समाचार देखना छोड़ने के बाद आप जिन चीजों पर गौर करने लगते हैं

डेविड केन

मैं इस सोच के साथ बड़ा हुआ कि समाचारों से लगातार वाकिफ रहने से आप बेहतर नागरिक बनते हैं. आज, समाचार देखना छोड़ने के 8 साल बाद, मुझे यह विचार बचकाना लगता है- कि हर दिन सूचना के एक नीरस उत्पाद का उपभोग करके आप किसी तरह से एक चिंतनशील और जागरूक नागरिक बनते हैं जिससे समाज का कोई भला होता है.

मगर मैं आज भी ऐसे कई लोगों से मिलता हूं जो एक बुद्धिमान, सक्रिय वयस्क द्वारा दैनिक समाचार देखना छोड़ देने की बात को सिरे से खारिज कर देते हैं.

मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मैं मुख्यतः टी.वी. और इन्टरनेट न्यूज़कास्ट देखने की बात कर रहा हूं. यह लेख पत्रकारिता को ही खारिज करने के बारे में नहीं है. CNN पर आधा घंटा किसी शरणार्थी संकट को देखना (ऐसा नहीं है कि अब भी वे इसे कवर करते हैं) और उसी विषय पर 5000 शब्दों का कोई विश्लेषात्मक निबंध पढ़ने के बीच बहुत बड़ा अंतर है.

अगर आप समाचार देखना छोड़ दें, सिर्फ एक महीने के लिए ही, तो आपको अपनी समाचार देखने की आदत बहुत भद्दी और गैर-जरूरी लगेगी, शायद तम्बाकू के उस लती की तरह जिसे सिगरेट छोड़ने के बाद तम्बाकू की गंध बहुत बुरी लगती है.

कुछ चीजें जिनपर आप गौर करने लगते हैं:

#1: आप बेहतर महसूस करते हैं

समाचार देखना छोड़ने का एक आम लक्षण है मनोदशा (mood) में सुधार होना. समाचारों के लती आपसे कहेंगे कि ऐसा इसलिए है क्योंकि आपने वास्तविकता से मुंह चुराकर अपना सिर रेत में गाड़ लिया है.

मगर यह तर्क इस मान्यता पर आधारित है कि समाचार देखना खुली-ताजी हवा में सांस लेने जैसा है. उन्हें यह एहसास नहीं होता है कि समाचारों के आधार पर दुनिया का जो चित्र आप अपने मन में बनाते हैं, असली दुनिया उससे बहुत अलग होती है.

समाचार दुनिया की सटीक छवि बनाने में रूचि नहीं रखते हैं. वे ऐसी चीजें चुनते हैं जो 1) असामान्य हों 2) विध्लित करने वाली हों, और 3) जो लोकप्रिय/ चर्चित बन सकें. इसलिए यह सोचना कि समाचार देखने से आप इस “दुनिया की स्थिति” का कोई सही अंदाजा लगा पाएंगे, बहुत बचकाना विचार है.

उनकी खबरों का चुनाव हमारे मनोवैज्ञानिक नकारात्मकता पूर्वाग्रह/ negativity bias का फायदा उठाने के लिए होता है (नकारात्मकता पूर्वाग्रह: अगर समान प्रबलता की दो खबरें दी जाएं, तो सकारात्मक या न्यूट्रल खबर की अपेक्षा नकारात्मक खबर का हम पर ज्यादा प्रभाव पड़ता है). हमारा जैविक विकास भय और गुस्से की चीजों पर ज्यादा ध्यान देने के लिए हुआ है, मगर इसका यह अर्थ नहीं है कि भय या गुस्से की हर घटना हमारे लिए फायदेमंद ही होती है. जब आप समाचार देखना छोड़ देते हैं, तो आपको समझ आने लगता है कि दर्शक को परेशान या क्रोधित करना संयोग नहीं, बल्कि समाचारों का मुख्य उद्देश्य होता है.

एक न्याय परायण व्यक्ति के चिंतन-चिंता की लिस्ट में जो चीजें होती हैं, वे समाचारों में शामिल नहीं होती हैं. वही दिखाया जाता है जो बिकता है, और जो चीज़ बिकती है वह है डर, और दूसरे समुदायों के प्रति नफ़रत.

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इसलिए अपनी लिस्ट खुद बनाइए. आप ज्यादा गहरे और प्रमाणिक स्रोतों से दुनिया के बारे में सूचना पा सकते हैं, बजाय कि उन स्रोतों से जहां सिर्फ आधा दिन लगाकर सूचना का पैकेज पेश कर दिया जाता है.

#2: आप समाचार देखकर वास्तव में कुछ हासिल नहीं कर रहे थे

अगर आप किसी से पूछें कि समाचार देखकर वे क्या हासिल कर लेते हैं, तो आप अस्पष्ट धारणाएं सुनेंगे, जैसे “जागरुक रहना हमारा नागरिक कर्तव्य है!” या “यह जानना जरूरी है कि दुनिया में क्या हो रहा है” या “हम इन मुद्दों पर आंखें बंद तो नहीं कर सकते हैं”, और इनमें से कोई भी हमारे सवाल का जवाब नहीं देता है.

“जागरुक रहना” एक उपलब्धि लग सकती है, मगर इससे लगता है कि कोई भी सूचना चलेगी. आप बसों की समय सारणी पढ़कर भी तो सूचना पा सकते हैं.

समाचार देखना छोड़ने के एक महीने बाद ही यह बता पाना मुश्किल हो जाता है कि ऐसा करने से आपने कौनसी फायदेमंद चीज़ों से खुद को महरूम कर दिया है. तब यह स्पष्ट हो जाता है कि इतने सालों तक समाचार देखने से आपको अपना जीवन बेहतर करने, स्थायी ज्ञान पाने, या दूसरों की मदद करने लायक कुछ भी हासिल नहीं हुआ. और यह समय आपने दूसरी फायदेमंद चीजों को न करके निकाला. कल्पना कीजिए कि अगर इतना सारा समय आपने कोई नई भाषा सीखने, किताबें पढ़ने या समाचारों में दिखाए जाने वाले मुद्दों पर गहरे लेख पढ़ने में लगाया होता.

आप पाएंगे कि आपके समाचार देखना छोड़ने से कैबिनेट की नियुक्तियां अभी भी वैसे ही हो रही हैं जैसे पहले होती थीं, और आपके बिना भी आपदा राहत के कार्य हमेशा की तरह किए जा रहे हैं. यानी, “दुनिया पर नजर रखने” की आपकी आदत से दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ा.

हमें कहीं से यह धारणा विरासत में मिली है- शायद उस ज़माने से जब दिन में केवल एक घंटे समाचार आते थे- कि उस दिन के सबसे चर्चित मुद्दे की सतही जानकारी होने से किसी तरह उन लोगों के जीवन में फर्क पड़ता है जो इन मुद्दों से प्रभावित होते हैं.

#3: वर्तमान मुद्दों पर हो रही ज्यादातर चर्चाएं सिर्फ लोगों की उटपटांग बातें भर होती हैं

“क्योंकि इससे आपको दैनिक चर्चाओं में भाग लेने में मदद मिलती है!” इस सवाल का एक कमजोर लेकिन कम-से-कम अर्थपूर्ण उत्तर है कि “तुम्हें क्या हासिल हुआ”. मगर जब आप इन चर्चाओं में भाग लेना बंद कर देते हैं, और दूसरों को बात करता हुआ देखते हैं, तो आप पाते हैं कि लगभग किसी को भी नहीं पता होता है कि वह क्या बोल रहा है.

‘किसी मुद्दे की न्यूनतम प्रामाणिक समझ होना’ और ‘उसके बारे में समाचारों से जानना’ के बीच में बहुत बड़ा अंतर होता है. अगर आप अपने आस-पास किसी मुद्दे पर हो रही ‘चाय पर चर्चा’ के पास हों और आप उस मुद्दे के बारे में वाकई समझ रखते हों, तो आप उनकी छिछली बातें साफ़-साफ़ पहचान जाते हैं. यह देखना बहुत ही मजेदार होता है कि केवल कुछ घंटे समाचार देखने के बाद लोग कितने आत्मविश्वास और जोश से मुद्दों पर पक्ष लेकर बहस करने लगते हैं.

भले ही हम गलत हों, चतुराई भरी बातें करने और पक्ष लेने से हमें बहुत अच्छा महसूस होता है, और ऐसा करने के लिए समाचार हमें बहुत अच्छा अवसर देते हैं. जितना आप किसी चीज़ के बारे में कम जानते हैं, उतना उसके बारे में बड़े दावे करना आसान हो जाता है, क्योंकि समाचारों के चश्मों से वह चीज सरल और ब्लैक-एंड-वाइट दिखती है और आप आश्वस्त होकर मत बना लेते हैं कि उसके बारे में अगला कदम क्या होना चाहिए.

अगर हम अलग-अलग लोगों और समूहों के आपसी सम्बन्ध सुधारने की मंशा रखते हैं, तो शायद दुनिया को जो आखिरी चीज़ चाहिए वह है किसी विषय पर सिर भिड़ाते दो लोग जिन्होंने उसके बारे में समझ समाचार देखकर बनाई है.

#4: “जागरुक” रहने के अन्य कहीं बेहतर विकल्प हैं

हम सब एक जागरुक समाज में रहना चाहते हैं. समाचार लोगों को सूचना देते हैं, मगर मुझे नहीं लगता है कि वे अच्छी तरह से लोगों को जागरुक करते हैं.

“सूचना” के स्रोतों की हर तरफ भरमार है. शैम्पू की बोतल के पीछे लिखी चीजें भी सूचना होती हैं. आज हमारी सोखने की क्षमता से कहीं ज्यादा सूचना उपलब्ध है, इसलिए हमें ध्यान देना होगा कि हम किन चीज़ों को अपना समय देते हैं. समाचार सूचना का अनंत विस्तार देते हैं, मगर बहुत सीमित गहराई के साथ, और उनका उद्देश्य साफ़-तौर से हमें विचिलित करना होता है, शिक्षित करना नहीं.

जितने मिनट आप समाचार देखने में लगाते हैं, उतने ही मिनट आप दुनिया को जानने के अन्य तरीकों से खुद को दूर रखते हैं. सारे अमरीकी मिलकर शायद हर दिन करोड़ों घंटे समाचार देखते हैं. इतने समय कितनी किताबें पढ़ीं जा सकती थीं.

किसी विषय पर तीन किताबें पढ़ लीजिए और आप उस विषय पर दुनिया की 99% आबादी से ज्यादा जान जाएंगे. सालों तक हर दिन कई घंटे समाचार देखते रहिए और आपके पास सिर्फ हजारों कहानियों की ‘चाय पर चर्चा’ स्तर की सतही जानकारी मात्र होगी.

अगर हम केवल जानकारी के विस्तार पर ध्यान दें, बजाय की समझ की गहराई के, तो ‘जानने’ और ‘गलत समझ होने’ में ज्यादा अंतर नहीं है.

#5: मुद्दों के बारे में “चिंता करना” हमें सांत्वना देता है कि हम उनके बारे में कुछ कर रहे हैं जबकि वास्तव में हम कुछ नहीं कर रहे होते हैं

समाचार अन्याय और त्रासदी के बारे में होते हैं, और जब लोगों को कष्ट हो रहा होता है तो यह स्वाभाविक है कि इनपर ध्यान न देने से हम असहज महसूस करते हैं. भले ही समाचार सतही हों, उनमें दिखाए गए मुद्दे (अक्सर) असली होते हैं…टीवी जितना दिखा सकता है उससे कहीं ज्यादा असली. लोग हर समय कष्ट में हैं और मर रहे हैं, और भले ही उसे तोड़-मरोड़कर दिखाया जाए, इस पीड़ा को दिखाने पर उससे मुंह मोड़ने पर हमें ग्लानि महसूस होती है.

हम सोचते हैं कि अगर हम और कुछ नहीं कर सकते हैं तो कम-से-कम उसे नजरअंदाज करने से तो बच सकते हैं. इसलिए रुंधे हुए गलों और भीगी आंखों से हम टीवी पर समाचार देखते हैं. मगर इस तरह “चिंतित” होने से किसी की कोई मदद नहीं होती है, सिवाय आपको अपना ग्लानिभाव को थोड़ा कम करने में.

और मुझे शक है कि कहीं इससे और अधिक निष्क्रियता तो नहीं पसरती है. “कम-से-कम मैं परवाह तो करता/ करती हूं” का भाव असल में हमें कुछ ठोस कदम उठाने से विमुक्त कर सकता है, क्योंकि दूसरा को पीड़ा झेलते हुए देखकर आहें भरने से हमें इस सच्चाई से मुंह मोड़ने की छूट मिल जाती है कि हम खुद कुछ नहीं कर रहे हैं.

त्रासदी को टीवी में देखना, भले ही हम कुछ नहीं कर रहे हों, कम-से-कम टीवी बंद करने से तो ज्यादा दयालु महसूस होता है. सच यह है कि हममें से अधिकतर लोग इस दुनिया में हो रहे शोषण से पीड़ित लोगों की कोई भी सहायता नहीं कर पाएंगे, चाहे उन्हें टीवी पर दिखाया जा रहा हो या नहीं. और यह स्वीकार करना बेहद कठिन है. इसीलिए हमें लगता है कि अगर हम अपनी चिंता जाहिर कर दें, कम-से-कम खुद को, तो हमें यह कटु सत्य स्वीकार नहीं करना पड़ेगा. इसलिए हम बिना कुछ करे भी उसमें लिप्त रहते हैं.

समाचार बंद न करने का शायद हमारा सबसे बड़ा डर यही है. और इसीलिए समाचार बंद करने का शायद सबसे बड़ा कारण  भी यही होना चाहिए.

 

क्या आपने भी समाचार देखना छोड़ दिया है? आपने क्या गौर करना शुरू किया?

 

साभार: http://www.raptitude.com/2016/12/five-things-you-notice-when-you-quit-the-news/

चित्र: MIKE LICHT और BBC हिंदी

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One Response to समाचार देखना छोड़ने के बाद आप जिन चीजों पर गौर करने लगते हैं

  1. Todd कहते हैं:

    Reblogged this on Serendipity, Encouraged and commented:
    For my many Hindi-speaking readers. This is a translation of a fantastic article from one of my favourite sites for thought-provoking reading.

    For my English speaking friends, especially those freaking about about the current state of world affairs. Regardless of where you fall on the political spectrum, “Five Things You Notice When You Quit the News” is an excellent read.

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