(बिना कोई विशेषज्ञता या पूर्ण जानकारी के दावे के बिना एक टिप्पणी)
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फोटो 1: गलत assumptions पर आधारित पूर्वानुमान के गणितीय मॉडल ने भारत के बारे में क्या भविष्यवाणी की थी और उसका सरकारी नीति और लोगों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा है. (यह शोध कैंब्रिज विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर मैथेमैटिकल साइंसेस और चेन्नई स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ मैथेमैटिकल साइंसेज़ ने किया था और 26 मार्च को preprint के लिए भेजा था).
ग्राफ के आधार पर मॉडल के गलत assumption पर गौर करें: 1) लॉकडाउन होते ही संक्रमण के केस कम होने लगते हैं.
2) माना जाता है कि बिना लक्षण वाले asymptomatic केस नहीं हैं, और जितने भी लोग संक्रमित हैं वे लॉकडाउन से पहले पहचाने जा चुके हैं और उन्हें आबादी से अलग कर दिया जाता है.
3) लॉकडाउन 100% प्रभावी है और लोग बिल्कुल इधर-उधर नहीं जाते हैं. (यह शायद सबसे खतरनाक assumption है, क्योंकि यह सामाजिक असमानताएं बिल्कुल नजरअंदाज कर देता है: गरीबी, अधिकांश आम भारतीयों की घर में बैठे रहकर जीवित रहने की privilege ना होना, धारावी जैसे slum इलाकों की वास्तविकता जहां कई लोग बहुत छीटे से इलाके में रहते हैं और शौचालय/पानी सार्वजनिक हैं, इत्यादि. इससे वैज्ञानिक/गणितज्ञ समुदाय की अभिजात्य मानसिकता झलकती है जो वास्तविक लोगों के जीवन के संघर्षों को किनारे कर देती है).
4) लॉकडाउन के दौरान पर्याप्त टेस्टिंग होगी जिसके आधार पर पक्के तौर से कहा जा सकेगा कि संक्रमण की वास्तविक स्थिति क्या है और 49 दिन बाद स्थिति नियंत्रण में होगी.
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फोटो 2: वैज्ञानिकों का शोध, जोकि अभी सिर्फ preprint फेज में है, न्यूज़ मीडिया और सोशल मीडिया पर फैलता है. इससे नीति निर्माताओं, पुलिस/प्रशासन और जनता की राय बनती है. मॉडल की यह भविष्यवाणी की लॉकडाउन होते ही केस काम होंगे इस बात का आग्रह करता है कि तुरंत बेहद कड़े कदम उठाने होंगे. जैसा हमेशा होता है, गरीबों की मदद हमारी आखिरी चिंता होती है. इसी वजह से अन्य मुद्दे भी नजरअंदाज होते हैं: जैसे, महिलाओं/बच्चों का घरेलू हिंसा में घर में फंस जाना मदद से कट जाना, किसानों की कटाई हुई फसल या काटने को तैयार फसल, प्रवासी मज़दूरों के रहने-खाने की व्यवस्था, विकलांग नागरिक, गरीब व्यापारी जैसे ठेला वाले, नाई, दर्जी, घूम-घूमकर सामान बेचने वाले, इत्यादि. क्योंकि यह मान्यता बन चुकी है कि अगर तुरंत शत प्रतिशत लॉकडाउन ना हुआ तो गंभीर परिणाम होंगे इसलिए किसी का भी बाहर निकलना रोकना होगा.
सोचने की रोचक बात यह है कि अगर यह मान भी लिया जाए कि लॉकडाउन होते ही ‘नए’ केस कम होने लगेंगे, तो भी पहले के जो संक्रमित केस हैं उन्हें भी लक्षण दिखाने या पहचाने जाने में कुछ दिन लगेंगे..यानी केसों का कम होना कुछ दिन बाद शुरू होगा और लॉकडाउन शुरु होने के कुछ दिन बाद तक भी केस बढ़ते रहेंगे. अगर यह बात मॉडल में साफ होती, तो क्या लॉकडाउन को लागू करने के तरीके में कुछ बदलाव होता और हम गरीबों/मजदूरों के रहने-वापस जाने/ खाने की व्यवस्था में कुछ दिन लगाते?
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फोटो 3: ऑक्सफ़ोर्ड के Govt Response Stringency Index का ग्राफ जो बताता है कि किस देश ने कितना कड़े कदम उठाए हैं. भारत का लॉकडाउन दुनिया का सबसे कड़ा लॉकडाउन है और 9 पैमानों के आधार पर मई 3 तक भारत का स्कोर 100 में से 97 है. साथ ही शायद ही किसी अन्य देश ने कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग के लिए बड़े पैमाने पर ऐप डाउनलोड करना अनिवार्य किया है. (इंडेक्स यह नहीं बताता कि सरकार के उठाये गए कदम सही हैं, प्रभावी हैं या जमीनी स्तर पर पूर्णतः से लागू किए जा रहे हैं… जैसे कि यातायात और भीड़ जमा होने की पाबंदी के बावजूद मजदूर बड़ी संख्या में लौट रहे हैं और बैंकों, शराब की दुकानों इत्यादि कई जगहों पर बड़ी भीड़ मौजूद है).
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फोटो 4: इंडेक्स के parameters जिसमें से ऊपर के ग्राफ में 9 लिए गए हैं (संभवतः C1 – C8 और H3)
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फोटो 5: भारत के संक्रमण के आंकड़े. दो लाल रेखाएं लॉकडाउन 1 और लॉकडाउन 2 दर्शाती हैं. इसकी तुलना गणितज्ञों के मॉडल की भविष्यवाणी से कीजिए जिसमें लॉकडाउन होते ही केस काम होने लगे थे और 49 दिन पहुँचने तके स्थिति नियंत्रण में होने वाली थी.
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फोटो 6: लॉकडाउन के दौरान अन्य कारणों से हुई मौतों का आंकड़ा (ट्रेन से कटना, सड़क दुर्घटना, विभिन्न कारणों से आत्महत्या, हत्या, लाठीचार्ज, भूख/प्यास से मौत, इत्यादि). वायरस से अभी तक जितनी मौतें हुई हैं (2109), उसका लगभग 18% प्रतिशत ज्ञात मौतें (372) लॉकडाउन में अन्य कारणों से हुई हैं! वेबसाइट पर आप कारण देख सकते हैं- https://thejeshgn.com/projects/covid19-india/non-virus-deaths/
मॉडल के assumptions पर फिर से गौर करें और उसे हमारे समाज की असमनाताओं और अन्यायों की कसौटी पर तोलें, तो हमारे विज्ञान/गणित, वैज्ञानिकों/गणितज्ञों और विज्ञान की श्रेष्ठता पर क्या सवाल उठते हैं? जैसा कि Politically Math के लेख (https://www.politicallymath.in/what-modeling-the-pandemic-reveals-about-our-mathematics/) में कहा है, हमारे वैज्ञानिक ‘छद्म विज्ञान’ के खिलाफ तो मोर्चा खोलते हैं लेकिन वैज्ञानिकों के छल और इस तरह के ‘गणितीय रूप से सही, लेकिन व्यावहारिक रूप से बेकार’ मॉडल्स पर उतने सवाल नहीं उठाते हैं. साथ ही इन गणितज्ञों की अमूमन अभिजात्य पृष्ठभूमि उन्हें शायद सामाजिक असमनाताओं/वास्तविकताओं, अवसरों/संसाधनों की असमानताओं के प्रति blind spot देती है और मॉडल के सरलीकरण की प्रक्रिया में ये समाजिक जटिलताएं खो जाती हैं. इसके बाद समाज, सरकार और मीडिया की सामंती और गरीब-विरोधी सोच आगे का काम करती है.
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यही सोच जनसंख्या नियंत्रण के लिए सख्त कानूनों के तर्कों में भी काम करती है जो नजरअंदाज कर देती है कि अमीर/मध्यम वर्ग का 1 बच्चा अपने जीवन में जितने संसाधन इस्तेमाल करता है और उसका जितना कार्बन फुटप्रिंट है, उतने में शायद गरीबों के 50 बच्चे पल जाएंगे (oxfam के अनुसार सर्वोच्च 10% आय वाले लोग सबसे कम 50% आय वाले लोगों से अधिक कार्बन उत्सर्जन करते हैं: फ़ोटो 7)
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अमीर देशों के लोग गरीब देशों के लोगों से कहीं अधिक संसाधन खर्च करते हैं (oxfam, फोटो 8).
जनसंख्या नियंत्रण के लोकतांत्रिक, प्रभावी और दूरगामी उपाय हैं गरीबी हटाना, महिलाओं की शिक्षा और सशक्तीकरण, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार, इत्यादि. लेकिन इसकी तुलना में कानून बनाकर अधिक बच्चे वाले परिवारों को सुविधाओं और अधिकारों आए वंचित करना आसान है और उसमें धार्मिक/सामाजिक भावनाओं से खेलने का मौका होता है.
जलवायु परिवर्तन (Climate Change) की बात साधरणतया दो में से एक प्रकार से ही होती है. पहला, वैज्ञानिकों के भयानक पूर्वानुमान जो बताते हैं कि हमारी दुनिया तहस-नहस होने वाली है. दूसरा, इसकी रोकथाम पर होने वाली राजनीति की बात.
इस विषय पर या तो अतिशयोक्ति में बात होती है या तो श्मशान की चुप्पी रहती है. जलवायु परिवर्तन पर सीधी-सहज भाषा में बात करने के बजाय हम उससे जुड़े गौण विषयों पर बात करते हैं. उनमें सनसनी होती है, विवाद होता है, नाटकीयता होती है.
जलवायु परिवर्तन की बात साधरणतया दो में से एक प्रकार से ही होती है. पहला, वैज्ञानिकों के भयानक पूर्वानुमान जो बताते हैं कि हमारी दुनिया तहस-नहस होने वाली है. दूसरा, इसकी रोकथाम पर होने वाली राजनीति की बात, जिसमें बड़े-बड़े देशों के बीच में विवाद हो और नए समीकरण बनें ताकि उत्तेजक सुर्खियां बन सकें. जैसे, ट्रम्प और ग्रेटा थनबर्ग के बीच के तनाव से हुआ.
दोनों ही तरीके असहज हैं. दोनों हमें विवेक का, समझदारी का रास्ता नहीं दिखाते. लेकिन करें भी क्या, जलवायु परिवर्तन इतनी असहज बात है कि सहज भाषा में उसका वर्णन करना बहुत कठिन है. खासकर सहज हिंदी में, क्योंकि इसकी आधिकारिक सामग्री अंग्रेजी में ही मिलती है. किन्तु हिंदी का इलाका जलवायु परिवर्तन की चपेट से बचेगा नहीं. बल्कि सभी प्रमाण बता रहे हैं कि हिमालय और उसकी नदियों के मैदानी इलाकों में बसे हिंदी के इलाके पर इसकी गाज गिरेगी.
मौसम मतलब जलवायु नहीं
हमें मौसम समझ आता है. गर्मी की तपन और सर्दी की सिहरन को हमारी त्वचा अनुभव करती है. बाढ़ आने पर चढ़ता पानी हमें दिखता है, डूबते हुए लोगों के चित्र भी. अकाल-सूखे में पानी की किल्लत क्या होती है यह या तो हमने खुद महसूस किया होता है या दूसरे लोगों की वेदना जानी होती है.
अपनी इन्द्रियों से हम मौसम का बोध कर सकते हैं. पृथ्वी के वायुमंडल के सबसे निचले हिस्से में किसी एक जगह पर एक समय की अवस्था ही मौसम है. किन्हीं दो जगहों का मौसम बिलकुल एक-सा नहीं रहता. बल्कि एक स्थान का मौसम भी समय-समय पर बदलता रहता है. हमारे कई गांव-शहर ऐसे हैं जहां जाड़े में तापमान शून्य के करीब पहुंच जाता है और गर्मी में पारा 45 डिग्री सेल्सियस पार कर जाता है. जहां अकाल और बाढ़ दोनों की मार पड़ती है। कई जगहें ऐसी हैं जहां तापमान एक दिन में ही 20 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बदलता है.
मौसम में बड़े-बड़े बदलाव आते रहना सामान्य बात है. चूंकि पृथ्वी सूरज की टेढ़ी परिक्रमा करती है सो ऋतु में परिवर्तन होता ही रहता है. दिसम्बर में पृथ्वी सूरज के दक्षिण में चली जाती है तो सूरज उत्तरायण हो जाता है. उत्तरी गोलार्ध में तब गर्मी बढ़ने लगती है और दक्षिणी गोलार्ध में ठंड हो जाती है. जून में पृथ्वी सूरज के उत्तर में चली जाती है और सूरज दक्षिणायन हो जाता है. इस समय उत्तरी गोलार्ध में ठंड हो जाती है और दक्षिणी में गर्मी. जब तक पृथ्वी द्वारा सूरज की परिक्रमा बदलती नहीं है तब तक यह ढर्रा बदलेगा नहीं. मौसम बदलता ही रहेगा.
जब तापमान में इतनी फेरबदल होती ही रहती है, तो फिर इतने छोटे-मोटे अंतरों की चिन्ता हम क्यों करें?
शरीर का मौसम, शरीर की जलवायु
कारण है. उसे जानने से पहले एक उदाहरण आजमाइए. अगर आप चूल्हे पर रोटी सेक रहे हैं तो आपके हाथों का तपना निश्चित है. इससे ठीक उलट अगर आप नंगे पैर बर्फीले पानी में उतर जाएंगे तो आपके पैर ठण्डे हो जाएंगे. यह आपके हाथ या आपके पैर का मौसम है. किन्तु इन दोनों ही स्थितियों में आपके शरीर का औसत तापमान 37 डिग्री सेल्सियस के आसपास ही रहेगा.
हमारी इन्द्रियां यह नहीं बतातीं कि हमारे शरीर का औसत तापमान क्या है. उसके लिए तो थर्मामीटर ही काम आता है. अगर उसमें हमारे शरीर का तापमान एक डिग्री बढ़ के 38 डिग्री सेल्सियस (यानी 100 डिग्री फैरनहाइट) से ऊपर चला जाए, तो मान लिया जाता है कि हमें बुखार आ गया है, कोई रोग हो गया है. अगर बुखार 104 के ऊपर चला जाए (यानी 40 डिग्री सेल्सियस, सामान्य से तीन डिग्री ज्यादा), तो शरीर पर पानी-बर्फ की ठंडी पट्टी रखी जाती है, अस्पताल में भर्ती किया जाता है, दवाई कराई जाती है.
डॉक्टर हमें बताते हैं कि हमारा शरीर बेहद बारीक अंदरूनी तालमेल से चलता है. रोग के कुछ लक्षण तो दिख जाते हैं लेकिन उनकी पहचान भी अनुभवी चिकित्सक ही कर सकते हैं. रोग का ठीक निदान करने के लिए इसके बावजूद खून या मल-मूत्र की जांच करवाई जाती है और कई तरह की दूसरे जांच उपकरण भी होते हैं. कोई अल्ट्रासाउन्ड, तो कोई एक्स-रे, तो कोई ई.सी.जी…
हर जांच शरीर की जलवायु के बारे में कुछ-न-कुछ बतलाती है – ऐसी बात जो हम अपने एहसास से नहीं समझ सकते. अगर ऐसी जांचें कई सालों तक तरह-तरह से की जाएं तो हमें अपने शरीर के बारे में ऐसा बहुत कुछ पता चल सकता है जो सहज रूप से अपने इन्द्रीय बोध से पता नहीं चल सके. किसी एक तरह के असंतुलन से कई तरह के रोग हो सकते हैं. उदाहरण के लिए अगर आपके शरीर में इन्सुलिन का रासायनिक संतुलन बिगड़ जाए, तो मधुमेह का रोग हो जाता है. मधुमेह फिर कई तरह के दूसरे रोगों का कारण बनता जाता है.
ऐसी जांच की जरूरत तभी पड़ती है जब हम बीमार हों. स्वस्थ्य व्यक्ति को ये सब सोचना नहीं पड़ता. उसे जांच की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि उसके शरीर की जलवायु में संतुलन सहज ही बना रहता है.
जलवायु हमारे इन्द्रियों से परे है
अपने शरीर की जलवायु की तुलना में पृथ्वी की जलवायु कहीं ज्यादा जटिल है, विशाल है. जब हम अपने शरीर को इतना कम समझ पाते हैं, तो पूरे ग्रह को चलाने वाली प्रक्रियाओं को कैसे समझ सकते हैं? सीधी-सच्ची बात यह है उसे हम अपनी इन्द्रियों से वैसे नहीं समझ सकते हैं जैसे मौसम को समझते हैं.
यह पृथ्वी के वायुमंडल के सबसे निचले हिस्से की वह अवस्था है, जिसे हम किसी एक छोटे-से काल खंड में एक छोटे-से स्थान पर महसूस कर सकते हैं. मौसम घटनाओं पर केंद्रित रहता है, जैसे तूफान या लू-लपाटा या गर्मी-सर्दी. हम गागर में रखा पानी अपनी आंखों से नाप सकते हैं, सागर का पानी नहीं नाप सकते हैं.
अगर मौसम को हम वृन्दावन में बाल-कृष्ण का रूपक दें, तो जलवायु विष्णु का विश्व रूप है. मौसम वह विग्रह है, वह मूरत है जिसमें कई लोग देवों को पूजते हैं. जलवायु निराकार ब्रह्म है जो हमारे इन्द्रिय ज्ञान से परे है लेकिन जिसके सहारे हमारा जीवन चलता है.
मौसम का बोध इन्द्रिय है, जलवायु की कुंजी है विज्ञान
जलवायु पूरे ग्रह की होती है. यानी वायुमंडल ही नहीं, कुल समुद्र और धरती पर व्याप्त निर्जीव चीजों और सभी जीवों और वनस्पति से उसका सम्बन्ध भी. जलवायु सभी घटनाओं की लम्बे समय में निकली औसत होती है. इसे हम अपनी इन्द्रियों से नहीं जान सकते परन्तु पृथ्वी पर दशकों से जगह-जगह की गई तरह-तरह की वैज्ञानिक जांचों से मिले तथ्यों और आंकड़ों की मदद से जान सकते हैं.
हमारे ग्रह पर जीवन पर्यावरण के जिन वृहत् रूपों में चलता है उनका सन्तुलन एकदम बारीक होता है. आधा-एक डिग्री का अन्तर जलवायु के लिए बहुत बड़ी बात हो जाती है. अगर हम मौसम को अपनी महीने भर की तनख्वाह या कमाई मानें, तो जलवायु दशकों में फैली सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था होगी. हमारी कमाई में कम-ज्यादा हो सकता है पर अर्थव्यवस्था के संचालन में एक-दो प्रतिशत का बड़ा असर पड़ता है.
ओज़ोन परत में छेद : बहुत से लोग यह मानते हैं कि इसका कारण जलवायु परिवर्तन है. दोनों में कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है. यह गलतफहमी बताती है कि हम जलवायु को कितना कम समझते हैं. ओज़ोन की परत में छेद का कारण कुछ विशेष बनावटी रसायन थे. इन कृत्रिम रसायनों का उपयोग फ्रिज इत्यादि उपकरणों में होता था (विशेषकर ‘क्लोरोफ्लोरोकार्बन’ या सी.एफ.सी.)। सन् 1989 में ‘मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल’ नामक एक अंतरराष्ट्रीय सन्धि के अंतर्गत इन रसायनों के उत्पादन और उपयोग पर प्रतिबन्ध लगा. तब से ओज़ोन की परत में छेद की समस्या ठीक होने लगी है.
1990 के दशक में इस छेद की बढ़त थम गई और 2000 के दशक में इस छेद का औसतन आकार घटने लगा. इस छेद का आकार कभी भी एक सा नहीं रहता, यह घटता-बढ़ता रहता है. सन् 2019 में अन्टार्कटिका के ऊपर ओज़ोन परत में छेद आज तक सबसे छोटा पाया गया है, हालांकि इसके कारण बहुत जटिल हैं और शायद इसका लेना-देना जलवायु परिवर्तन से ही है. हो सकता है कार्बन की हवाई मात्रा में बढ़त ओज़ोन परत को ठीक करने में सहायक हो.
ओज़ोन गैस वैसे वायुमंडल को गर्म करने वाली गैस है, यानी इसकी बहुतायत जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा देगी. यही नहीं, जो बनावटी रसायन ओज़ोन में छेद कर रहे थे वे भी वायुमंडल को गर्म करने की क्षमता रखते हैं. लेकिन दोनों की ही मात्रा वायुमंडल में इतनी कम है कि इसकी चिन्ता का कोई कारण नहीं है. ओज़ोन की परत हमें सूरज की खतरनाक किरणों से बचाती है इसलिए उसका वायुमंडल में रहना जरूरी है.
जलवायु के सम्बन्ध इतने जटिल होते हैं कि विज्ञान के लिए भी उन्हें समझना आसान नहीं होता. इसका मतलब यह कतई नहीं है कि जलवायु परिवर्तन को हम समझ नहीं पाए हैं. ओज़ोन परत को बिगड़ने से हमने रोक लिया है, क्योंकि उसमें छेद करने वाले बनावटी रसायनों को हम समझ सके और उनके पर्याय खोज लिए गए. जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए जो जरूरी है वह करने से सभी देश बचना चाहते हैं. ओज़ोन परत और उसके छेद को समझना हमारे मानस के लिए आसान है.
वायु प्रदूषण : हमारी बस्तियों के आस-पास की हवा में धुंआ इकट्ठा हो जाता है, जिसका स्रोत या तो वाहन हो सकते हैं या पराली जलाना भी. इस वायु प्रदूषण के कई स्रोत हैं. लेकिन इसका जलवायु से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है. उदाहरण के लिए जो ओज़ोन गैस ऊपरी वायुमंडल में हमारी रक्षा करती है वह जमीन के पास जिस हवा में हम सांस लेते हैं, उसमें एक खतरनाक प्रदूषण है. जमीन के पास ओज़ोन हमारे स्वास्थ्य को बिगाड़ती है, खासकर हमारी चमड़ी को, और वह पौधों के लिए भी हानिकारक है.
ऐसा पूर्णतया सम्भव है कि जिन नगरों की हवा साफ-सुथरी है, वे जलवायु परिवर्तन में ज्यादा बड़ा योगदान दे रहे हैं बजाए ऐसे किसी नगर के जिसकी हवा धुंए से प्रदूषित है. यह जरूरी नहीं है लेकिन हो भी सकता है. किसी भी नगर या स्थान पर होने वाला वायु प्रदूषण उसी जगह या इलाके की समस्या होता है, यह सार्वजनिक स्वास्थ्य का मामला है। जलवायु परिवर्तन समस्त मनुष्य प्रजाति ही नहीं, पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीवों की समस्या है, यह हमारे कुल ग्रह के स्वास्थ्य का मामला है. वायु प्रदूषण का होते रहना जलवायु पर असर डालता है, यह तय है. दोनों का जटिल सम्बन्ध भी है. पर सीधे रूप से दोनों अलग विषय हैं.
कब होगा यह परिवर्तन? : हम सालों से सुनते आ रहे हैं कि जलवायु बदल रही है. पर जीवन तो जैसा चलता है वैसा ही चल रहा है. सही है, बहुत कुछ बदलाव आए हैं किन्तु बदलाव तो आते ही रहते हैं. जलवायु ही अलग क्यों हो? इस तरह की बातें चलती रहती हैं. इसे समझने के लिए मनोविज्ञान का सहारा लेना होगा (नीचे इस पर विस्तार से बात होगी). हमारी समझ हमारी कल्पना पर निर्भर होती है. जलवायु इतनी बड़ी चीज़ है कि वह हमारी कल्पना में भी नहीं समा सकती. तो हम उसे अपनी कल्पना के छोटे-मोटे सांचे में ढालने की कोशिश करते हैं.
हमारी कल्पना का सांचा छोटे-छोटे काल-खंडों को समझता है. समय की ये इकाइयां जलवायु के लिए इतनी ही नगण्य हैं जितने अंतरिक्ष से देखने पर हम होते हैं. जलवायु परिवर्तन ऐसी चीज़ नहीं है जिसे हम अपने इन्द्रीय बोध से भांप सकें, नाप सकें. यह इतना धीरे-धीरे होता है कि हमारे सिर पर बाल उगने की गति भी इसके लिए बहुत तेज है. विज्ञान ने अनुमान लगाए हैं कि इसका असर कब होगा. प्रमाण बता रहे हैं कि यह उससे भी तेजी से हो रहा है.
क्या जलवायु परिवर्तन पर्यावरण कार्यकर्ताओं का फैलाया हौव्वा है?
विज्ञान के अलावा जलवायु परिवर्तन को समझने का कोई तरीका हमारे पास नहीं है. विज्ञान के पास आज जो भी प्रमाण मौजूद हैं उनसे कोई शक नहीं बचता कि पृथ्वी की जलवायु बदल रही है, और इसका कारण आधुनिक औद्योगों द्वारा जलाए कोयले और पेट्रोलियम का हवाई कार्बन है.
सन् 2013 में चार देशों के नौ वैज्ञानिकों ने मिल के यह जानने की कोशिश की कि विज्ञान की दुनिया में जलवायु परिवर्तन को कैसे देखा जा रहा है। इसमें तरह-तरह के वैज्ञानिक थे – मनोवैज्ञानिक, भूगोलशास्त्री, इतिहासकार, मौसम वैज्ञानिक, रसायनशास्त्री, पर्यावरणशास्त्री. इन्होंने पाया कि 97% वैज्ञानिक शोध यह स्वीकार करते हैं कि जलवायु परिवर्तन का कारण औद्योगिक विकास से होने वाला कार्बन का हवाई निस्तार है.
इसके तीन साल बाद एक दूसरे अध्ययन ने उन 2-3% वैज्ञानिक शोधपत्रों की समीक्षा की जो यह नहीं मानते थे. उन्होंने पाया कि इन सभी अनुसन्धानों की पद्धतियों में कुछ बुनियादी चूकें थी, जिनकी वजह से इनके निष्कर्ष अलग आ रहे थे. यानी विज्ञान की दुनिया में इसको ले के कोई संशय नहीं है कि हमारी जलवायु बदल रही है और इसका कारण औद्योगिक विकास से निकला हवाई कार्बन मुख्य है. ऐसा सदा से नहीं था.
बहुत से वैज्ञानिक शुरुआती दिनों में यह नहीं मानते थे. किन्तु विज्ञान वैज्ञानिकों के मत या अवधारणा पर आधारित नहीं है. वह प्रमाण मांगता है. सभी प्रमाण कई साल से एक ही दिशा में जा रहे हैं. इसीलिए सभी वैज्ञानिक धीरे-धीरे यह स्वीकार कर रहे हैं कि यह आकस्मिक नहीं है. जलवायु परिवर्तन हो रहा है और वह मनुष्य के औद्योगिक विकास से ही हो रहा है.
वैज्ञानिक इतने निश्चय से यह कैसे कह सकते हैं?
विज्ञान को जलवायु के गर्म होने की समझ लगभग 200 साल में तरह-तरह के वैज्ञानिकों के काम से हासिल हुई है. पहले हुए काम के प्रमाण न मिलने पर उसे नकार दिया गया है और परीक्षणों में जो बार-बार सिद्ध हुआ है उसे माना गया है. इस लम्बी कड़ी में एक महिला वैज्ञानिक का नाम आता है जिन्होंने सन् 1849 में ही इसे समझाया था, पर जिनकी बात इसलिए नहीं सुनी गई क्योंकि वह एक महिला थीं.
इस अवधारणा को मानने वाले और नकारने वाले वैज्ञानिकों ने तरह-तरह के परीक्षण किए, कई कसौटियों नए-पुराने प्रमाणों को कसा. इसे लेकर चिन्ता 1950 और 1960 के दशकों में गहराने लगी और 1970 के दशक में यह समझ आने लगा कि इसका सीधा सम्बन्ध मनुष्य के औद्योगिक विकास से पैदा हुए हवाई कार्बन से है. इसी दौरान एक अमेरिकी भूगोल-रसायनशास्त्री ने ‘ग्लोबल वॉर्मन्ग’ की एक सुलझी हुई अवधारणा सामने रखी.
इसका असली स्वरूप तो 1980 के दशक में ही सामने आया. इसे समझने के लिए सन् 1985 में संयुक्त राष्ट्र के पर्यावरण कार्यक्रम और विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने कुछ दूसरे वैज्ञानिक संगठनों के साथ मिल के एक समिति बनाई. जल्दी ही पता चला कि यह विषय बहुत जटिल है और इस पर शोध भी दुनिया के तरह-तरह के संस्थानों और विश्वविद्यालयों में हो रहा है, जिसे संकलित कर उसकी समीक्षा करने के लिए बड़ी संख्या में वैज्ञानिकों की जरूरत है.
सन् 1988 में कई देशों ने जलवायु परिवर्तन एक अन्तर-सरकारी वैज्ञानिक दल (आई.पी.सी.सी.) बनाया. इसका सचिवालय स्विट्जरलैंड के नगर जिनिवा में रखा गया. इसका काम खुद शोध करना नहीं है – जलवायु परिवर्तन पर दुनिया भर में होने वाले शोध को यह जांचता है, उसका आकलन करता है, समीक्षा करता है. यह सब करने के बाद यह दल समय-समय पर अपनी आधिकारिक आकलन रपटें निकालता है जिनके आधार पर सरकारों को निर्णय लेने होते हैं. पहली आकलन रपट सन् 1990 में आई थी और पांचवीं रपट सन् 2014 में. छठवीं रपट सन् 2022 में जारी होगी. आई.पी.सी.सी. को सन् 2007 का विश्व शान्ति का नोबेल पुरस्कार दिया गया.
1990 के दशक से कंप्यूटर तंत्र में हुए विकास की वजह से जलवायु के विज्ञान में परिपक्वता आई है, विश्वसनीयता आई है. कंप्यूटर की गणना करने की ताकत में बेहिसाब बढ़त हुई है, जिससे इन सभी प्रमाणों को उनके मॉडल में डाला जाता है. हर मॉडल के नतीजों की तुलना दूसरे मॉडलों के नतीजों से होती है. इन सभी के अनुसन्धान और निष्कर्षों पर दुनिया भर के विश्वस्त वैज्ञानिकों की की निगरानी रहती है, आई.पी.सी.सी. के जरिए. आज विज्ञान की दुनिया बिना किसी संशय के कह सकती है कि जलवायु परिवर्तन हो रहा है और उसका कारण हमारे औद्योगिक विकास से निकला कार्बन का धुंआ ही है. यही नहीं, पिछले कुछ सालों से वैज्ञानिक कह रहे हैं कि जो खतरा उन्हें समझ में आ रहा है उसका सटीक वर्णन करने के लिए सही शब्द उनके पास नहीं हैं.
हवाई कार्बनः जलवायु परिवर्तन का कारण
पिछले 200 साल के औद्योगिक विकास का आधार रहा है कोयला और पेट्रोलियम जलाना. इसकी वजह से हम धरती के नीचे दबा कार्बन धुंए के रूप में वायुमंडल में पहुंचा रहे हैं. पृथ्वी के इतिहास में वायुमंडल में हवाई कार्बन की मात्रा बदलती ही रही है. लेकिन जितना तेजी से यह अब हो रहा है इतना तेजी से पहले कभी नहीं हुआ है.
कार्बन का रासायनिक स्वभाव स्थिर भी है और चंचल भी. इसके कण बहुत लंबी-लंबी कड़ियां बना के कई तरह के तत्वों से विविध प्रकार के बन्धन बना सकते हैं. इस निराले स्वभाव की वजह से ही यह जीवन का आधार है. पौधे अपना भोजन बनाने के लिए ‘फोटोसिन्थेसिस’ (प्रकाश संश्लेषण) करते हैं, जिसमें सूरज का प्रकाश और पानी और कार्बन-डाइऑक्साइड को मिला के एक तरह की शक्कर बनाता है. इसका कचरा ऑक्सीजन बाहर फेंक दिया जाता है.
हमारे जैसे प्राणियों का पोषण इससे ठीक उलटा होता है. हम अपने भोजन में पौधों या दूसरे प्राणियों को खाने से कार्बन या शक्कर पाते हैं और उसे जलाने के लिए आक्सीजन खींचते हैं. बदले में हम कार्बन-डाइऑक्साइड छोड़ते हैं. जो कार्बन हवा से वनस्पति हवा से निकालते हैं उसे हम वापस हवा में डाल देते हैं. यही कार्बन चक्र है. हवाई कार्बन जीवन के लिए जरूरी है. इसका एक दूसरा नतीजा भी हैः हमारे ग्रह के तापमान का संचालन.
कार्बन गर्मी सोखता है
पृथ्वी की लगभग सारी ऊर्जा सूरज से आती है (भू-तापीय ऊर्जा को छोड़ कर)। जब पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, तब एक हिस्से पर सूरज की किरणें पड़ती हैं, उससे ऊर्जा मिलती है, गर्माहट भी. 12 घंटे बाद वह हिस्सा सूरज से दूसरी ओर घूम जाता है, अंधियारे अन्तरिक्ष की ओर मुंह कर लेता है. सोखी हुई सौर ऊर्जा अब अन्तरिक्ष में छूट जाती है. एक ऐसे रूप में जाती है जो हमारी आंख को दिखता नहीं है (‘इन्फ्रारेड रेडियेशन’).
इस गर्मी को पृथ्वी के वायुमंडल से होते हुए जाना पड़ता है, कई तरह की वायु से टकराते हुए. वायुमंडल में 78.09 फीसद नाइट्रोजन है और लगभग 20.95 फीसद आक्सीजन – दोनों को मिला 99.04 प्रतिशत हो जाता है. बचे 1 प्रतिशत में भी ज्यादातर हिस्सा ऑर्गन नामक गैस का है. वनस्पति से आने वाली ऑक्सीजन वायुमंडल के निचले हिस्से में ही पाई जाती है, इसके दो कण एक-दूसरे से चिपके रहते हैं. नाइट्रोजन और ऑर्गन दोनों ही बेहद स्थिर गैस हैं. इनके कण एक-दूसरे को इतने कसे हुए बन्धन में पकड़ के रखते हैं कि किसी दूसरे पदार्थ से इनकी प्रतिक्रिया नहीं होती. धरती से छूटी हुई गर्मी से इनको कोई खास अन्तर नहीं पड़ता.
जीवन के लिए इस गर्मी को रोकना जरूरी है, नहीं तो पृथ्वी पर मौजूद पानी हिमनदों में जम जाएगा और ‘आइस एज’ (हिम युग) आ जाएगा. आज पृथ्वी की सतह का औसत तापमान लगभग 15 डिग्री सेल्सियस है, तो वह इसलिए कि कोई दूसरी गैस इस गर्मी को पकड़ के वापस भेज रही है. अगर यह गैस न हो, तो हमारे ग्रह का तापमान 38 डिग्री सेल्सियस गिर जाए, शून्य से 18 डिग्री नीचे चला जाए. यह काम कार्बन-डाइऑक्साइड करती है.
कार्बन का कांपना, थिरकना
वायुमंडल में कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा मात्र 0.04 फीसद ही है. इसके कणों में कार्बन और ऑक्सीजन दोनों हैं. इनकी रासायनिक रचना थोड़ी जटिल है जिसकी वजह से जब इन पर धरती से छूटती गर्मी पड़ती है तब इसके बन्धन जरा से ढीले पड़ जाते हैं. इसके बाद ये कण कांपने लगते हैं, नाचने लगते हैं. इसकी वजह से इस विकिरण का एक हिस्सा छितरा जाता है और गर्मी के रूप में पृथ्वी पर लौट आ जाता है, जीवन के पालने-पोसने का काम करता है.
वायुमंडल में कार्बन की मात्रा एक-सी नहीं रहती है. जब-जब वायुमंडल में यह कम हुई है, पृथ्वी पर हिम युग आए हैं. जब यह बढ़ी है तब बर्फ पिघली है और पृथ्वी जलमग्न हुई है. यह कई बार हुआ है. आज विज्ञान के पास इसका इतिहास नापने के कुछ साधन और प्रमाण हैं. इससे पता चलता है कि समुद्र का स्तर घटता-बढ़ता रहा है और इसका सीधा सम्बन्ध हवाई कार्बन की मात्रा से है.
नहीं. भाप भी धरती से छूटती गर्मी को वापस फेंकती है. वायुमंडल में भाप की मात्रा कार्बन-डाइऑक्साइड से ज्यादा है, इसलिए वह भी जलवायु परिवर्तन का कारण है. किन्तु भाप कुछ दिन हवा में ही रहती है और फिर हट जाती है. कार्बन-डाइऑक्साइड के कण सदियों तक हवा में बने रहते हैं. इसका एक संयुक्त प्रभाव भी होता है. हवाई कार्बन से बढ़ने वाली गर्मी समुद्र के पानी से और ज्यादा भाप बनाती है, जिससे और ज्यादा गर्मी होती है. इसलिए भाप के दुष्प्रभाव के पीछे भी अत्यधिक कार्बन ही है.
भाप और कार्बन-डाइऑक्साइड के अलावा भी कुछ गैस हैं जो जलवायु परिवर्तन में हिस्सा लेती हैं. इनमें मीथेन है, जो कार्बन का ही एक और रूप है. नाइट्रस-ऑक्साइड में भी तापमान बढ़ाने की बड़ी क्षमता होती है जिसका स्रोत है आधुनिक कृषि. खेती में इस्तेमाल होने वाले यूरिया का एक बड़ा हिस्सा टूट के वायुमंडल में चला जाता है. नाइट्रोजन की तरह यह स्थिर नहीं होता, बल्कि बेहद प्रतिक्रियाशील होता है. इसके अलावा ओज़ोन भी वायुमंडल में गर्मी बढ़ाती है. किन्तु इन सभी की तुलना में सबसे मारक क्षमता तो कार्बन की ही पाई गई है.
एक लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन
सितम्बर 2016 एक ऐतिहासिक महीना था. इसमें हवाई कार्बन की मात्रा 400 अंश के पार चली गई. (इसका मतलब है कि हवा के दस लाख कणों में 400 अंश कार्बन के हैं) वैसे हमारे वायुमंडल में कार्बन की मात्रा मौसम के साथ घटती-बढ़ती रहती है.
ज्यादातर जमीन उत्तरी गोलार्ध में है सो ज्यादातर जमीनी पौधे भी यहीं हैं. अप्रैल से सितम्बर के बीच उत्तरी गोलार्ध में गर्मी का मौसम रहता है. सभी पेड़-पौधों को पर्याप्त प्रकाश मिलता है और वे हवा से कार्बन निकाल लेते हैं. अक्टूबर के महीने में उत्तरी गोलार्ध में सर्दी पड़नी शुरू होती है और एक बड़े हिस्से में पेड़-पौधों से पत्ते झड़ जाते हैं. हवाई कार्बन का निस्तार घटने लगता है. इसकी वजह से हवाई कार्बन बढ़ते-बढ़ते मार्च के अन्तिम सप्ताह में सबसे ज्यादा होता है. फिर गर्मी के मौसम में घटने लगता है.
सन् 2016 के जून में यहां भी यह सीमा पार हो गई. अब धरती पर कोई जगह नहीं है जहां हाल के सालों में हवाई कार्बन 400 अंश के ऊपर नहीं पाई गई है.
ऐसा नहीं है कि 400 अंश की सीमा कोई हवाई लक्ष्मण रेखा है कि 399 तक रहे तो हम बच जाएंगे. यह एक तरह का काल्पनिक मील का पत्थर है. विज्ञान की दुनिया हवाई कार्बन की सुरक्षित मात्रा 350 अंश मानती है. जब 19वीं सदी में औद्योगिक क्रान्ति शुरू हो रही थी तब हवाई कार्बन की औसत मात्रा 280 अंश थी.
अब तो इसकी बानगी कुछ यूं बन गयी है कि हर साल तापमान में वृद्धि के कुछ-न-कुछ नए प्रतिमान गढ़ने लगा है. अब तो बिना प्रशान्त महासागर की खलबली के भी साल-दर-साल पहले से ज्यादा गर्मी रहने लगी है. इस बढ़त का हमारे विकास से हवाई कार्बन के निकास के अलावा कोई दूसरा कारण पता नहीं चला है.
अगर हमने हवाई कार्बन का निस्तार नहीं रोका तो क्या होगा?
सभी प्रमाण यह बताते हैं कि हम एक नई दुनिया में आ चुके हैं, एक ऐसी दुनिया जिसकी परिस्थिति हमारे लिए अनजान है. यह नई दुनिया कैसे करवट लेगी यह ठीक से कोई बता नहीं सकता, कोई पूर्वानुमान नहीं लगा सकता. जैसे-जैसे ये बदलाव सामने आते जा रहे हैं, वैसे-वैसे कुछ बातें साफ हो रही हैं. इसका प्रभाव हर क्षेत्र, हर विधा, हर हिस्से में होगा – क्या होगा, कितना होगा, यह समय ही बतलाएगा. अब तक यही समझ में आया है कि जलवायु परिवर्तन की गति और लक्षण कुछ साल पहले के अनुमानों से कहीं ज्यादा गम्भीर है.
गर्मी की वजह से हिमनद पिघलेंगे, समुद्र का स्तर बढ़ेगा. पानी का तापमान बढ़ेगा तो उसका फैलाव भी बढ़ेगा. कई छोटे द्वीपों पर बसे देश तो जलमग्न हो जाएंगे. इससे दुनिया भर के तटीय इलाकों में पानी घुसेगा. आबादी का बड़ा हिस्सा तटीय इलाकों में बसा हुआ है, जहां से बड़ी संख्या में लोगों के विस्थापित होने की आशंका है.
उत्तरी ध्रुव में आर्कटिक सागर में बर्फ पानी के भीतर ही है, इसलिए उसके पिघलने से समुद्रीय पानी की मात्रा पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा. किन्तु अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड की बर्फ तो जमीन पर है। इसके पिघलने से सागर में पानी बढ़ेगा. यही नहीं, इतने सारे मीठे पानी के आने से समुद्र के पानी में नमक की मात्रा घटेगी.
जमी हुई परमाफ्रॉस्ट झील की पिघलती हुई बर्फ के नीचे फंसी मीथेन गैस के बुलबुले बाहर निकलते हुए
यह हवाई कार्बन जलवायु को और गर्म करेगा, जिससे इस बर्फीले इलाके में गर्मी और बढ़ेगी, जिससे और कार्बन छूटेगा. इस खतरनाक चक्र से बड़ा विनाश हो सकता है जिसे रोकना असंभव होगा. कोई भी यह विश्वास से नहीं कह सकता कि बर्फ के नीचे से यह जिन्न कब छूट सकता है. अगर यह चक्र शुरू हो गया, तो कितना भी हवाई कार्बन का निस्तार रोका जाए, वह जलवायु में नाटकीय परिवर्तन रोकने में पर्याप्त नहीं होगा। इसके बाद तो सब कुछ सही में राम भरोसे होगा.
(अगली कड़ी में यह बात होगी कि हमारे स्वभाव में ऐसा क्या है जो हमें इस खतरे को टालने के प्रयासों से रोकता है)
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न – डॉ. स्नेहल (पुणे) और डॉ.स्कंद शुक्ल (लखनऊ) द्वारा समीक्षित
(Courtesy: Pratham Education Foundation)
1.कोरोना वायरस क्या है?
कोरोना वायरस, वायरस का एक बड़ा परिवार है जो जानवरों और मनुष्यों में बीमारी का कारण हो सकता है। मनुष्यों में कोरोना वायरस श्वसन संक्रमण पैदा करते हैं जिसमें सामान्य सर्दी से लेकर अधिक गंभीर बीमारियां हो सकती हैं|
2. COVID-19 क्या है?
COVID-19 हाल ही में खोजे गए कोरोना वायरस के कारण होने वाला संक्रामक रोग है। दिसंबर 2019 में चीन के वुहान में फैलने से पहले इस नए वायरस और बीमारी के अस्तित्व के बारे में कोई जानकारी नहीं थी|
3. COVID-19 बीमारी के लक्षण क्या हैं?
बुखार, सूखी खांसी, सांस लेने में तकलीफ़, नाक का बंद होना, बहती नाक और थकावट इसके सबसे आम लक्षण हैं। कुछ रोगियों को शरीर में दर्द, गले में खराश या दस्त भी हो सकते हैं।
4. COVID-19 के लिए किसे परीक्षण करवाना चाहिए?
बुखार, खांसी और सांस लेने में कठिनाई महसूस करने वाले लोगों को तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। यदि आप किसी COVID-19 से संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए हैं, तो भी जांच करवाएं।
5. COVID-19 कैसे फैलता है?
जब COVID-19 से पीड़ित व्यक्ति खाँसे, छींके या मुँह से सांस छोड़े, तो नाक या मुंह से निकली छोटी बूंदों के माध्यम से यह बीमारी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैल सकती है। ये बूंदें व्यक्ति के आस-पास की वस्तुओं और सतहों पर गिरती हैं। अन्य लोग जब इन वस्तुओं या सतहों को छूते हैं, और फिर अपनी आँखों, नाक या मुंह को छूते हैं, तो COVID -19 उनमें फैल सकता है। COVID -19 तब भी फैल सकता है अगर COVID-19 से पीड़ित व्यक्ति के खाँसने या सांस छोड़ने के दौरान निकली बूंदों को लोग श्वास के ज़रिए अंदर ले लें।
6.खुद को कैसे बचाएँ और बीमारी को फैलने से कैसे रोकें?
– हाथ धोना: अपने हाथों को एल्कोहॉल आधारित सैनिटाइज़र या साबुन और पानी से नियमित और अच्छी तरह धोएं। इससे वायरस मर जाता है। – दूरी बनाए रखना: किसी भी खांसते और छींकते व्यक्ति से बीच कम से कम 1 मीटर (~ 3 फीट) की दूरी बनाए रखें। – आंखों, नाक और मुंह को न छुएं। – मुंह और नाक को ढकना: छींकते और खांसते समय अपने मुंह और नाक को ढकें। – घर पर रहें: यदि आप अस्वस्थ महसूस कर रहे हैं तो घर पर रहें। अगर आप ऊपर दिए गए लक्षणों में से किसी भी लक्षण से ग्रस्त हैं, तो इलाज करवाएं| – यात्रा न करें: कोरोनो वायरस संक्रमण को रोकने और उससे बचने का एक तरीका है यात्रा न करना।
7. क्या मुझे अपनी सुरक्षा के लिए मास्क पहनना चाहिए?
अगर आप COVID-19 के लक्षणों से पीड़ित हैं या COVID-19 से पीड़ित किसी व्यक्ति की देखभाल कर रहे हैं, केवल तभी मास्क पहनें। यदि आप बीमार नहीं हैं या किसी ऐसे व्यक्ति की देखभाल नहीं कर रहे हैं जो बीमार है, तो आप व्यर्थ में मास्क पहन रहे हैं। मास्क की कमी है और इसका इस्तेमाल समझदारी से किया जाना चाहिए।
8. क्या COVID-19 के लिए कोई टीका, दवा या उपचार है?
अभी तक नहीं। अभी तक कोई वैक्सीन या एंटीवायरल दवा नहीं है जो COVID -19 का इलाज या उसकी रोकथाम करे। संभावित दवाओं का परीक्षण चल रहा है।
9. क्या इंसान पशु स्रोतों से COVID -19 से संक्रमित हो सकता है?
कोरोना वायरस, वायरस का एक बड़ा परिवार है जो आमतौर से जानवरों में पाया जाता है। कभी-कभी लोग इन वायरस से संक्रमित हो जाते हैं जो बाद में अन्य लोगों में फैल सकते हैं। उदाहरण के लिए, *SARS-CoV सिवेट कैट से आया था और *MERS-CoV ड्रोमेडरी ऊंटों द्वारा प्रसारित किया जाता है। COVID-19 के संभावित पशु स्रोतों की अभी तक पहचान या पुष्टि नहीं हुई है।
खुद को बचाने के लिए, जैसे कि जब आप जीवित पशुओं के बाज़ार में जाएं, जानवरों से सीधे संपर्क या जानवरों से जुड़ी सतहों से सीधे संपर्क से बचें। हर समय खाद्य सुरक्षा के सही तरीके अपनाएं। बिना पके हुए खाद्य पदार्थों को दूषित होने से बचाने के लिए कच्चे मांस, दूध या पशु अंगों को सावधानी से रखें और कच्चे या अधपके पशु उत्पादों का सेवन न करें।
*MERS-CoV- मिडिल ईस्ट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (MERS) – यह एक वायरल श्वसन बीमारी है जिसे पहली बार 2012 में सऊदी अरब में पहचाना गया था।
*SARS-CoV- सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम – सार्स कोरोना वायरस (SARS-CoV) – इस वायरस की पहचान 2003 में हुई थी। SARS-CoV जानवर का वायरस माना जाता है और इसने 2002 में पहली बार दक्षिणी चीन के गुआंगडोंग प्रांत में इंसान को संक्रमित किया था।
10. सतहों पर वायरस कितने समय तक जीवित रहता है?
यह निश्चित नहीं है कि COVID-19 पैदा करने वाला वायरस सतहों पर कितनी देर तक जीवित रहता है| अध्ययन बताते हैं कि कोरोना वायरस कुछ घंटों तक या कई दिनों तक सतहों पर जिन्दा रह सकते हैं। यह अवधि अलग-अलग स्थितियों में बदल सकती है (उदाहरण के लिए सतह का प्रकार, वातावरण का तापमान या आर्द्रता)। यदि आपको लगता है कि कोई सतह संक्रमित हो सकती है, तो वायरस को मारने के लिए साधारण कीटाणुनाशक से सफाई करें और अपनी व दूसरों की रक्षा करें। अपने हाथों को एल्कोहॉल-आधारित सैनिटाइज़र से साफ करें या साबुन और पानी से धोएं। अपनी आंखों, मुंह या नाक को न छुएँ।
11. क्या COVID-19 वृद्ध लोगों पर ही असर करता है, या कम उम्र के लोग भी इसके शिकार हो सकते हैं?
नए कोरोनो वायरस (2019-nCoV) से सभी उम्र के लोग संक्रमित हो सकते हैं। अधिक उम्र के लोग, और पहले से मौजूद बीमारियों से पीड़ित लोग (जैसे अस्थमा, मधुमेह, हृदय रोग) इस वायरस से गंभीर रूप से बीमार हो सकते हैं।
12. क्या शराब का सेवन COVID-19 से बचाता है?
नहीं। अभी तक ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है जो इस बात का समर्थन करता हो कि शराब पीने से COVID -19 संक्रमण से बचा जा सकता है। 70% या अधिक एल्कोहल वाले सैनिटाइज़र वायरस को हटाने में मदद करते हैं। पेय पदार्थों में एल्कोहल की मात्रा 8-40% होती है और मदद करने के बजाय इनसे व्यक्ति की प्रतिरक्षा शक्ति कम हो जाती है। तो यह एक गलत धारणा है कि शराब का सेवन COVID-19 को रोक सकता है।
13. अगर मैं COVID -19 कोरोनावायरस से संक्रमित हो जाता हूं तो क्या मैं मर जाऊँगा?
युवा वयस्कों में COVID-19 के लक्षण आमतौर पर कम गंभीर होते हैं। हालांकि, COVID-19 गंभीर बीमारी का कारण बन सकता है: हर 5 में से 1 संक्रमित व्यक्ति को अस्पताल में देखभाल की आवश्यकता होती है। वे वृद्ध लोग जिनकी उम्र के साथ प्रतिरक्षा शक्ति कमजोर हो गई है, और वे लोग जिन्हें पहले से कोई स्वास्थ्य समस्या है, उनमें युवाओं की तुलना में संक्रमण होने की संभावना अधिक होती है। इसलिए लोगों का यह चिंता करना स्वाभाविक है कि COVID-19 महामारी उन्हें और उनके प्रियजनों को कैसे प्रभावित करेगी। COVID-19 मुख्य रूप से संक्रमित व्यक्ति के खाँसने या छींकने से निकली बूंदों के माध्यम से फैलता है, और यह वायरस से दूषित सतहों के माध्यम से भी फ़ैल सकता है। इसलिए सामाजिक दूरी और व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखना COVID-19 को रोकने का एकमात्र उपाय है।
14. क्या माँस खाने से COVID-19 फैलता है?
इस बात का कोई सबूत नहीं है कि माँस खाने से वायरस फैलता है। दरअसल, कोरोना वायरस, वायरस का एक बड़ा परिवार है जो आमतौर से जानवरों में मौजूद होता है। कभी-कभी जानवरों के संपर्क में आने के बाद इंसान इन वायरस से संक्रमित हो जाते हैं जो बाद में अन्य लोगों में फैल सकता है। COVID-19 के संभावित पशु स्रोतों की अभी तक पुष्टि नहीं हुई है।
अपने बचाव के लिए, – जीवित पशुओं के बाज़ार में जाने पर जानवरों से और जानवरों के संपर्क में आई सतहों से सीधे संपर्क से बचें। – हर समय सही खाद्य सुरक्षा नियमों का पालन करें। बिना पके हुए खाद्य पदार्थों को दूषित होने से बचाने के लिए – कच्चे माँस, दूध या जानवरों के अंगों का सावधानीपूर्वक उपयोग करें । – कच्चे या अधपके पशु उत्पादों के सेवन से बचें।
15. COVID-19 से संक्रमित होने पर लक्षणों को दिखने में कितने दिन लग सकते हैं?
वायरस से संक्रमित होने और बीमारी के कुछ लक्षण दिखने के बीच के समय को ‘ऊष्मायन अवधि’ (इन्क्यूबेशन पीरियड) कहा जाता है। COVID-19 की ‘ऊष्मायन अवधि’ (इन्क्यूबेशन पीरियड) के बारे में अधिकांश अनुमान बताते हैं कि इस बीमारी के लक्षण 1-14 दिनों में, और आमतौर पर लगभग पाँच दिनों में दिखते हैं।
16. क्या लहसुन, अदरक, काली मिर्च या विटामिन युक्त खाद्य पदार्थ खाने से हम इस संक्रमण से बच सकते हैं?
नहीं। अब तक ऐसा कोई सबूत नहीं है जो इस बात का समर्थन करता है कि इन चीजों को खाने से COVID-19 से बचा जा सकता है या वायरस को मारा जा सकता है| हालांकि ये चीज़ें हमारे स्वास्थ्य के लिए फ़ायदेमंद हैं।
17. यदि कोई COVID-19 से संक्रमित है, तो उसके ठीक होने की क्या संभावनाएँ हैं?
कई लोगों को कोरोनावायरस पॉजिटिव पाया गया है और जब उनकी स्थिति नियंत्रण में आ गई और बीमारी के कोई लक्षण नहीं दिखे, तो उन्हें छुट्टी दे दी गई। यह इस पर निर्भर करता है कि आप कितने बीमार हैं। कम गंभीर संक्रमण वाले लोग एक से दो सप्ताह में ठीक हो जाते हैं। लेकिन ऐसा पक्के तौर पर नहीं कह सकते हैं कि संक्रमित हो जाने पर ये अनुमान सही साबित होंगे। इसलिए एहतियात बरतना इलाज से बेहतर है। युवाओं की तुलना में बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों की मृत्यु दर अधिक है|
गंभीर मामलों में पूरी तरह से ठीक होने में छह सप्ताह या उससे अधिक का समय लग सकता है। सबसे हालिया अनुमानों के अनुसार, संक्रमित व्यक्तियों में से लगभग 3% से 5% संक्रमित लोगों की मृत्यु हो जाएगी|
18. COVID-19 को रोकने में अलग रहना/ सामाजिक दूरी कैसे मदद कर सकती है?
COVID-19 वायरस मुख्य रूप से तब फैलता है जब एक व्यक्ति किसी संक्रमित व्यक्ति के खांसने या छींकने पर उत्पन्न होने वाली बूंदों को सांस के ज़रिए अंदर लेता है। इसके अलावा, कोई भी संक्रमित व्यक्ति, जिसमें बीमारी के लक्षण दिख रहे हों या नहीं, किसी सतह को छूकर वायरस फैला सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि कोरोनो वायरस उस सतह पर देर तक ज़िंदा रह सकता है और किसी दूसरे व्यक्ति के उस सतह को छूने और उसके बाद अपने मुंह, नाक या आंखों को छूने से उसके शरीर में वायरस फ़ैल सकता है। इसलिए सार्वजनिक सतहों को छूने से बचने की कोशिश करना या कम से कम उन्हें कीटाणुनाशक से पोछना महत्वपूर्ण है।
सामाजिक दूरी उन उपायों/ कदमों को कहते हैं जो संक्रामक रोग को फैलने से रोकने या उसको धीमा करने के लिए लिए जाते हैं| व्यक्तिगत स्तर पर इसका मतलब है कि हर व्यक्ति अपने और अन्य लोगों के बीच पर्याप्त दूरी (6 फीट या अधिक) बनाए रखे ताकि वह संक्रमित न हो या दूसरों को संक्रमित न करे। स्कूल बंद करना, घर से काम करने का निर्देश देना, पुस्तकालय बंद करना और बैठकों और बड़े समारोहों को रद्द करना सामुदायिक स्तर पर सामाजिक दूरी लागू करने के तरीके हैं।
19. कीटाणुओं को मारने के लिए मिट्टी / राख का उपयोग कितना प्रभावी है?
अपनी खुरदरी बनावट के कारण राख, मिट्टी या रेत हाथ से गंदगी हटाने में उपयोगी हो सकते हैं। लकड़ी की राख में पोटैशियम कार्बोनेट होता है जो इसे क्षारीय बनाता है। हाथों को धोने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाली मिट्टी में भी कैल्शियम कार्बोनेट मौजूद होता है। लेकिन मिट्टी और राख में बहुत सारे कीटाणु (बैक्टीरिया और वायरस) होते हैं और उनमें कुछ रसायन भी होते हैं। मिट्टी की गुणवत्ता विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में अलग-अलग होती है। इसलिए हाथ धोते वक़्त कीटाणुओं (विशेष रूप से कोरोना वायरस) को मारने के लिए मिट्टी/राख का उपयोग उचित नहीं है।
20. क्या पालतू जानवर COVID -19 को फैला सकते हैं?
हालांकि हांगकांग में एक कुत्ते के संक्रमित होने का एक मामला सामने आया है, पर उसके बाद आज तक कोई अन्य सबूत नहीं है कि कुत्ता, बिल्ली या कोई पालतू जानवर COVID -19 फैला सकता है। COVID-19 मुख्य रूप से किसी संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने या बोलने पर उत्पन्न होने वाली बूंदों से फैलता है। अपने आप को बचाने के लिए अपने हाथों को बार-बार और अच्छी तरह से साफ करें।
21. नाक, कान, आँख और मुंह के अलावा ऐसे कौन से तरीके हैं जिनसे वायरस हमारे शरीर में प्रवेश कर सकता है?
COVID-19 का वायरस COVID-19 से संक्रमित कुछ रोगियों के मल में मिला है। पर मल के ज़रिए संक्रमण होने का अभी तक कोई प्रमाण नहीं है।
अभी तक हामारे पास इस बात की भी पर्याप्त जानकारी नहीं है कि क्या कोरोनावायरस अनुपचारित सीवेज के माध्यम से भी फैलता है। इसके अलावा स्विमिंग पूल और टब के माध्यम से फैलने का भी कोई सबूत नहीं है। लेकिन इनका उचित रख-रखाव और कीटाणुनाशक का उपयोग किया जाना चाहिए। COVID-19 संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आई हुई कोई भी सतह या फिर उसके आस-पास की कोई भी सतह जहां छोटी बूंदें मौजूद हो सकती हैं, संक्रमण के फैलने की संभावना बढ़ाती है।
22. क्या COVID-19 संक्रमण से एक बार ठीक हुआ व्यक्ति फिर से संक्रमित हो सकता है?
हालांकि फिलहाल हम इसका जवाब नहीं जानते हैं, लेकिन ज्यादातर लोग निश्चित रूप से COVID-19 बीमारी पैदा करने वाले इस कोरोना वायरस के प्रति थोड़े समय तक प्रतिरक्षा विकसित करे लेंगे। लेकिन फिर भी आपको किसी दूसरे तरह का कोरोनो वायरस संक्रमण हो सकता है| या, यह विशेष वायरस उत्परिवर्तित (म्यूटेट) कर सकता है यानी आनुवंशिक तौर पर बदल सकता है, जैसे कि हर साल इन्फ्लूएंजा वायरस करता है। अक्सर ये उत्परिवर्तन वायरस को पर्याप्त रूप से इतना तो बदल ही देते हैं कि आप वायरस के शिकार हो जाएं, क्योंकि आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली को लगता है कि यह नया संक्रमण है जिसे उसने पहले कभी नहीं देखा है। इसलिए, एक स्वस्थ जीवन शैली अपनाकर अपनी प्रतिरक्षा शक्ति बढ़ाने के बारे में सोचें।
मानवता इस समय एक वैश्विक संकट से जूझ रही है. शायद हमारी पीढ़ी का यह सबसे बड़ा संकट है. अगले कुछ सप्ताहों में आम लोग और सरकारें जिस तरह की निर्णय लेंगी वह शायद यह तय करेगा कि आने वाले वर्षों में दुनिया की तक़दीर कैसी होगी. ये न केवल हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था को नया आकार देगा बल्कि हमारी अर्थव्यवस्था, राजनीति और संस्कृति को भी नए तरह से गढ़ेगा. हमारे लिए शीघ्रता से और निर्णायक रूप से क़दम उठाना बहुत ज़रूरी है. हमें अपने निर्णयों के दीर्घकालिक परिणाम को ध्यान में रखना होगा. जब हम विकल्पों का चुनाव करें तो ख़ुद से सिर्फ़ यही न पूछें कि इस ख़तरे से कैसे निपटा जाए बल्कि यह भी कि इस आपदा के गुज़र जाने के बाद हम किस तरह की दुनिया में रह रहे होंगे. हां, यह तूफ़ान भी एक दिन थमेगा, मानवता बची रहेगी, हम में से अधिकांश अगले दिन के सूरज को देखने के लिए बचे रहेंगे– लेकिन यह दुनिया बदल गई होगी.
कई तात्कालिक आपातकालीन क़दम जीवन का अहम हिस्सा बन जाएंगे. लेकिन आफ़त होती ही ऐसी है. वह ऐतिहासिक प्रक्रिया को बहुत तेज़ी से आगे बढ़ा देती है. सामान्य दिनों में जिस निर्णय को लेने में वर्षों लग जाते हैं उसे घंटों में ले लिया जाता है. कई बार ऐसी तकनीकों का सहारा लिया जाता है जो उपयुक्त नहीं होते हैं या यहां तक कि ख़तरनाक भी होते हैं क्योंकि कुछ नहीं करने का जोखिम बहुत बड़ा होता है. बड़े पैमाने पर होने वाले सामाजिक प्रयोगों का पूरा देश गिनी पिग की तरह निशाना बन जाता है. जब सारे लोग घर से काम करते हैं और एक-दूसरे से दूरी रखते हुए संवाद करते हैं तो क्या होता है? क्या होता है जब सारे स्कूल और विश्वविद्यालय ऑनलाइन हो जाते हैं? सामान्य समय में, सरकारें, व्यवसाय और शैक्षिक बोर्ड्ज़ इस तरह के प्रयोगों के लिए सहमत नहीं होंगे. लेकिन यह सामान्य समय भी तो नहीं है.
संकट के इस समय में, हमारे पास विशेष रूप से दो महत्वपूर्ण विकल्प हैं. पहला है अधिनायकवादी निगरानी और नागरिक सशक्तिकरण के बीच एक का चुनाव. दूसरा है राष्ट्रवादी अलगाव और वैश्विक एकता के बीच किसी एक का चुनाव.
निकट निगरानी महामारी को रोकने के लिए संपूर्ण जनसंख्या को कुछ दिशानिर्देशों का पालन करने की ज़रूरत है. ऐसा मुख्यतः दो तरीक़े से किया जा सकता है. एक तरीक़ा है कि सरकार लोगों की निगरानी करे और उन लोगों को सज़ा दे जो नियम को तोड़ते हैं. आज, मानव इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि तकनीक की वजह से सभी लोगों पर एक साथ हर समय निगरानी संभव है. पचास साल पहले, केजीबी अपने 24 करोड़ लोगों की 24 घंटे निगरानी नहीं कर पाता था और न ही केजीबी की यह क्षमता थी कि वह प्राप्त की गई सभी सूचनाओं को एक साथ प्रभावी रूप से संभाल सके. केजीबी को मानव एजेंटों और विश्लेषकों पर निर्भर रहना पड़ता था और उसके लिए यह संभव नहीं था कि वह वह हर नागरिक की निगरानी के लिए एक व्यक्ति की नियुक्ति कर दे. पर अब सरकारें हाड़-मांस के बने किसी जासूस की अपेक्षा अचूक सेंसरों और शक्तिशाली गणनाओं पर भरोसा कर सकती हैं.
कोरोना वायरस महामारी के ख़िलाफ़ अपनी लड़ाई में कई सरकारों ने निगरानी व्यवस्था को मोर्चे पर लगा दिया है. चीन इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है. लोगों के स्मार्टफ़ोनों, चेहरा पहचानने वाले हज़ारों-लाखों कैमरों, और अपने शरीर का तापमान रिकॉर्ड करने और अपनी मेडिकल जांच की अनुमति देने की सहज इच्छा रखने वाली जनता के बल पर चीनी अधिकारियों ने न केवल शीघ्रता से यह पता कर लिया कि कौन व्यक्ति कोरोना वायरस का संदिग्ध वाहक है बल्कि वह उन पर नज़र भी रख रहे थे कि वे किस-किस के संपर्क में आते हैं. कई सारे ऐसे मोबाइल ऐप्स हैं जो नागरिकों को संक्रमित व्यक्ति के आसपास मौजूद होने के बारे में आगाह करते हैं.
इस तरह की तकनीक पूर्वी एशिया तक ही सीमित नहीं है. इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने हाल ही में इस्राइल की सुरक्षा एजेंसी को कोरोना वायरस पर नज़र रखने कि लिए निगरानी तकनीकी के प्रयोग की अनुमति दी जो सामान्यतया आतंकवादियों से लड़ने के लिए प्रयोग में लाया जाता है. जब संबंधित संसदीय उपसमिति ने इसकी अनुमति देने से इनकार कर दिया, नेतन्याहू ने ‘आपातकालीन आदेश’ के तहत इसकी अनुमति दे दी.
आप यह कह सकते हैं कि इन बातों में कुछ भी नया नहीं है. हाल के वर्षों में सरकारें और निगम लोगों की निगरानी, उनकी गतिविधियों पर नज़र रखने और उनको मैनिपुलेट करने के लिए उन्नत तकनीकों का प्रयोग करने लगी हैं. और अगर हम सावधान नहीं रहे, तो यह महामारी निगरानी के इतिहास में एक बहुत बड़ा मोड़ साबित हो सकती है. सिर्फ़ इसलिए नहीं कि अब तक इनकी मदद लेने से इंकार करने वाले देश अब सामान्य रूप से इनका प्रयोग करेंगे बल्कि इसलिए कि पहले जो निगरानी गुपचुप तरीक़े से होता था, अब खुलेआम होगा.
अभी तक तो जब हमारी उंगलियां हमारे स्मार्टफ़ोन की स्क्रीन को छूती थीं और किसी लिंक पर क्लिक करती थीं, तो सरकारें यह जानने का प्रयास करतीं कि हमारी उंगलियां किस तरह की लिंक को क्लिक करती हैं. पर अब कोरोना वायरस के फैलने के बाद, दिलचस्पी का क्षेत्र बदल गया है. अब सरकारें आपकी उंगलियों का तापमान और उसकी चमड़ी के नीचे ब्लड-प्रेसर के बारे में जानना चाहती हैं.
आपातकाल की खिचड़ी निगरानी को लेकर हम कहां खड़े हैं, इस बारे में जब हम कुछ समझने का प्रयास करते हैं तो जो एक समस्या हमारे सामने आती है वह यह है कि हम में से कोई नहीं जानता है कि हमारी निगरानी आख़िरकार कैसे हो रही है और आने वाले वर्षों में इसका स्वरूप क्या होगा. निगरानी तकनीक में बहुत ही तीव्र गति से बदलाव आ रहा है और जिसे हम 10 साल पहले तक वैज्ञानिक कल्पना मान रहे थे, आज पुरानी ख़बर बन गई है. उदाहरण के लिए, एक काल्पनिक सरकार की कल्पना कीजिए जो इस बात की मांग करता है कि उसका हर नागरिक बायोमेट्रिक ब्रैसलेट पहने जो शरीर के तापमान और हृदय गति पर 24 घंटे नज़र रखता है. इससे प्राप्त होने वाले आंकड़े को जमा किया जाता है और सरकार इसका विश्लेषण करती है. और इससे पहले कि आपको पता चले, इस विश्लेषण के तरीक़े से यह पता चलेगा कि आप बीमार हैं और उनको यह पता भी चल पाएगा कि आप कहाँ-कहाँ गए थे और किस-किस से मिले. संक्रमण के चेन को काफ़ी हद तकछोटा किया जा सकेगा और यहां तक कि उसे पूरी तरह काटा जा सकेगा. इस तरह की व्यवस्था निश्चित रूप से महामारी को कुछ ही दिनों में रोक सकती है. है न यह अद्भुत?
अब इसका घाटा यह है कि यह एक बहुत ही ख़ौफ़नाक निगरानी व्यवस्था को वैध बना देगा. उदाहरण के लिए, मैंने सीएनएन लिंक पर क्लिक नहीं करके फ़ॉक्स न्यूज़ के एक लिंक पर क्लिक किया और यह आपको मेरे राजनीति विचारों और शायद यहां तक कि मेरे व्यक्तित्व के बारे में भी आपको बहुत कुछ बता देता है. पर जब मैं इस वीडियो क्लिप को देखता हूं उस दौरान अगर आप हमारे शरीर के तापमान, ब्लड-प्रेसर, और हृदय-गति की निगरानी कर सकते हैं, तो आपको पता चल सकता है कि मैं किस बात पर हंसता हूं, किस बात पर रोता हूं और किस बात पर मैं ग़ुस्सा हो जाता हूं.
यह याद रखना बहुत ही महत्वपूर्ण है कि बुखार और कफ की तरह ही ग़ुस्सा, ख़ुशी, बोरियत और प्यार जीव-वैज्ञानिक बातें हैं. वही तकनीक जो कफ का पता लगाती है, हंसी का भी पता लगाती है. अगर दुनिया की निगमें और सरकारें बड़े पैमाने पर हमारी बायोमेट्रिक डाटा को जमा करने लगती हैं, तो वह हमारे बारे में हमसे ज़्यादा बेहतर जान सकते हैं और इसके बाद वे न केवल हमारी भावनाओं के बारे में भविष्यवाणी कर सकते हैं बल्कि उस भावनाओं को मैनिपुलेट भी कर सकते हैं और वे हमें जो चाहें बेच सकते हैं- भले ही वह कोई उत्पाद हो या कोई राजनेता. बायोमेट्रिक निगरानी केम्ब्रिज एनेलिटिका के डाटा हैकिंग को हज़ारों साल पुराना बना सकता है. ज़रा 2030 में उत्तरी कोरिया की कल्पना कीजिए जब वह अपने सभी नागरिकों को 24 घंटे बायोमेट्रिक ब्रैसलेट पहनने कि लिए बाध्य कर देगा. अगर आप किसी महान नेता का भाषण सुनते हैं और ब्रैसलेट यह बताता है कि भाषण पर आपका ख़ून ग़ुस्से से खौला, तो फिर ख़ैर मनाइए.
आप यह कह सकते हैं कि बायोमेट्रिक निगरानी सिर्फ़ आपातकालिक दौर के लिए है. एक बार जब आपातकालीन स्थिति समाप्त हो जाती है तो इसे समाप्त कर दिया जाएगा. लेकिन अस्थाई क़दम के साथ सबसे ख़तरनाक बात यह है कि यह आपातकाल से भी ज़्यादा ख़तरनाक होता है विशेषकर इस वजह से क्योंकि एक न एक आपातकाल तो हमेशा मंडराता रहता है. उदाहरण के लिए, मेरे देश इस्राइल ने 1948 की आज़ादी की लड़ाई के दौरान आपातकाल घोषित कर दिया और इसमें प्रेस पर प्रतिबंध और ज़मीन की ज़ब्ती से लेकर खिचड़ी बनाने तक के बारे में विशेष नियम बनाए (आप इसे मज़ाक़ मत समझिए) और इन क़दमों को उचित ठहराया. आज़ादी की लड़ाई कब की जीत ली गई पर इजराइल ने आज तक आपातकाल के समाप्त होने की घोषणा नहीं की और और 1948 में उसने जो ‘अस्थाई’ क़दम उठाए थे उनमें से कई को समाप्त करने की घोषणा आज तक नहीं की है (शुक्र है कि खिचड़ी के बारे में आपातकाल की घोषणा को 2011 में समाप्त कर दिया गया).
अगर कोरोना वायरस से होने वाला संक्रमण शून्य तक नीचे आ जाता है तब भी आंकड़ों के भूखे कुछ देश यह दलील देंगे कि उन्हें निगरानी व्यवस्था को कुछ और समय तक बनाए रखना होगा क्योंकि उन्हें डर है कि कोरोना वायरस का दूसरा दौर आ सकता है या इसलिए कि मध्य अफ़्रीका में इबोला की एक नई प्रजाति जन्म ले रही है या… आप जान गए न. हमारी निजता को लेकर हाल के वर्षों में एक बड़ी लड़ाई चल रही है. कोरोना वायरस का संकट इस लड़ाई का चरम बिंदु हो सकता है. क्योंकि जब लोगों को निजता और स्वास्थ्य के बीच कोई एक विकल्प चुनने को कहा जाएगा तो वे सामान्यतया स्वास्थ्य को चुनेंगे.
साबुन-पुलिस लोगों को निजता और स्वास्थ्य के बीच किसी एक को चुनने के लिए कहना, वास्तव में इस समस्या की जड़ है. क्योंकि यह एक मिथ्या विकल्प है. हमें निजता और स्वास्थ्य दोनों की ज़रूरत है. हम अपने स्वास्थ्य की रक्षा का चुनाव कर सकते हैं पर कोरोना वायरस महामारी को निगरानी व्यवस्था को संस्थागत स्वरूप देकर नहीं बल्कि नागरिकों को सशक्त बनाकर रोक सकते हैं. हाल के सप्ताहों में, कोरोना वायरस महामारी को क़ाबू में करने का सबसे सफल प्रयास दक्षिण कोरिया, ताइवान और सिंगापुर ने किया है. इन देशों ने ट्रैकिंग ऐप्लिकेशन का कुछ हद तक प्रयोग किया है पर सबसे ज़्यादा व्यापक जांच और बेहतर-जानकारी रखने वाली और सहयोग करनेवाली जनता पर भरोसा किया है.
केंद्रीकृत निगरानी और कठोर दंड एकमात्र ऐसे उपाय हैं जो लोगों को लाभकारी दिशानिर्देशों को मानने के लिए बाध्य करता है. जब लोगों को वैज्ञानिक तथ्यों से रू-ब-रू कराया जाता है और जब लोगों को पब्लिक अथॉरिटीज़ पर भरोसा होता है और वे उनको इन तथ्यों से अवगत कराएं, तो जनता अमूमन सही काम करती है भले ही उनकी कोई निगरानी नहीं करे. स्व-उत्साहित और पूरी जानकारी रखने वाली जनता अमूमन निगरानी के अधीन और जाहिल जनता से कहीं ज़्यादा शक्तिशाली और प्रभावी होती है.
उदाहरण के लिए, साबुन से अपने हाथों को धोना. मानव स्वच्छता के क्षेत्र में यह सबसे बड़ी बात है. यह सामान्य कार्य लाखों लोगों की ज़िंदगी हर साल बचा सकता है. विज्ञानिकों को साबुन से हाथ धोने के महत्व का पता 19वीं सदी में चला. इससे पहले, यहां तक कि डॉक्टर और नर्स भी एक ऑपरेशन करने के बाद बिना हाथ धोए दूसरे ऑपरेशन के लिए चले जाते थे. आज अरबों लोग अगर हर दिन अपना हाथ धोते हैं तो इसलिए नहीं कि साबुन-पुलिस का उन्हें डर है बल्कि इसलिए क्योंकि वे हक़ीक़त जानते हैं. मैं साबुन से हाथ धोता हूं क्योंकि मैंने वायरस और जीवाणुओं के बारे में सुन रखा है, मैं समझता हूं कि इन सूक्ष्म जीवाणुओं के कारण बीमारियां फैलती हैं और मैं जानता हूं कि साबुन से हाथ धोकर मैं इनसे बच सकता हूं.
पर इस तरह का परिणाम और सहयोग हासिल करने के लिए आपको विश्वास की ज़रूरत होती है. यह ज़रूरी है कि लोग विज्ञान में विश्वास करें, पब्लिक अथॉरिटीज़ में विश्वास करें और मीडिया में विश्वास करें. पिछले कुछ सालों से, ग़ैरज़िम्मेदार राजनीतिकों ने विज्ञान, पब्लिक अथॉरिटीज़ और मीडिया में लोगों के विश्वास की जानबूझकर अनदेखी की है. अब वही ग़ैरज़िम्मेदार राजनीतिक अधिनायकवाद का रास्ता यह कहते हुए अपना सकते हैं कि आप जनता से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह कोई ठीक काम करेगी.
इस विश्वास को पिछले कई सालों में तोड़ा गया है और इसे तत्काल बहाल नहीं किया जा सकता. पर यह सामान्य समय नहीं है. संकट के समय में, दिमाग़ को भी बदलते देर नहीं लगती. आपका अपने भाई-बहन से सालों से मतांतर हो सकता है पर जब कोई आपात स्थिति आती है तो आप तुरंत अपने अंदर एक-दूसरे के लिए प्यार और विश्वास के सोते को उमरता पाते हैं. निगरानी की व्यवस्था के बदले, विज्ञान, पब्लिक अथॉरिटीज़ और मीडिया में आम लोगों के विश्वास को दुबारा क़ायम करने के प्रयास के लिए अब भी समय चूका नहीं है. हम नई तकनीक का बेशक प्रयोग करें, पर ये तकनीक जनता को सशक्त करे. मैं शरीर के तापमान और ब्लड प्रेसर पर नज़र रखने के पक्ष में हूं, पर इस डाटा का प्रयोग एक शक्तिशाली सरकार बनाने में नहीं होना चाहिए. बल्कि चाहिए कि यह डाटा मुझे एक बेहतर विकल्प के चुनाव में मदद करे और सरकार को उसके निर्णयों के लिए ज़िम्मेदार ठहराए.
अगर मैं 24 घंटे अपने मेडिकल स्थिति की निगरानी कर सकता हूं, तो मैं यह जान पाऊंगा कि मैं न केवल लोगों के स्वास्थ्य के लिए ख़तरा बन गया हूं बल्कि यह भी कि कौन सी बात मेरी सेहत कि लिए अच्छी है. और अगर मैं कोरोना वायरस के बारे में भरोसेमंद आंकड़े का विश्लेषण कर पाता हूं, तो मैं यह जान पाऊंगा कि सरकार मुझे सही कह रही है या नहीं और वह इस महामारी से लड़ने के लिए सही नीति अपना रही है कि नहीं. जब भी जनता निगरानी के मुतल्लिक आवाज़ उठाती है, तो याद रखें कि यह निगरानी की वही तकनीक है जिसका सरकारें न केवल किसी व्यक्ति की निगरानी के लिए करती है बल्कि लोग भी सरकार की निगरानी के लिए इसका प्रयोग करते हैं.
इस तरह, कोरोना वायरस महामारी नागरिकता की वास्तविक परीक्षा है. आने वाले दिनों में, हमें षड्यंत्र के निराधार सिद्धांतों और अपना हित देखने वाले राजनीतिकों और वैज्ञानिक आंकड़ों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों में से किसी एक का चुनाव करना है. अगर हम सही विकल्प चुनने में विफल रहते हैं तो हम अपनी बहुमूल्य स्वतंत्रता को यह सोचते हुए गिरवी रख देंगे कि अपने स्वास्थ्य को बचाने का केवल यही तरीक़ा है.
हमें चाहिए एक वैश्विक योजना दूसरा विकल्प जिस पर हमें विचार करना है वह है राष्ट्रवादी अलगाव और वैश्विक एकता में से एक को चुनने की. ख़ुद महामारी और इससे अर्थव्यवस्था को होने वाला नुक़सान वैश्विक समस्या है. सिर्फ़ वैश्विक सहयोग से ही इसका प्रभावी हल हो सकता है.
सबसे पहले, वायरस को परास्त करने के लिए हमें वैश्विक स्तर पर सूचना को साझा करना चाहिए. मानव को वायरस पर यह बहुत बड़ी बढ़त हासिल है. चीन में और अमेरिका में संक्रमण फैलाने वाले कोरोना वायरस आपस में बात करके मानव में संक्रमण फैलाने के तरीक़ों पर ग़ौर नहीं कर सकते. लेकिन चीन कोरोना वायरस से लड़ने के बारे में अमरीका को बहुमूल्य सलाह दे सकता है. इटली के किसी डॉक्टर को सुबह-सुबह मिलान में जो जानकारी मिलती है वह शाम को तेहरान में किसी की जान बचा सकता है. जब यूके की सरकार इस बारे में हिचक रही है कि वह कौन सी नीति अपनाए, उसे कोरिया से इस बारे में सलाह मिल सकती है जो ख़ुद उस स्थिति से एक महीने पहले गुज़र चुका है. लेकिन ऐसा हो इसके लिए हमें वैश्विक सहयोग और विश्वास की ज़रूरत है.
आने वाले दिनों में, हम में से प्रत्येक को वैज्ञानिक डाटा और स्वास्थ्य विशेषज्ञों में भरोसा करना चाहिए न कि अपना हित साधने वाले नेताओं के षड्यंत्र के बेतुकी सिद्धांतों में.
विभिन्न देशों को सूचनाएं खुलेआम साझा करनी चाहिए और दूसरों से विनम्रता से सलाह लेनी चाहिए और प्राप्त होने वाले डाटा और तथ्यों पर विश्वास करना चाहिए. हमें मेडिकल उपकरणों विशेषकर जांच किट और सांस की मशीनों के उत्पादन और वितरण में वैश्विक स्तर पर प्रयास करने की ज़रूरत है. हर देश इस बात को स्थानीय रूप से करे और जो भी उपकरण उसके हाथ लगे उसे वह अपने पास ही जमा कर ले इसकी बजाय वैश्विक स्तर पर आपसी सहयोग से इसका उत्पादन बढ़ाया जा सकता है और जीवन-रक्षक इन उपकरणों को सब तक न्यायोचित तरीक़े से पहुंचा सकता है. जैसे कोई देश युद्ध के समय में अपने प्रमुख उद्योगों का राष्ट्रीयकरण करता है, कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ मानव की लड़ाई के लिए ज़रूरी है कि हम उत्पादन का “मानवीकरण” करें. ऐसे धनी देशों को जहाँ सिर्फ़ कुछ ही कोरोना वायरस के मामले हुए हैं को चाहिए कि वह उन देशों को जहां ये मामले अधिक हुए हैं यह सोचते हुए अपने बहुमूल्य उपकरण देकि जब उसको ज़रूरत होगी तो दूसरे देश उसकी मदद को आगे आयेंगे.
हम मेडिकल कर्मियों के सामूहिक प्रयोग का प्रयास भी इसी तरह कर सकते हैं. इस समय जो देश कम प्रभावित हैं उन्हें अपने मेडिकल स्टाफ़ को ज़्यादा प्रभावित क्षेत्रों में भेजना चाहिए ताकि वे उनकी मदद कर सकें और बहुमूल्य अनुभव प्राप्त कर सकें. अगर बाद में महामारी को लेकर फ़ोकस में बदलाव आता है, तो उन देशों से वापसी में मदद मिल सकती है.
आर्थिक मोर्चे पर भी वैश्विक सहयोग की ज़रूरत है. अर्थव्यवस्था और आपूर्ति चेन की वैश्विक प्रकृति को देखते हुए, अगर हर सरकार अपना-अपना काम ख़ुद ही करती है और इस प्रक्रिया में दूसरे का ख़याल नहीं रखती है तो इसका परिणाम बहुत ही अराजक होगा और संकट और गंभीर हो जाएगा. हमें वैश्विक कार्य योजना की ज़रूरत है और हमें यह बहुत जल्दी करना होगा.
एक अन्य ज़रूरत है यात्रा पर वैश्विक सहमति की. सभी अंतर्रराष्ट्रीय यात्रा पर महीनों तक प्रतिबंध लगाना मुश्किलों को बढ़ाएगा और कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ लड़ाई में रुकावट डालेगा. दुनिया के देशों को चाहिए कि वे कम से कम न्यूनतम और आवश्यक यात्रा की अनुमति दें और वैज्ञानिकों, डॉक्टरों, पत्रकारों, राजनीतिकों और व्यवसायियों को सीमा को पार करने की इजाज़त दें. यात्रियों की उनके देश में यात्रा से पहले जांच की जाए इसे वैश्विक समझौते से संभव बनाया जा सकता है. जब आप जानते हैं कि विमान में सिर्फ़ ठीक तरह से जांच किए गए यात्रियों को ही जाने की अनुमति दी गई है, आप ऐसे यात्रियों को अपने देश में स्वागत करने के लिए तैयार होंगे.
दुर्भाग्य से, इस समय कोई देश ऐसा कुछ भी नहीं कर रहा है. अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय को सामूहिक लकवा मार गया है. ऐसा लगता है कि कोई विचारशील व्यक्ति दुनिया में नहीं बचा है. कुछ सप्ताह पहले ही दुनिया के नेताओं की आपात बैठक की उम्मीद की जा रही थी ताकि कार्रवाई की एक सामूहिक योजना बनाई जा सके. जी-7 नेताओं ने वीडीयो कनफ़्रेंस के माध्यम से बात तो की पर यह इसी सप्ताह हुई है और इसमें भी किसी तरह की कोई योजना नहीं बनी.
इससे पहले जो वैश्विक संकट हुए हैं– जैसे कि 2008 का वित्तीय संकट और 2014 का इबोला महामारी -अमरीका ने वैश्विक नेतृत्व दिया. पर वर्तमान अमरीकी प्रशासन ने अपनी नेतृत्व क्षमता से हाथ धो लिया है. उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि उसको सिर्फ़ अमरीका की महानता से मतलब है न कि मानवता की चिंता से.
इस प्रशासन ने तो अपने निकटतम सहयोगियों के दामन से भी हाथ छुड़ा लिया है. जब उसने ईयू से आने वाले सभी उड़ानों पर प्रतिबंध लगा दिया तो इस बारे में उसने ईयू को किसी तरह की अग्रिम जानकारी भी देना उचित नहीं समझा और ईयू से इस बड़े क़दम से चर्चा की बात छोड़िए. उसने जर्मनी की एक दवा कंपनी को कोविड-19 के वैक्सीन का अधिकार प्राप्त करने के लिए $1 अरब की राशि देने का शर्मनाक प्रस्ताव दिया. अगर वर्तमान प्रशासन अपना रास्ता बदलता भी है और कोई वैश्विक कार्य योजना बनाता है, तो भी इस बात की उम्मीद कम है कि कोई भी ऐसे नेता की बात मानेगा जो किसी भी तरह की ज़िम्मेदारी लेने से बचता है, जो अपने ग़लती स्वीकार नहीं करता है और जो नियमित रूप से सारा श्रेय ख़ुद लूट लेता है जबकि दोष दूसरों के हिस्से में छोड़ देता है.
अगर अमरीका ने जो जगह ख़ाली की है उसे कोई देश नहीं भरता है तो न केवल वर्तमान महामारी को रोकना ज़्यादा मुश्किल होगा बल्कि उसकी यह विरासत अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों को आनेवाले वर्षों में विषाक्त बनाता रहेगा. लेकिन यह भी सही है कि हर संकट एक अवसर लेकर आता है. हमें उम्मीद करनी चाहिए कि वर्तमान महामारी मानवता को यह समझने में मदद करेगी कि वैश्विक समुदाय में फूट होना कहीं बड़ा संकट है.
मानवता को विकल्प चुनना ज़रूरी है. क्या हम फूट के रास्ते पर चलेंगे या हम वैश्विक एकता का राह पकड़ेंगे? अगर हम फूट के रास्ते को चुनते हैं, तो न केवल हम संकट को और बढ़ाएंगे बल्कि हम भविष्य में इससे भी बड़ी विपत्ति को झेलने कि लिए अभिशप्त हो जाएंगे. अगर हम वैश्विक एकता बनाने में सफल रहते हैं तो यह न केवल कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ हमारी जीत होगी बल्कि भविष्य में होने वाले सभी महामारियों और संकटों से भी जो 21वीं सदी में हमारे सिर पर विपत्ति की तरह टूट सकते हैं.
“हिंदी का मिजाज कुछ इस तरह बना कि उसने अपनी ही बोलियों को गवारुपन का, पिछड़ेपन का, प्रतीक मान लिया. आज भी आप आस-पास निकल जाएं- उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान के स्कूलों में, किसी बच्चे से पूछें और अगर वो ब्रज में भी उत्तर देता है तो शिक्षक के चेहरे पर एक शिकन आ जाती है कि ये बच्चा अपने गवारुपन का प्रदर्शन कर रहा है…जो बच्चा इन बोलियों का इस्तेमाल कक्षा में करता है उससे उम्मीद की जाती है कि वह जल्दी से जल्दी इस्तेमाल को छोड़ दे. और शिक्षक तो अपना यह धर्म ही समझता है कि जिस मातृभाषा की पृष्ठभूमि से वह बच्चा आया है, उसका संकेत भी इस कक्षा में न मिलने दे…मातृभाषा शब्द का अर्थ ही बदल गया है- मातृभाषा का मतलब हो गया है ‘मानक हिंदी’ जिसमें शिक्षा ही हमें आगे बढ़ाती है…मसला सिर्फ यही नहीं है कि अंग्रेजी माध्यम स्कूल में हिंदी न सुनाई दे, बल्कि मसला यह भी है कि किसी स्कूल में ब्रज, अवधी, भोजपुरी, मगही, मैथिली, राजस्थानी, बुन्देली, बघेली, हरयाणवी, इनकी ध्वनियाँ ना सुनाई दें, क्योंकि ये ध्वनियाँ हमें याद दिलाती हैं कि हम अभी पूरी तरह आधुनिक या सभ्य नहीं बने.”
(मुझे पुस्तक की भाषा बहुत कठिन और भारी लगी. ऐसा लगा कि यह बौद्धिक, हिंदी भाषा में विद्वान और अकादमिकों के लिए लिखी गई है. पहले अध्याय के कई भाग न समझ पाने के कारण उसे पढ़ते हुए बहुत खीझ महसूस हुई….हालांकि यह मेरी हिंदी की कमजोर पकड़ दर्शाता है, लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि अगर इसे एक सामान्य हिंदी-भाषी इंसान तक पहुंचने के हिसाब से सरल शब्दों में लिखा जाता तो इसका प्रभाव और पहुंच कई गुना ज्यादा हो सकती थी. मैं स्वयं कई हिस्सेअच्छे से नहीं समझ पाया क्योंकि भाषा की कठिनता का बोझ बहुत ज्यादा महसूस हुआ, खासकर पहले अध्याय में. पाठ 2 और 5 इस मामले में कहीं बेहतर थे, शायद इसलिए क्योंकि उसमें प्रत्यक्ष सामाजिक घटनाओं की चर्चा ज्यादा थी. फिर भी, यह बेहद जरूरी और पठनीय पुस्तक है जो कृष्ण कुमार की एक और पुस्तक “राज, समाज और शिक्षा” की तरह हमारे दैनिक जीवन के साधारण पहलुओं और घटनाओं के पीछे छिपे अदृश्य ब्रह्मांड की झलक दिखाती है. इन पुस्तकों को पढ़ने के बाद सामान्य सामान्य और परिचित नहीं रह जाता, और पाठक को कई पर्दों, भ्रमों, जुमलों को पहचानने में मदद मिलती है जिनसे वह पहले अनजान था या समाज द्वारा सम्मोहित किया हुआ था. कुछ अंश प्रस्तुत हैं. एक पुरुष होने के नाते, मुझे इस पोस्ट पर खासतौर से लड़कियों और महिलाओं की प्रतिक्रिया जानने की रुचि है- लेखक की किन बातों को उन्हें खुद अनुभव किया है, किन बातों से वे सहमत-असहमत हैं, इत्यादि. पुरुष पाठकों की प्रतिक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.)
“…पर लड़कियों के लिए चलना कुछ और अर्थों में भी लड़कों के लिए चलने से भिन्न अर्थ पा जाता है. लड़के अपने बचपन में घर से निकलना ही एक उद्देश्य बना लेते हैं. उनके लिए इधर-उधर जाना, एक जगह खड़े होकर किसी चीज या दृश्य को देखना एकदम सामान्य बात होती है. इसके विपरीत लड़की के लिए घर से निकलने का अर्थ किसी पूर्व-निर्दिष्ट जगह पर पहुंचने की शुरुआत होता है. वे रास्ते में किसी चीज या दृश्य को देखने के लिए खड़ी हो जाएं तो उन्हें देख रहे लोगों की दृष्टि उन्हें बता देती है कि रुकना ठीक चीज नहीं है….किशोरवय से ही लड़कियां अपने आने-जाने में लगने वाले समय को लेकर माँ-बाप और अन्य बड़े परिजनों की फिक्र के कारणों की समाज में स्वीकृत व्याख्या अपना चुकी होती हैं. कोई लड़की कितनी ही स्वस्थ्य और मजबूत हो, वह मान चुकी होती है कि उसके शरीर में उसकी सामाजिक असुरक्षा की इबारत अनिवार्यतः दर्ज है. घर से कहीं भी जाना इस संदर्भ में अपने शरीर के साथ हो सकने वाली जघन्य दुर्घटना की चिंता करते हुए ही संभव है. इस चिंता का दैनिकीकरण बच्ची से लेकर लड़की और औरत बनने की सामाजिक प्रक्रिया को ऐसा उपक्रम बना देता है जिसमें आंख, कान और नाक जैसी इंद्रियां अपने सामान्य काम करती नहीं रह सकतीं…”
“कक्षा में शिक्षक के प्रश्नों का उत्तर देती हुई लड़की या परीक्षा की तैयारी करती हुई लड़की हमारी दृष्टि में सिर्फ एक विद्यार्थी रह जाती है. हमारी आंखें उसे सामने पाकर रीति-रिवाजों और विश्वासों के दलदल से घिरी हुई लड़की को देख पाने में असमर्थ हो जाते हैं…स्कूल या कॉलेज और विश्वविद्यालय के संसार में कदम रखती हुई लड़की उस दूसरी लड़की को घर पर नहीं छोड़ आई होती है जो सभ्यता द्वारा निर्धारित निर्भरता और यौन-दृष्टि के चौखटे में सिमटकर जीती है…वे सीख चुकी होती हैं कि शिक्षा के बावजूद वे घर में भाई से अलग और नीचे बनी रहेंगी और स्त्री के रूप में उनका जीवन उसी धुरी पर चलेगा जो सभ्यता ने उनके जन्म से पूर्व, बहुत पूर्व, बना दी थी…इसीलिए उनमें से कई अपनी शिक्षा को खींचते रहने का प्रयास करती हैं, इस विश्वास के तहत कि शादी से पहले जितना पढ़ सकें, पढ़ लें, उसके बाद का भरोसा नहीं. शिक्षा उनके लिए एक प्रकार की जमानत का काम करती है…पढ़ाई करने दी जाए तो इसका यह आशय नहीं होता कि विवाह की तैयारी रुक जाएगी. ..शिक्षा एकाग्रता, बौद्धिक अनुशासन और स्वावलंबी सोच या सपने देखने की मांग करती है, विवाह समर्पण की मानसिक और दैहिक तैयारी के प्रबंधन की मांग करता है…स्कूल में प्राप्त और विकसित होने वाला ज्ञान और उससे जुड़े कौशल विवाह की दृष्टि से या तो अनुपयोगी हैं अथवा प्रतिस्पर्धी….इस नजरिए से लड़कियों की शिक्षा के बारे में सोचकर हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई में सफलता हासिल करने वाली लड़कियां अपने मानस को दो हिस्सों में बांटकर बड़ी होती होंगी. एक हिस्से में पढ़ाई और परीक्षाओं से पुष्ट ज्ञान का निवास रहता होगा जो संविधान, लोकतंत्र, मानव-मूल्य और विज्ञान की शब्दावली में व्यक्त होता है, दूसरे हिस्से में घर, पड़ोस, त्योहारों, सिनेमा और टीवी के जरिए होने वाले समाजीकरण से प्राप्त वह ज्ञान रहता होगा जो लड़कियों को बताता है कि संविधान में दर्ज समता और अन्य मानवाधिकार ससुराल की दुनिया पर लागू नहीं होते. वह संविधान का परदेस है..
स्कूल में संस्थाई पोशाक पहनकर अपने डेस्क पर बैठी हुई लड़की को देखकर हमारे मन में उसके शेष दैनिक यथार्थ से कटी हुई तस्वीर बनती है. लड़कियों के स्कूल में कतारबन्द खड़ी छात्राओं को राष्ट्रगान गाते देख हम देश के निर्माण की कल्पना में इस तरह खो जाते हैं मानो संस्कृति और, खासकर, परंपरा की ताकत किसी जादू के जोर से गायब हो गयी हो..
यदि इस सच को लड़कियों की नई शिक्षा की धुरी बनाया जाए तो उसका पहला अर्थात सबसे बड़ा उद्देश्य हर लड़की को ऐसे बौद्धिक और भावनात्मक कौशल देना होगा जो उसे अपने अकेलेपन को पहचानने और उसे स्पष्टतः देखकर उत्पन्न होने वाली घबराहट और आत्मदया पर काबू पाने की क्षमता दे. दूसरा उद्देश्य भविष्य की संभावनाओं पर विश्वास उत्पन्न करना होगा- इस संभावना पर कि एक ऐसे संसार का जन्म संभव है जिसमें लड़कियां सुरक्षित जी सकेंगी और जीवन की पूर्णता का अनुभव कर सकेंगी. आज की दुनिया को देखते हुए यह बात एक आस्था का विषय ही हो सकती है जिसे पल्लवित करना शिक्षा का काम है.”
लखनऊ के जाने-माने चिकित्सक, साहित्यकार और समर्पित विज्ञान प्रसारक डॉ. स्कन्द शुक्ल की यूरिक एसिड और इससे पैदा होने वाले गठिया रोग पर हिंदी में लिखी अत्यंत ज्ञानवर्धक फेसबुक पोस्ट्स आप सब के लिए ई-बुक के रूप में प्रस्तुत है.
आज दोस्त के डेरी फार्म पर गया. मेरे पहुंचने पर तूफानी का जुगाड़ू इलाज चल रहा था और उसे सरसों का तेल पिलाया जा चुका था. 7 गायों में से एक, तूफानी के पेट में बहुत सारी गैस बन चुकी थी जो डकार की सामान्य प्रक्रिया से निकल नहीं रही थी. उसने बताया कि इस स्थिति को bloat कहते हैं. झाग जम जाने से गैस साधारण तरीके से बाहर निकल नहीं पाती है और जमा होते जाती है. अगर स्थिति बनी रहे तो कभी-कभी इससे फेफड़े और हृदय काम करना बंद कर देते हैं और मौत हो जाती है.
उसने तूफानी के बाएं ओर rumen पर छोटी सी सुई डाली थी और छोटी सी सिरिंज से गैस खींचकर बाहर छोड़ रहा था. मेरे पहुंचने के बाद 60ml की बड़ी सिरिंज आई जिससे ज्यादा जल्दी गैस निकली जा सके. सरकारी डॉक्टर को फोन करके बुलाया था पर उसके आने की उम्मीद नहीं लग रही थी और खुद कुछ करना जरूरी था. सिरिंज से बार-बार गैस खींचकर खाली करना पड़ रहा था जिससे कभी कभी सुई बाहर निकल जाए रही थी और फिर से डालनी पड़ रही थी, और देरी भी लग रही थी. उसे ध्यान आया कि उसके पास एक छोटा 12v का पम्प है. वह ड्रोन पर भी काम करता है तो उसकी lipo बैटरी भी थी. बैटरी को पम्प के पाइप से जोड़ा और पाइप हाथ से सुई पर लगाया. पम्प ने गैस खींची और बदबूदार गैस को सूंघने से पक्का हो गया कि जुगाड़ काम कर रहा है.
जुगाड़ की सफलता के बाद उसे पक्का करने के लिए सुई के सिरे पर लगे प्लास्टिक का मुंह काट लिया जिससे वह पम्प के पाइप पर टाइट फिट हो जाए. एक लेवलिंग पाइप लिया जिसपर एक न्यूमैटिक कनेक्टर लगाया ताकि दोनों पाइप जुड़ जाएं. अब हाथ से पाइप को सुई पर लगाए रहने और गैस लीक होने का झंझट खत्म हो गया- बस एक बार सुई घोपो, पम्प चालू करो और गैस बाहर…बीच-बीच में सूंघते रहो कि बदबूदार गैस निकल रही है कि नहीं. जब rumen का फूलना कम हो जाए और पम्प की हवा में से ज्यादा बदबू न आए, तो काम पूरा. 10 मिनट लगे और गाय को राहत मिली. कुछ समय बाद गैस फिर से बनी और rumen फूला, तो एक बार फिर पम्प लगाया. अभी उसने बताया कि तीसरी बार पम्प लगाने की जरूरत नहीं पड़ी और गाय अब ठीक है.
डॉक्टर को दोबारा फोन किया था पर वो नहीं आ पाया और दूसरे डॉक्टर भी उपलब्ध नहीं थे. संभव था कि अगर स्थिति बिगड़ती तो गाय मार जाती और कई लोगों की मरती भी है. हर चीज के लिए हम दूसरों पर निर्भर हो चुके हैं. ऐसे में यह सरल जुगाड़ू पम्प या vet का परंपरागत उपकरण भी किसानों के पास नहीं होता है और डॉक्टर का इंतजार करते-करते जानवर की मौत हो जाती है. दोस्त ने बताया कि डॉक्टर भी आता है तो बड़ी सुई डालता है और गैस खुद निकलती है…सुई शरीर से निकल जाती है तो फिर कहीं और सुई डालता है..ऐसा कई बार करता है और जानवर को कई जगह पंक्चर करता है. शायद जानवर को तकलीफ होती होगी, और बहुत efficient तरीका भी नहीं है. पम्प ऑटोमैटिक हवा को निकाल देता है और बस एक बार सुई डालनी होती है. ऐसा उपकरण हो तो किसान खुद कुछ प्रयास करके जानवर को बचाने की कोशिश तो कर सकता है, वरना इंसानों और जानवरों की जीवन की कोई कीमत तो है नहीं अपने देश में. कृत्रिम गर्भाधान (artificial insemination) करते वक्त भी सफाई नहीं बरती जाती है गाय-भैंस के गर्भ में जाने की और इन्फेक्शन होने की संभावना रहती है.
कुछ महीने पहले डॉक्टर दोस्त की दूसरी गाय को देखने आया था जिसके गर्भवती होने का संदेह था. उसने हाथ डालकर ओझा-तांत्रिक की तरह अंदाजे वाली जांच करके कहा कि गर्भवती नहीं है. बाद में गाय पालने वाले किसी दूसरे आदमी ने कहा कि बिना शक गाय गर्भवती है..गर्भवती नहीं निकली तो मेरी गाय फ्री में ले जाना. गाय 8 महीने की गर्भवती थी और उसने बच्चा भी दिया. डॉक्टरों के इस तरह के ज्ञान और इलाज से शिक्षा व्यवस्था की लचर हालत तो पता चलती ही है, साथ ही लोगों का डॉक्टरों पर से भरोसा उठ जाता है. डॉक्टर के पास भी न तो ऐसा कोई पम्प होता है और न ही endoscopy का उपकरण जिससे वह सीधे गर्भ में देख सके और किसान को भी दिखा सके. उपकरण (और इच्छा/समर्पण) हो तो वह हवा में तीर मारने के बजाय सही, efficient और जल्दी उपचार कर सकेगा. आज भी अमानवीय तरीके से manual scavenging करने वाले लोग गटर में डुबकी लगाकर हाथों से गंदगी साफ कर रहे हैं और उसी में दम घुटकर या डूबकर मर रहे हैं. पर हमारी अत्याधुनिक तकनीक, शोध और विकास का इस्तेमाल अभी भी ये बुनियादी समस्याएं सुलझाने के लिए नहीं किया गया है. इस दोस्त ने बारहवीं के बाद ‘शिक्षा’ के घोटाले में फंसने के बजाय पढ़ाई न करने का निर्णय लिया और खुद से सीखता रहा…बारहवीं में भी कॉमर्स ली थी, पर यह विज्ञान/तकनीकी सीखने में बाधा नहीं बना.
पता नहीं विज्ञान के कितने छात्रों को आम जन की ये समस्याएं बतलाई जाती हैं, या उनके प्रोफेसरों को भी पता हैं या नहीं, या सिर्फ परीक्षा-नौकरी की दौड़ हो रही है…? अरविंद गुप्ता की वेबसाइट पर Oxfam की पंक्तियां हैं:
And somewhere there are engineers, Helping others fly faster than sound. But, where are the engineers Helping those who must live on the ground?
ब्लैक होल की पहली तस्वीर ऐतिहासिक और शानदार उपलब्धि है. ऊपर आकाश और अंतरिक्ष की गहराइयों को खोजना इंसान के लिए हमेशा से एक आध्यात्मिक और बौद्धिक सफर रहा है. पर ऐसे में हमारे वैज्ञानिक ज्ञान और समाज की दिशा एक बेहद विरोधाभासी तस्वीर भी प्रस्तुत करती है.
आज हम करोड़ों प्रकाश वर्ष दूर के ब्लैक होल, लाखों किलोमीटर दूर के चंद्रमा, करोड़ों किलोमीटर दूर के ग्रहों इत्यादि के बारे में बहुत कुछ जान चुके हैं. लेकिन हम अपनी पृथ्वी के समुद्रों के बारे में बहुत कम जानते हैं. हम चाँद पर कदम रखकर मंगल की ओर बढ़ रहें हैं और दूसरे ग्रहों के गर्भ में मौजूद पदार्थों के बारे में जान रहे हैं, लेकिन अपने प्राणदायी समुद्रों की गहराइयों, समुद्र-वायुमंडल-जमीन के अन्तर्सम्बन्ध, सूक्ष्मजीवों-पेड़ पौधों-जंतुओं के अन्तर्सम्बन्ध इत्यादि की समझ से कोसों दूर हैं. अभी कुछ साल पहले ही हमें पता चलना शुरू हुआ है कि पेड़ आपस में जड़ों के जाल द्वारा कैसे बात करते हैं. 1971 में अपोलो 14 के एस्ट्रोनॉट ने लाखों किलोमीटर दूर चाँद पर जाकर गोल्फ तो खेल लिया, लेकिन आज भी हम पृथ्वी के प्राकृतिक तंत्रों की नाजुक जटिलता के बारे में अनजान हैं.
जहां एक ओर हमें इस समझ का अभाव है, वहीं हमारी बढ़ती जरूरतों और अश्लील विलासिता व लालच के चलते हमने समुद्र में कई किलोमीटर नीचे मछली पकड़ने की भीमकाय मशीनें बनाई हैं जो एक-एक मछली को पकड़ने की क्षमता रखती हैं- इस बेहिसाब शिकार ने समुद्री जीवन को ध्वस्त कर अन्य जीवों के लिए खाने की कमी पैदा कर दी है…हमारा प्लास्टिक और पॉलिथीन सबसे दुर्गम द्वीपों में पहुंच चुका है और समुद्रों में विशाल डंपयार्ड के रूप में तैर रहा है…हम हर सेकंड कई एकड़ जंगलों को काटकर अपने शैम्पू-साबुन-बिस्किट-नमकीन इत्यादि के लिए पाम ऑयल की खेती कर रहे हैं…पैदा होता हर नया बच्चा अपने परिवार के लिए खुशियां तो लाता है, लेकिन साथ ही अन्य जीवों और प्रकृति के लिए एक और भक्षक के रूप में भी जीवन शुरू करता है. आज पृथ्वी पर मौजूद सभी स्तनपायी जीवों के वजन का 96% हिस्सा हम इंसान और हमारे पालतू जानवर हैं- बाकी जंगली स्तनपायी सिर्फ 4% प्रतिशत हैं. पृथ्वी पर मौजूद पक्षियों में से 70% आबादी सिर्फ इंसानों के पालतू पक्षियों की है, जिनमें से अधिकतर प्रताड़ना सहती मुर्गियां हैं. प्राकृतिक जगत में हर दिन गुमनामी में होता यह खौफनाक विनाश पृथ्वी के 4.5 अरब साल के इतिहास में जीवों के विलुप्ति की छठी व्यापक घटना है.
ब्लैक होल के अध्ययन के महानायक स्टीफन हॉकिंग ने जाते-जाते कहा था कि पृथ्वी के विनाश की गति देखते हुए इंसानों के पास सिर्फ 100 साल और हैं- या तो दूसरा ग्रह ढूंढ लो या खत्म होने के लिए तैयार रहो…क्योंकि आबादी, विकास और लालच की इस दौड़ के थमने या बदलने के आसार शायद नहीं दिख रहे हैं. अगर विज्ञान और तकनीकी का अत्याधुनिक विकास सबसे प्रबुद्ध वैज्ञानिक को हताशा में यह कहने के लिए मजबूर कर दे, तो M87 गैलेक्सी के ब्लैक होल की तस्वीर हमारे लिए अपने धुंधले नीले ग्रह और इसमें रहने वाले साथी जानवरों-पक्षियों-कीड़ों और इंसानों के भविष्य के बारे में सोचने का एक गंभीर अवसर है.