैं “कोई आदर्श साथी नहीं होता है. आपको वे चीजें स्वीकार करनी पड़ती हैं जो लोग बदल नहीं पाते हैं. मेरा मतलब है कि, वह मेरे साथ रहती है, भले ही मैं नाच या गा नहीं सकता हूं.”

क्रो सारसों के साथ अपने अभूतपूर्व कार्य पर गर्व करते हैं, लेकिन वे कहते हैं कि कभी-कभी यह पूरी परियोजना व्यर्थ महसूस होती है. जंगली इलाकों में वाइट-नेप्ड सारसों की आबादी घटने में है, और बहुत सी प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर हैं. इस मुद्दे के केंद्र में जो बात है, वह शायद यह है कि ज्यादातर लोग क्रो का यह विश्वास साझा नहीं करते हैं कि जानवर भी सोचने और महसूस करने वाले प्राणी हैं. कि उनका भी इस ग्रह पर इंसानों जितना ही हक़ है.

हमारे और पर्यावरण, अन्य जीवों, और एक-दूसरे के बीच बढ़ती हुई खाई को कैसे पाटा जा सकता है? शायद क्रो और वॉलनट ये साबित कर रहे हैं कि जवाब प्यार में छिपा हुआ है. क्योंकि सबसे अधिक वैज्ञानिक, जुझारू संरक्षण प्रयासों के पीछे उस जंगली बीहड़ के प्रति एक गहरा अतार्किक प्यार होता है जो हम इंसानों के प्रति बेपरवाह है, और वह असंभव रिश्ता जो हम उन जानवारों के साथ महसूस करते हैं जिन्हें कभी भी पूरी तरह से समझ नहीं पाएंगे. इतने समय से भारी दिमाग वाले हम वानरों को लगता था कि सारे जवाब हामारे दिमाग में हैं, लेकिन शायद हमारा दिल हमें बेहतर रास्ता दिखा सकता है.

***

 

(मूल लेख में वॉलनट और क्रो की वीडियो देखें)

यह भी देखें: मिडवे (Midway)- ट्रेलर

 

लेख व चित्र साभार: https://www.washingtonpost.com/news/style/wp/2018/07/23/feature/the-crane-who-fell-in-love-with-a-human/

प्रकृति, मनुष्य में प्रकाशित किया गया | Tagged , , , , , , , , , , , , , , , , | टिप्पणी करे